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राष्ट्रचेतना के शिल्पी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आधुनिक भारत के ऐसे राष्ट्रऋषि थे, जिन्होंने राजनीति को सत्ता या व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं माना। उनके लिए राजनीति राष्ट्रसेवा और राष्ट्रनिर्माण का एक पवित्र यज्ञ थी, जिसमें व्यक्ति स्वयं को समर्पित करता है।

6 जुलाई: श्यामा प्रसाद मुखर्जी जयंती

भारतीय परंपरा में राष्ट्र केवल जमीन का एक टुकड़ा या राजनीतिक समझौता (पॉलिटिकल कॉन्ट्रैक्ट) नहीं है। राष्ट्र एक जीवंत चेतना और सांस्कृतिक व्यक्तित्व है। ऋग्वेद में कहा गया है— वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिताः। अर्थात— हम राष्ट्र के प्रति हमेशा जागरूक रहें और उसके प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाएं।

बीसवीं शताब्दी के मध्य में जब भारत अंग्रेजी शासन की गुलामी से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब इस वैदिक राष्ट्रचेतना को आधुनिक राजनीति में नई दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया। वास्तव में उनका भारतीय राजनीति में उदय कोई संयोग नहीं था, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति की रक्षा का एक ऐतिहासिक और स्वाभाविक चरण था। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सशक्त प्रवक्ता थे। उनका दृष्टिकोण किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे भारत की एकता और अखंडता पर आधारित था।

श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के जिन गुणों का वर्णन किया गया है, उनकी झलक डॉ. मुखर्जी के प्रारंभिक जीवन में भी दिखाई देती है। 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता की पवित्र भूमि पर जन्मे श्यामा प्रसाद को राष्ट्रभक्ति, निर्भीकता और ज्ञान के प्रति निष्ठा अपने पिता, प्रसिद्ध शिक्षाविद और “बंगाल टाइगर” के नाम से विख्यात सर आशुतोष मुखर्जी से विरासत में मिली। कलकत्ता विश्वविद्यालय से सर्वोच्च अंकों के साथ शिक्षा पूरी करने के बाद वे केवल 33 वर्ष की आयु में उसी विश्वविद्यालय के कुलपति बने। उन्होंने मैकाले की औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर विश्वविद्यालयी शिक्षा में भारतीय दृष्टिकोण को महत्व देने का प्रयास किया।

उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर को आमंत्रित किया और इतिहास में पहली बार कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का भाषण अंग्रेजी के बजाय बांग्ला यानी मातृभाषा में कराया।

प्राचीन याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है—विद्या कर्म च विहितं प्रजायै। अर्थात— विद्या और कर्म का उद्देश्य प्रजा का कल्याण होना चाहिए। डॉ. मुखर्जी ने इस विचार को अपने जीवन में उतारा। उनके लिए शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं थी, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार थी।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक विचारों को समझने के लिए भारतीय इतिहास के उन कठिन दौरों को देखना आवश्यक है, जब देश की एकता और अखंडता संकट में थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य की संप्रभुता और उसकी सीमाओं की रक्षा के लिए जिस नीति और शक्ति का वर्णन किया गया है, डॉ. मुखर्जी का सार्वजनिक जीवन उसी का आधुनिक रूप दिखाई देता है। कौटिल्य कहते हैं— पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानीतानि संहृत्यैकमर्थशास्त्रं कृतम्।

अर्थात— पृथ्वी की रक्षा और उसके सुशासन के लिए पूर्व आचार्यों के सिद्धांतों का गंभीर अध्ययन और उनका समन्वय आवश्यक है। डॉ. मुखर्जी ने महाभारत के शांतिपर्व में वर्णित राजधर्म का भी गहराई से अध्ययन किया था। शांतिपर्व के 59वें अध्याय में भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं कि किसी भी शासक का सबसे बड़ा धर्म अपनी प्रजा की सांस्कृतिक पहचान और अपनी सीमाओं की रक्षा करना है। जब स्वतंत्र भारत के नीति-निर्माता तुष्टीकरण और वैचारिक भ्रम के दौर से गुजर रहे थे, तब डॉ. मुखर्जी ने संसद के भीतर और बाहर देश को उसकी सनातन जड़ों की याद दिलाई।

वर्ष 1947 भारतीय इतिहास का सबसे दुखद और रक्तरंजित काल था। “सॉवरेन यूनाइटेड बंगाल” यानी संप्रभु संयुक्त बंगाल के नाम पर मुस्लिम लीग के कुछ नेता पूरे बंगाल को पाकिस्तान में मिलाने की योजना बना रहे थे। यदि यह योजना सफल हो जाती, तो आज का पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा नहीं होता। ऐसे गंभीर संकट के समय डॉ. मुखर्जी ने इतिहास की दिशा बदल दी। उन्होंने समझ लिया था कि संयुक्त बंगाल की आड़ में हिंदुओं की सांस्कृतिक पहचान समाप्त हो जाएगी और बड़े पैमाने पर इस्लामीकरण का रास्ता खुल जाएगा।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हो रहा है, तो बंगाल का विभाजन भी उसी आधार पर होना चाहिए, ताकि हिंदू बहुल क्षेत्र भारत में सुरक्षित रह सकें। उनके इसी साहस और दृढ़ निश्चय के कारण पश्चिम बंगाल भारत गणराज्य का अभिन्न हिस्सा बना रहा।

यह घटना मनुस्मृति के उस श्लोक को चरितार्थ करती है—राजा तु धार्मिकान् दृष्ट्वा परराष्ट्रान् जयत्यपि। अर्थात— न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ नेतृत्व कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी राष्ट्र के हितों की रक्षा करने में समर्थ होता है।

स्वतंत्रता के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया। आधुनिक भारत के आर्थिक इतिहास का अध्ययन करने वाले विद्वान मानते हैं कि देश के औद्योगिक विकास की जो शुरुआती रूपरेखा बनी, उसमें डॉ. मुखर्जी का महत्वपूर्ण योगदान था। उनका आर्थिक दृष्टिकोण ऋग्वेद के इस मंत्र से प्रेरित था— शतहस्त समाहर सहस्रहस्त संकिर, अर्थात सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से समाज में बांटो। वे तेज औद्योगिकीकरण के समर्थक थे, लेकिन पश्चिमी पूंजीवाद की अंधी नकल के विरोधी थे। उनका मानना था कि कुटीर और लघु उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था की वास्तविक रीढ़ हैं।

अप्रैल 1950 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच दिल्ली समझौता (नेहरू–लियाकत पैक्ट) हुआ। डॉ. मुखर्जी ने इस समझौते का खुलकर विरोध किया। उनका कहना था कि पूर्वी पाकिस्तान, जो आज बांग्लादेश है, वहां हिंदुओं पर लगातार हो रहे अत्याचार, नरसंहार और जबरन धर्म परिवर्तन की इस समझौते में कोई प्रभावी चिंता नहीं दिखाई देती।

अक्सर राजनेता सत्ता बचाने के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं, लेकिन डॉ. मुखर्जी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने 8 अप्रैल 1950 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। उनका स्पष्ट विश्वास था कि कोई भी राज्य अपनी अल्पसंख्यक प्रजा की रक्षा के नैतिक दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकता। उनका यह निर्णय वाल्मीकि रामायण की उस भावना के अनुरूप था, जिसे लोक में इस पंक्ति के रूप में जाना जाता है— रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाए पर वचन न जाई। अर्थात सिद्धांत और वचन की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़े तो प्राण भी न्योछावर कर देने चाहिए।

मंत्रिमंडल से बाहर आने के बाद देश को ऐसे राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता महसूस हुई, जो तुष्टीकरण की राजनीति से मुक्त हो और जिसकी जड़ें भारत की सांस्कृतिक परंपरा में गहराई तक जुड़ी हों। इसी उद्देश्य से 21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से भारतीय जनसंघ की स्थापना की।

भारतीय जनसंघ केवल सत्ता प्राप्त करने के लिए बनाया गया राजनीतिक दल नहीं था। यह एक वैचारिक आंदोलन था। इसके मूल में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, समान नागरिक संहिता और अखंड भारत की संकल्पना थी। इन तीनों का उद्देश्य था— भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य का आधार बनाना, कानून के सामने सभी नागरिकों की समानता सुनिश्चित करना और देश का भौगोलिक तथा मानसिक एकीकरण करना।

यह प्रयास कालिदास के रघुवंशम् में वर्णित उस आदर्श राजा की याद दिलाता है, जो प्रजा से कर केवल उसी के कल्याण के लिए ग्रहण करता है— प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत। अर्थात— राजा प्रजा से कर इसलिए लेता है कि उसी धन से प्रजा का कल्याण कर सके।

डॉ. मुखर्जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे तेजस्वी अध्याय जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए उनका संघर्ष था। उस समय संविधान के अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में अलग संवैधानिक व्यवस्था थी। वहां अलग ध्वज था, अलग संविधान था और वजीर-ए-आजम यानी प्रधानमंत्री का पद भी था। भारत के किसी भी नागरिक को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने के लिए विशेष परमिट लेना पड़ता था।

इस व्यवस्था के विरोध में डॉ. मुखर्जी ने देशभर में यह ऐतिहासिक नारा दिया— एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि भारत की एकता और अखंडता का स्पष्ट उद्घोष था। इसमें चाणक्य के उस संकल्प की झलक दिखाई देती है, जिसमें उन्होंने अखंड भारत के निर्माण का लक्ष्य सामने रखा था।

मई 1953 में डॉ. मुखर्जी बिना परमिट लिए जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश कर गए। उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और श्रीनगर की एक उप-जेल में नजरबंद रखा गया। 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान रहस्यमय और संदेहास्पद परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। उनकी माता जोगमाया देवी ने निष्पक्ष जांच की मांग की, लेकिन तत्कालीन सरकार ने इसकी कोई स्वतंत्र जांच नहीं कराई।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया। यह उपनिषदों के उस महान वाक्य को साकार करता है— न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेनामृतत्वमानशुः।

अर्थात— न कर्म से, न संतान से और न धन से, बल्कि केवल त्याग से ही अमरत्व प्राप्त होता है। यह एक शाश्वत सत्य है कि किसी महापुरुष का मूल्यांकन केवल उसकी तत्कालीन सफलता या असफलता से नहीं किया जाता। उसका सही मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि उसने आने वाली पीढ़ियों और इतिहास पर कितना गहरा वैचारिक प्रभाव छोड़ा।

यदि इतिहास की दृष्टि से देखा जाए, तो डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वतंत्र भारत के उन विरले राष्ट्रपुरुषों में थे, जिन्होंने देश को विखंडन की दिशा में बढ़ने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पश्चिम बंगाल को भारत में बनाए रखने के उनके प्रयास हों, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उनकी स्पष्ट अवधारणा हो, या फिर जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के लिए उनका संघर्ष— इन सबमें राष्ट्र की एकता सर्वोपरि दिखाई देती है।

अनुच्छेद 370 का क्रमिक निष्प्रभावीकरण और जम्मू-कश्मीर का भारत गणराज्य में पूर्ण तथा निर्बाध वैधानिक एकीकरण अंततः उसी विचारधारा और उसी संघर्ष की परिणति माना जाता है, जिसके लिए डॉ. मुखर्जी ने छह दशक पहले अपना जीवन बलिदान कर दिया था।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आधुनिक भारत के ऐसे राष्ट्रऋषि थे, जिन्होंने राजनीति को सत्ता या व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं माना। उनके लिए राजनीति राष्ट्रसेवा और राष्ट्रनिर्माण का एक पवित्र यज्ञ थी, जिसमें व्यक्ति स्वयं को समर्पित करता है।

उनकी जयंती पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल स्मरण या औपचारिक आयोजन नहीं हो सकती। वास्तविक श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता, आत्मनिर्भरता और अखंड भारत के आदर्शों को समझें, उन्हें अपने जीवन में उतारें और एक सशक्त, समृद्ध, स्वावलंबी तथा एकात्म भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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