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सारे सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स रोएंगे

भारत में तीन दशक पहले डिजिटल क्रांति आई तो भारत कंप्यूटर और इंटरनेट का दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बना। वैसे ही डेढ़ दशक पहले सोशल मीडिया की क्रांति हुई तो भारत उसका भी सबसे बड़ा बाजार बना। भारत में अभी फेसबुक, यूट्यूब, गूगल आदि के सबसे ज्यादा उपयोगकर्ता हैं। इसी तरह दो साल पहले जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की क्रांति हुई उसका भी सबसे बड़ा बाजार भारत बन गया है। भारत में ओपन एआई का इस्तेमाल करने वाले सबसे ज्यादा लोग हैं। जिस तरह से भारत आईटी क्रांति और सोशल मीडिया क्रांति का बाजार बना है उसी तरह एआई क्रांति का भी बाजार बना है। लेकिन अब इस बाजार के डायनेमिक्स बदल रहे है।

अमेरिका की एआई कंपनियों ने मार्केटिंग की दिशा में अगला कदम बढ़ा दिया है। खबर है कि अब उनके एआई प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल मुफ्त नहीं होगा। पहले चरण में इसमें विज्ञापन इंट्रोड्यूस किए जा रहे हैं। एआई का कोई भी प्लेटफॉर्म खोलने पर विज्ञापन चलेगा। अगर किसी को विज्ञापन मुक्त सेवा लेनी है तो उसे सब्सक्रिप्शन लेना होगा। मार्केटिंग का यह तरीका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा पहले से आजमाया जाने लगा है। प्रीमियम सर्विस के लिए पैसे देने होते हैं और मुफ्त सर्विस में विज्ञापन चलते हैं। इस विज्ञापन से अरबों डॉलर की कमाई होती है और वह पूरा पैसे अमेरिका जाता है। सोचें, विज्ञापन भारत के उत्पादों का होता है और उनके खरीदार भी भारत के लोग होते हैं। लेकिन उसका विज्ञापन करने वाला प्लेटफॉर्म विदेशी है। पहले विज्ञापन का प्लेटफॉर्म अखबार, पत्रिकाओं और टेलीविजन चैनलों का होता था। बाद में इसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म्स शामिल हुए। धीरे धीरे उन्होंने बाजार पर कब्जा करना शुरू किया। सरकारों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापन के नए नियम बनाए। आज विज्ञापन का सबसे ज्यादा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को जाता है। उसमें गूगल, यूट्यूब, फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम आदि की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है।

ऐसा नहीं है कि इसका लाभ सिर्फ अमेरिकी कंपनियों ने उठाया। उन्होंने भारत के सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स को कमाई का माध्यम भी उपलब्ध कराया। भारत में रील बनाना और डिजिटल कंटेंट बना कर कमाई करना एक वैकल्पिक रोजगार बना। ऐसा रोजगार, जिसमें सरकारों की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन पिछले ही साल बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्होंने डाटा इतना सस्ता कर दिया कि लाखों लोग डिजिटल कंटेंट बना कर कमाई कर रहे हैं। उन्होंने रीलबाजी को एक रोजगार बताया। इतना ही नहीं इस साल जब मोदी की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम बजट पेश किया तो उसमें 15 हजार कंटेंट क्रिएशन लैब्स बनाने का प्रावधान किया । सोचें, दुनिया के सभ्य और विकसित देश इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी बनाने के लिए साइंस और टेक्नोलॉजी के लैब्स बना रहे हैं वही भारत में कंटेंट क्रिएशन के लैब बनने है!

परंतु इस रोजगार की राह भी अब मुश्किल हो गई है। तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने दर्शकों और पाठकों तक रीच घटाई है। साथ ही मोनेटाइजेशन को कम किया है। फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर तो पहले भी कम पैसे मिलते थे लेकिन यूट्यूब वीडियोज से लोगों को अच्छी खासी कमाई होती थी। पहले तो इनकी पैरेंट कंपनी मेटा ने वीडियो की लंबाई और गुणवत्ता के आधार पर भुगतान के नए नियम बनाए। इसमें छोटे यानी शॉर्ट वीडियोज और रील्स के लिए भुगतान काफी कम कर दिया। लंबे वीडियो पर अगर दर्शक ज्यादा देर टिकता था तो उसमें ज्यादा भुगतान के नियम बने। इस तरह 30 सेकेंड, तीन मिनट या उससे ज्यादा, 10 मिनट या उससे ज्यादा और 30 मिनट या उससे ज्यादा की अवधि वाले वीडियो की श्रेणियां बनाई गईं। पहले ये कंपनियां अनापशनाप पैसे देती थीं। लेकिन बाद में 10 मिनट का वीडियो अगर 10 हजार लोग देखते हैं तो एक डॉलर का भुगतान होने लगा। अब इसे और कम कर दिया गया है। एक बहुत ही चर्चित और वस्तुनिष्ठ खबरें दिखाने वाले सोशल मीडिया जर्नलिस्ट का कहना है कि उनके लंबे वीडियो पर पांच लाख व्यूज के बावजूद तीन हजार रुपए मिल रहे हैं। जाहिर है अब यह स्वरोजगार भी संकट में है। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स व अमेरिकी कंपनियों की कमाई में कमी हुई है। उनका विज्ञापन का राजस्व बढ़ रहा है लेकिन अब वे इस राजस्व को शेयर करने के लिए तैयार नहीं हैं। तभी उन्होंने इन्फ्लूएंसर्स का पेआउट कम करना शुरू किया है। इस तरह यूट्यूब से कमाई का बुलबुला फूट रहा है। ऐप आधारित कैब सर्विसेज हों या ऐप आधारित फूड डिलीवरी की सेवा हो, इन सबमें पहले जिस तरह की कमाई होती थी वह भी बहुत कम हो गई है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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