तो आज का वक्त भारत का सेनापति बेचारा (थलसेना प्रमुख-जनरल एमएम नरवणे) ‘सबसे ऊपर से’.. आदेश की प्रतीक्षा के अनुभव वाला। अंत में जवाब – “जो उचित समझो, वह करो।” कितनी गंभीर बात। तभी विचार करें नेहरू के बनाए भारत और जिन्ना के बनाए पाकिस्तान में क्या फर्क है? नेहरू की जिद्द थी कि सिविल सरकार से सेना आदेश लेगी। जबकि जिन्ना ने दिमाग नहीं लगाया। नतीजतन पाकिस्तान में रिवाज है सेना देगी सिविल सरकार को आदेश। वह चलाएगी सरकार!
इस फर्क को क्या नरेंद्र मोदी, अजित डोवाल, राजनाथ सिंह, अमित शाह, जयशंकर या संघ परिवार के लाठीधारी जानते हैं? चलिए आज आपको राहुल गांधी के पुरखे जवाहरलाल नेहरू की समझ का एक प्रमाण दें। वह सबूत, जिससे पाकिस्तान में सैनिक सर्वशक्तिमान है वही लोकतांत्रिक भारत भयाकुल सिविलियन नरेंद्र मोदी से शासित है।
नेहरू आजादी से पहले अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री थे। वायसराय की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष थे। वह कार्यकारिणी देश के प्रशासन का बिंदु थी। उसमें ब्रितानी सेना के प्रमुख की सदस्यता अनिवार्य थी। पर नेहरू ज्योंहि उपाध्यक्ष बने उनका निर्णय था नागरिक व्यवस्था, राजनीतिक निर्णयों की बैठकों में सेना प्रमुख का क्या काम! वह सदस्य नहीं होगा। उन्होंने वायसराय कार्यकारिणी में सेना प्रमुख को सदस्य नहीं बनाने की अनुशंसा की। नेहरू ने साफ स्टैंड लिया कि शासन-प्रशासन से सेना को दूर रखा जाना चाहिए, ताकि सत्ता का संतुलन नागरिक नेतृत्व के अधीन रहे। तब नेहरू और कांग्रेस नेताओं को बोध था कि भारत में विदेशी शासन सैन्य छावनियों के बल पर था। सो, भविष्य के लोकतांत्रिक भारत में सेना को शासन से दूर रखने का निर्णय हुआ।
और नेहरू ने वायसराय कार्यकारिणी में सेना प्रमुख के स्थान पर सेना के प्रतिनिधि मंत्री के रूप में नेता सरदार बलदेव सिंह को कार्यकारिणी का सदस्य बनाया। फिर वह हरसंभव प्रयास किया, जिससे सेनाध्यक्ष की प्रशासनिक मामलों से दूरी बनी। वह हस्तक्षेप न हो और न ही नीतिगत निर्णयों में निर्णयकर्ता या भागीदार बने। लोकतंत्र को स्थिर, टिकाऊ बनाए रखने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों पर एक कैबिनेट समिति का गठन किया। इसी से नागरिक और सैन्य नेतृत्व के बीच एक संस्थागत संतुलन स्थापित हुआ। इसके अलावा, नेहरू ने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के कार्यकाल को निश्चित अवधि का बनाया, जिससे सैन्य पदों पर अनावश्यक राजनीतिक प्रभाव को रोका जा सके। सेवानिवृत्त सेना प्रमुखों, जैसे जनरल करियप्पा, को दूरस्थ देशों में राजदूत नियुक्त किया। मतलब सैन्य नेतृत्व की राजनीतिक सत्ता से दूरी बनाए रखने की परंपरा बनाई। खुफिया एजेंसियों के माध्यम से निगरानी तंत्र विकसित किया।
तभी नेहरू से मोदी के सत्ता में आने तक हर सरकार ने तीनों सेनाओं के प्रमुख अलग-अलग रखे। चीन के हमले के बाद तीनों सेना के कमान से ऊपर एक प्रमुख की नियुक्ति की सलाह दी जाती रही। लेकिन भारत के सभी प्रधानमंत्रियों ने नेहरू की इस समझ को अपनाए रखा कि “एक शक्तिशाली सैन्य पद लोकतंत्र के लिए ख़तरा बन सकता है”। उस सोच-सावधानी को प्रधानमंत्री मोदी ने प्रमुख रक्षा अध्यक्ष का पद (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस) बना कर और सन् 2020 में जनरल रावत को नियुक्त कर खत्म किया। शायद इसलिए क्योंकि गुजरात से आए नरेंद्र मोदी ने अपनी कमी (सीधे बात करने, निर्देश देने, कैबिनेट में रियल विचार विमर्श निर्णय की क्षमता, विश्वास में कमी) को ढकने के लिए सीएमओ के ढर्रे पर खास-विश्वस्त एनएसए अजित डोवाल, पीएमओ के प्रमुख सचिव, विश्वस्त अमित शाह की कमांड बनाई तो सेना के लिए भी एक विश्वस्त की जरूरत थी। सो, वे बतौर सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल (आईपीएस अफसर) को मन की बात कहें। उसे डोवाल सेनाध्यक्ष, सीडीएस को सुनाए और सीडीएस फिर थल, वायु, नौ सेना के प्रमुखों को हुकूम दे। इस कमांड चेन के अनुभव पुलवामा, गलवान, डोकलाम, ऑपरेशन सिंदूर में झलके हैं। वैश्विक तौर पर भारत की सैन्य क्षमता पोली हुई मानी गई है।
सो, नेहरू ने भारत को पाकिस्तान नहीं बनने देने के लिए निर्वाचित सरकार को सर्वेसर्वा बनाया। मगर हां, उन्होंने कल्पना नहीं की थी कि कभी कोई ऐसा प्रधानमंत्री भी होगा, जिसमें न तो कैबिनेट बैठक, कैबिनेट की सुरक्षा कमेटी में खुले मंथन की हिम्मत होगी। न सीधा आदेश मिलेगा। और ऑपरेशन भी होगा तो शर्तों के साथ। फिर भले सीमा की तरफ चीनी सैनिक, टैंक बढ़ रहे हैं तो सेनाधिकारियों के संग नफे-नुकसान पर विचार के बिना रक्षा मंत्री के जरिए अंत में संदेश भिजवा देंगे, “जो उचित समझो, वह करो”।


