सोशल मीडिया में कहा जा रहा है कि साजिश के तहत यूजीसी के नियम जारी किए गए। औशंकराचार्य वाला विवाद खड़ा किया गया। कई लोगों ने कहा कि नरेंद्र मोदी को कमजोर करने और उनके सबसे निष्ठावान वोट को उनसे अलग करने के लिए किसी ने अंदर से साजिश की और यूजीसी का नियम जारी हुआ। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री को इसका अंदाजा हो गया इसलिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस पर रोक लगाने का विरोध नहीं किया। सवाल है कि जिस पार्टी में नेता, मंत्री, अधिकारी सब ऊपर के आदेश से ही सांस लेते हैं वहां किसने ऐसा करने की साजिश की?
भाजपा इकोसिस्टम के लोग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को निशाना बना रहे हैं। वे पिछड़ी जाति से आते हैं और खुल कर पिछड़ा राजनीति करने में यकीन करते हैं। कहा जा रहा है कि ओडिशा का मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने के बाद जब भाजपा का अध्यक्ष पद भी हाथ से निकला तो संसदीय समिति की सिफारिशों में अदलाबदली करके प्रधान ने ऐसा नियम जारी करवा दिया, जिससे पार्टी फंसी। शंकराचार्य वाले मामले को दिल्ली बनाम लखनऊ के विवाद और साजिश के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि दिल्ली के इशारे पर सब कुछ हुआ है।
यूजीसी नियमों में साजिश का दूसरा पहलू दिल्ली बनाम लखनऊ के विवाद के तौर पर पेश किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जान बूझकर अगड़ा बनाम पिछड़ा का मुद्दा बनाया गया और अगड़ों के विरोध को खूब फैलाया गया। ध्यान रहे उत्तर प्रदेश में बाकी किसी भी राज्य के मुकाबले अगड़ी जातियां खास कर ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहार सबसे ज्यादा हैं। अगर वे भाजपा से नाराज होते हैं तो अगले साल के चुनाव में उसे बड़ा नुकसान हो सकता है। लेकिन अगर इसका उलटा हो गया तो क्या होगा? अगर अगड़े नाराज हुए और सचमुच पिछड़े भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो गए तब तो यह दांव मास्टरस्ट्रोक बन जाएगा?
हालांकि साजिश थ्योरी वाले इसे नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि 18 फीसदी मुस्लिम और 10 फीसदी यादव तो पूरी तरह से सपा के साथ हैं। 20 फीसदी दलितों में से हर हाल में 10 फीसदी दलित मायावती का साथ देंगे। अगर 20 से 22 फीसदी सवर्ण भाजपा से छिटके तो भाजपा बुरी तरह से हारेगी। तभी साजिश थ्योरी वाले इसे योगी आदित्यनाथ को कमजोर करने की साजिश के तौर पर देख रहे हैं।
इसी तरह, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के पिछले दिनों देश के एक बडे उद्योगपति के यहां जाने की तस्वीरें प्रसारित की जा रही हैं और कहा जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ को कमजोर करने के लिए यह साजिश रची गई। उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य के प्रति सद्भाव दिखाया और उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की थी। इस पर कहा जा रहा है कि वे दिल्ली के नेता के करीबी हैं। इसलिए उन्होंने अलग लाइन पकड़ी।
अब सवाल है कि अगर कोई साजिश थी तो योगी आदित्यनाथ को किसने रोका था कि वे अपने प्रशासन के लोगों को शंकराचार्य के पास भेजें और मामला खत्म कराए? उनको मनाने का जो काम शंकराचार्य के माघ मेला छोड़ने के बाद किया गया वह पहले भी हो सकता था। जो हो इन दोनों घटनाओं ने देश की राजनीति में नए सिरे से ध्रुवीकरण की संभावना को जन्म दिया है। तभी यह भी माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी यथास्थिति को तोड़ते रहते हैं ताकि समाज और राजनीति में उथलपुथल मचा कर अपनी लोकप्रियता कायम रखे।
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