इस सप्ताह मुझे ‘हिंदुओं का खुदा खैर करे’ लाइन ने झिंझोड़ा तो यह चौंकाने वाला था कि यूपी सरकार ने शंकराचार्य से पूछा कि वे पहले शंकराचार्य होना तो साबित करें! फिर मालूम हुआ कि मोदी सरकार ने कॉलेज-विश्वविद्यालयों को अगड़े नौजवानों के लिए खौफ का परिसर बना दिया है! मतलब मोदी सरकार ने युवा शक्ति को पढ़ो नहीं, जात में जियो का मंत्र दिया। ब्राह्मण-ठाकुर-कायस्थों आदि के फारवर्ड लड़कों के लिए सरकार ने वह नियम-कायदा बनाया कि पहले जात की पहचान पाओ फिर डिग्री लो!
सो, हिंदुओं का खुदा खैर करे! हिसाब से मोदी सरकार को हिंदुओं के नरक बने बांग्लादेश पर फोकस बनाना था। पर प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति का मूल मंत्र शुरू से वही रहा है जैसा लॉर्ड कर्ज़न, अंग्रेज राज का था, बांटो और राज करो!
हां, यही सन् 2000 से 2026 के भारत परिवर्तन का राजनीतिक मंत्र है। उनकी सफलता का कुल निचोड़, बॉटम लाइन क्या है? धंधे की तराजू को तिलक, तलवार, दबंग, शंकराचार्य नहीं चाहिए बल्कि व्यापार, मुनाफे की सियासी गणित चाहिए! ध्यान रहे यही हिंदुओं की गुलामी की नियति का कारण रहा है। जब सत्ता व राजनीति (याद करें ईस्ट इंडिया कंपनी, जगत सेठ, मौजूदा अंबानी-अडानी को) धंधे के पलड़े में कन्वर्ट हो जाए तो दूसरे पलड़े में फिर इंसानों का नहीं मेंढकों का हिसाब है!
ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदुस्तान को समझ लोगों को न केवल जात-पांत में बांटा, बल्कि सत्ता के लिए खरबपति जगत सेठ का भी उपयोग किया। सूबे-रजवाड़े में फ़साद बनाए। शक्तिमान-बुद्धिमानों को जड़ से उखाड़ बेघर किया। चारों तरफ कठपुतलियां बैठाईं। बंगाल, बंगाल नहीं रहा। पंजाब, पंजाब नहीं रहा! मद्रास, मद्रास नहीं रहा। शिक्षा बदली, धंधे की तासीर बदली, भाषा, संस्कृति, लोकाचार बदला!
वैसे ही पिछले बारह वर्षों में हिंदू के नाम पर क्या नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने नहीं किया है? वह सब किया, जिससे देश में दूसरा कोई दबंग (राजनीति से कूटनीति, उद्यम, ज्ञान-विज्ञान हर क्षेत्र में) नेता व नेतृत्वकर्ता न बचे, न उगे। दिमाग, भाषा, व्यवहार, धर्म, समझ व नैरेटिव सभी बदल नागरिकों को भीड़ बना डाला।
किसलिए? ताकि सियासी तराजू में वोटों का उनका पलड़ा भारी बना रहे। इसलिए नरेंद्र मोदी के हिसाब में अगड़े वोट की चिंता नहीं है, न संघ की ज़रूरत है क्योंकि ये सब हिंदू के नाम पर वैसे ही बंधुआ हैं। ऐसा ही सन् 2000 से 2014 के बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी हुआ था। गुजरात में सन् 2000 से पहले पटेल, देसाई, ओझा, वाघेला यानी अगड़े चेहरे नेता और मुख्यमंत्री होते थे। अगड़ी जातियों के नेता जाति विशेष में रसूख तथा सार्वजनिक जीवन के लोकनायक के नाते गुजरातियों में हिट थे। इन्हीं नेताओं से जनसंघ ने गुजरात को अपने रंग में रंगा। संघ के जिन चेहरों से (चंद्रकांत शुक्ला, शंभु महाराज, केशुभाई, केशुराव देशमुख, दत्तोपंत ठेंगड़ी, मकरंद देसाई, शंकर सिंह वाघेला, केशुभाई पटेल, राणा आदि) नवनिर्माण आंदोलन के ज़रिए प्रदेश में जनसंघ खड़ी हुई थी वे सब खांटी ज़मीनी नेता थे। सच्चे हिंदू थे। मेरा मानना है कि गुजरात के गठन से सन् 2000 में मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल तक किसी ने भी तराजू पकड़ कर राजनीति नहीं की। कांग्रेस का नेता हो या जनसंघ-भाजपा का नेता, किसी ने करोड़पति सेठ को भाव नहीं दिया। सभी ने सामाजिक संतुलन, समरसता के समीकरणों में वोट का आधार बनाया। वह आधार अगड़े, दबंग नेताओं के वजूद से था। बाबूभाई, माधवसिंह, चिमनभाई, केशुभाई, वाघेला सभी ने वोटों के लिए जातियों के नेताओं को साथ में लेकर, उनसे साझा करके सरकारें चलाईं। तब कांग्रेस आलाकमान की भी चलती थी तो संघ के पदाधिकारियों की भी हैसियत थी।
लेकिन नरेंद्र मोदी के शपथ लेते ही सब बदला। जनसंघ के तमाम पुराने दिग्गज नेताओं को ठिकाने लगाया। जात की राजनीति शुरू की। अगड़े नेताओं और जातियों का पुराना वर्चस्व बेहैसियत बनाया। ऐसा उन्होंने अपने को हिंदू नेता कहलवा कर, मुस्लिम-विरोधी इमेज से किया। इससे अगड़े हिंदू अपने-आप बंधुआ बने। फिर चुपचाप छोटी-छोटी जातियों, ओबीसी से अपना नाता जता वह जनाधार बनाया, जिससे उनकी एकक्षत्रता स्थापित हुई।
वही पैटर्न 2014 से राष्ट्रीय स्तर पर है। अब 2029 के चुनाव की तैयारी का रोडमैप उभरता हुआ है। जातीय जनगणना ज्यों ही पूरी होगी उनके आंकड़ों पर तराजू से नई राजनीति उभरेगी। इसका पहला स्थायी नुस्खा हिंदू अवतार के नाम पर अगड़ी जातियों व साधु-संतों के दिल-दिमाग में जस का तस पैठे रहना है। फिर मंडल राजनीति को हाशिए में डालना। गौर करें पिछले बारह सालों में उत्तर-पश्चिम भारत के यादव, जाट, गुर्जर, मीणा, मराठा, पटेल, दलित वोट व नेता-पार्टियां अब कितनी बदहाल हैं? रहा-सहा यूपी के 2027 चुनाव में खत्म होगा। बिहार में लालू परिवार तथा यादव लामबंदी या हरियाणा, पश्चिम यूपी, राजस्थान में जाट लामबंदी बेअर्थ खलास, तो मध्य प्रदेश अगड़े बेदखल, सत्ता से आउट। यूपी के अगले चुनाव में यादव, जाट, दलित वोट सब बेमतलब होने हैं। अखिलेश, मायावती निपट जाने हैं। मतलब ऊंची जातियों, मंडल की ताकतवर जातियों की दबंगई का खात्मा। इससे अपने-आप अतिपिछड़ों की छोटी-छोटी जातियों का वह संतोष है, जिससे उनके वोट सधते हैं।
आगे की जनगणना के बाद इन्हीं की संख्या व आर्थिक स्थिति के हवाले मोदी सरकार अतिरिक्त आरक्षण का फॉर्मूला फेंकेगी। नामुमकिन नहीं कि प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण का फैसला हो। क्यों? ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में 400 सीट पार का मोदी हुंकारा सधे। आखिर उन्हें तीसरे टर्म में नेहरू के मुकाबले अपने को ज़्यादा दमदार जो कहलाना है।
सोच सकते हैं फालतू बात। तो जाति जनगणना के बाद की राजनीति का इंतज़ार करें!


