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सड़ांध में तब्दील हो रही आचरण संहिता

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने क्या किया? उन्होंने राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण की सिर्फ़ तीन पंक्तियां पढ़ीं और बाकी के 11 पैराग्राफ पढ़ने से इनकार करते हुए सदन से बहिर्गमन कर दिया। राज्यपालों के भाषण के वक़्त सदन के सदस्यों का बहिर्गमन तो देखा था, लेकिन इस बार हम ने राज्यपाल के बहिर्गमन का दृश्य देखा। मसला नरेंद्र भाई बनाम राहुल का नहीं है। उस से बहुत बड़ा है। सड़ांध में तेज़ी से तब्दील हो रही आचरण संहिता का है।

राजकीय और औपचारिक समाराहों में गणमान्य व्यक्तियों के बैठने के क्रम को निर्धारित करने वाली एक सरकारी सूची है। बाकी सभी तरह के शासकीय शिष्टाचार निभाने में भी इसी वरीयता सूची के मुताबिक तरज़ीह दी जाती है, जिस में सब से पहला क्रम राष्ट्रपति का होता है, दूसरा उपराष्ट्रपति का, तीसरा प्रधानमंत्री का, चौथा राज्यपालों का (अपने-अपने राज्य के भीतर), पांचवा पूर्व राष्ट्रपति और उपप्रधानमंत्री का, छटा प्रधान न्यायाधीश और लोकसभा अध्यक्ष का और सातवां केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री (अपने-अपने प्रदेश के भीतर), पूर्व उपराष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री और लोकसभा तथा राज्यसभा में विपक्ष के नेता का।

सो, क्या नरेंद्र भाई मोदी की सरकार से यह पूछना बेकार का होहल्ला मचाना माना जाएगा कि गणतंत्र दिवस की परेड में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी को किस आधार पर तीसरी कतार में बिठाया गया था? उन के साथ यह पहली बार नहीं हुआ है। स्वतंत्रता दिवस के लालकिला समारोह में भी उन्हें पांचवी-छटी कतार में बिठाने का सरकारी ओछापन देश पहले देख चुका है। ठीक है कि राहुल को इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि उन्हें किस कतार में जगह दी जाती है। मगर विपक्ष के नेता को जानबूझ कर नीचा दिखाने की इन हरकतों से सत्तासीन दल के चाल, चरित्र और चेहरे का आकलन करने वाले क्या इस छिछोरपंती को धिक्कारते नहीं होंगे?

एक व्यक्ति के नाते राहुल किसी की भी नज़र में कुछ भी हो सकते हैं – अज्ञानी, नासमझ, निरक्षर, अल्पज्ञ, असंस्कृत, वग़ैरह, वग़ैरह। मगर वे लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता हैं और उस नाते तय वरीयता क्रम का पालन उन के मामले में होना चाहिए या नहीं? इसी तरह नरेंद्र भाई को ले कर भी किसी की कुछ भी राय हो सकती है – अक्खड़, उच्छ्रंखल, स्वेच्छाचारी, निरंकुश, अहंकारी, ढीठ, वग़ैरह, वग़ैरह। लेकिन क्या उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए तय मान-प्रतिष्ठा, आवभगत और रुतबा देने से इनकार करना तुच्छता नहीं होगी?

सवाल यह नहीं है कि कौन प्रतिपक्ष का नेता बनने के लायक है या नहीं है। बिलकुल उसी तरह जैसे कि कोई प्रधानमंत्री या गृह मंत्री या वित्त मंत्री या विदेष मंत्री या लोकसभा अध्यक्ष आदि बनने के लायक है या नहीं। मुद्दा तो यह है कि अगर कोई भी किसी पद के लिए नामित हो चुका है तो उस पद से जुड़े शिष्टाचार नियमों और परंपराओं का पालन किसी भी सरकार को और उस के कारकूनों को करना चाहिए या नहीं? क्या राजनीतिक असहमतियों को सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार के शासकीय नियमों या स्थापित निजी परंपराओं की जड़ें खोदने की अनुमति दी जा सकती है?

पिछले कुछ वर्षों में संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा संविधान में उल्लिखित नियमों और परंपराओं की खुलेआम अवहेलना करने की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है। मसलन, हर साल के शुरुआती विधानसभा सत्र में राज्यपालों के अभिभाषण होते हैं। उन के इस भाषण का मसविदा संबंधित प्रदेशों की सरकारें तैयार करती है। संविधान के अनुच्छेद 176 और 163 के तहत राज्यपालों को यह भाषण अक्षरशः पढ़ना होता है और वे इस में किसी भी तरह का संशोधन या काट-छांट नहीं कर सकते हैं। वे इसे जस-का-तस पढ़ने के लिए बाध्य हैं, क्योंकि अभिभाषण राज्यपाल के निजी नज़रिए को नहीं, बल्कि मंत्रिपरिषद की नीतियों को ज़ाहिर करने के लिए दिया जाता है।

मगर अभी-अभी कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने क्या किया? उन्होंने राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण की सिर्फ़ तीन पंक्तियां पढ़ीं और बाकी के 11 पैराग्राफ पढ़ने से इनकार करते हुए सदन से बहिर्गमन कर दिया। राज्यपालों के भाषण के वक़्त सदन के सदस्यों का बहिर्गमन तो देखा था, लेकिन इस बार हम ने राज्यपाल के बहिर्गमन का दृश्य देखा। तमिलनाडु के राज्यपाल एन. रवि को हम पिछले चार साल से लगातार अभिभाषण के ज़्यादातर हिस्सों को पढ़ने से इनकार करते हुए और सदन से बीच में ही बाहर जाते देख रहे हैं। केरल के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर ने भी इस साल का अपना अभिभाषण पूरा नहीं पढ़ा और दो साल पहले राज्यपाल आरिफ़ मुहम्मद खान ने भी 61 पन्नों के अपने अभिभाषण का सिर्फ़ पहला और अंतिम पैराग्राफ ही पढ़ा था। चार साल पहले जब जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे तो वे भी अपना भाशण कभी पूरा नहीं पढ़ा करते थे और एक बार तो उन्होंने अभिभाषण के 25 पन्नों में से महज़ एक वाक्य पढ़ा और चलते बने। राज्यपालों के इस रवैए को आप कितना जायज़ ठहराएंगे?

अब इस प्रहसन के दूसरे दृश्य को देखिए। क़ानून भले न हो, मगर रिवाज़ है कि प्रधानमंत्री जब भी किसी प्रदेश में जाएंगे तो वहां के मुख्यमंत्री विमानतल पर उन की अगवानी करेंगे। अगर वे बीमारी या किसी बेहद निजी पारिवारिक व्यस्तता की वजह से ख़ुद जाने में असमर्थ हैं तो अपने किसी वरिष्ठ मंत्री को प्रधानमंत्री का इस्तकबाल करने भेजेंगे। लेकिन 2022-23 में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने कम-से-कम पांच बार ऐसा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई की अगवानी के लिए विमानतल नहीं गए। एक बार जुलाई 2022 में वे राष्ट्रपति पद के विपक्षी प्रत्याशी यशवंत सिन्हा के स्वागत को तो सुबह विमानतल गए, मगर कुछ घंटों बाद जब नरेंद्र भाई उसी विमानतल पर पहुंचे तो केसीआर को बुखार हो गया और वे प्रधानमंत्री की अगवानी के लिए नहीं गए।

जनवरी 2020 में ममता बनर्जी ने भी नरेंद्र भाई की विमानतल पर अगवानी से मना कर दिया था। उन्होंने अपने एक राज्यमंत्री को प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए भेजा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्तालिन ने पिछले साल अप्रैल में प्रधानमंत्री के किसी भी कार्यक्रम में शिरकत नहीं की। अगस्त 2023 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया भी नरेंद्र भाई को लेने विमानतल नहीं पहुंचे और बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह कह कर अपनी नाक बचाई कि चूंकि प्रधानमंत्री को सुबह-सुबह छह बजे बंगलूर पहुंचना था, इसलिए मुख्यमंत्री से हम ने ख़ुद ही कहा था कि उन्हें इतनी सुबह विमानतल पहुंचने की ज़हमत उठाने की ज़रूरत नहीं है।

विरोध ज़ाहिर करने के मक़सद से प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए मुख्यमंत्रियों के विमानतल नहीं जाने का यह छोटापन दिखाने की शुरुआत साठ के दशक में चौधरी चरण सिंह ने की थी। तब वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लेने जाने से उन्होंने खुलेआम यह कह कर इनकार कर दिया था कि मेरे राजनीतिक विचार उन के विचारों से मेल नहीं खाते हैं, इसलिए मैं उन की अगवानी के लिए नहीं जाऊंगा। मई 2003 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने भी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगवानी के लिए जाने से मना कर दिया था।

मुख्यमंत्रियों के इस रवैए को भी आप कितना जायज़ ठहराएंगे? क्या यह एक व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति की अगवानी के लिए जाने-न-जाने का मामला है या संवैधानिक पद पर बैठे एक चेहरे के अपने से वरिष्ठ संवैधानिक पद पर बैठी दूसरी शख्सियत के ख़ैर-मक़्दम का दस्तूर? रिवायतों के प्रति बेअदबी का यह भाव जिन्हें भारतीय जनतंत्र को मजबूत बनाने वाला लगता है, उन्हें फ़र्शी सलाम करिए। लेकिन इतना समझ लीजिए कि इस तरह की फ़ितरत को बढ़ावा देने वालों पर आने वाली नस्लें नाज़ नहीं करेंगी, बेतरह शर्मिंदा महसूस करेंगी। सो, मसला नरेंद्र भाई बनाम राहुल का नहीं है। उस से बहुत बड़ा है। सड़ांध में तेज़ी से तब्दील हो रही आचरण संहिता का है।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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