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स्वंतत्रता जुझारू अमर महाराणा प्रताप

हल्दीघाटी का युद्ध परीक्षा का युद्ध था, वहीं दिवेर-छापली का युद्ध निर्णायक सिद्ध हुआ। इसी विजय से संपूर्ण मेवाड़ पर उनका अधिकार स्थापित हुआ। दिवेर में राजपूतों ने हल्दीघाटी का बदला चुकाया। इस विजय ने सिद्ध कर दिया कि महाराणा प्रताप का शौर्य और संकल्प अडिग था। इस संघर्ष को कर्नल जेम्स टॉड ने मेवाड़ का मैराथनकहा है, जैसे एथेंस ने फारस को पराजित किया था।

29 जनवरी, पुण्य तिथि पर विशेष

इतिहास में वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम और दृढ़ संकल्प के लिए अमर महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, रविवार, विक्रम संवत 1597, तदनुसार 9 मई 1540 — विक्रम संवत 1653, माघ शुक्ल एकादशी, तदनुसार 29 जनवरी 1597) का जीवन स्वाभिमान और साहस का अनोखा उदाहरण है। उदयपुर, मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के राजा महाराणा प्रताप सिंह ने किसी भी परिस्थिति में मुगल शासक अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। वे वर्षों तक उससे संघर्ष करते रहे और अंततः अकबर उन्हें अधीन करने में असफल ही रहा। अपनी बहादुरी, पराक्रम, चरित्र, धर्मनिष्ठा और त्याग के कारण महाराणा प्रताप पहले से ही प्रसिद्ध थे। हल्दीघाटी, देवर और चप्पली के युद्धों में मुगलों के सफल प्रतिरोध के बाद उन्हें हिन्दूशिरोमणि के रूप में माना जाने लगा। यही कारण है कि महाराणा प्रताप की नीतियाँ शिवाजी महाराज से लेकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले बंगाल के स्वतंत्रता सेनानियों तक के लिए प्रेरणा बनीं।

राजस्थान के राजसमंद जिले में अरावली पर्वतमाला के संकरे दर्रे हल्दीघाटी में 18 जून 1576 को हुआ युद्ध इतिहास के सबसे प्रसिद्ध युद्धों में गिना जाता है। यह भारतीय इतिहास की सबसे साहसी लड़ाइयों में से एक माना जाता है। यहाँ महाराणा प्रताप ने बहुत कम संसाधनों के साथ विशाल मुगल सेना का सामना किया। इस स्थान की मिट्टी हल्दी के रंग की होने के कारण इसे हल्दीघाटी कहा गया। यह युद्ध मेवाड़ के महाराणा प्रताप और मुगल बादशाह अकबर की सेनाओं के बीच हुआ। अकबर की ओर से आमेर के राजा मानसिंह प्रथम ने सेना का नेतृत्व किया। महाराणा प्रताप की ओर से अफगान सेनापति हाकिम ख़ान सूरी, रामशाह तंवर और भील सरदार राणा पूंजा प्रमुख योद्धा थे।

इस युद्ध में महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक ने गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद दर्रा पार कर महाराणा की जान बचाई। प्रताप की सेना में भील योद्धाओं ने छापामार युद्ध पद्धति से मुगलों को भारी क्षति पहुँचाई। इस युद्ध के परिणाम को लेकर इतिहासकारों के मत अलग-अलग हैं। कुछ इसे अनिर्णायक मानते हैं, क्योंकि मुगल सेना न तो महाराणा प्रताप को बंदी बना सकी और न ही मेवाड़ को पूरी तरह अधीन कर पाई। कई ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार मुगलों के लौटने और प्रताप द्वारा पुनः भूमि-पट्टे जारी करने के आधार पर इसे महाराणा प्रताप की नैतिक और सामरिक विजय भी माना जाता है।

राजस्थान के इतिहास में 1582 ईस्वी में हुआ दिवेर का युद्ध अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने न केवल मुगलों की चौकियों पर आक्रमण किया, बल्कि सुल्तान ख़ान को पराजित कर निर्णायक विजय भी प्राप्त की। यह युद्ध उनके सैन्य पुनरुत्थान का प्रतीक बना। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मेवाड़ के उत्तरी छोर पर मदारिया और कुंभलगढ़ की पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित दिवेर का नाका अन्य नाकों से अलग और विशेष था। प्राचीन काल में इस पहाड़ी क्षेत्र पर गुर्जर प्रतिहारों का आधिपत्य था, जिन्हें यहाँ बसने के कारण ‘मेर’ कहा जाता था। आज उनकी बसाहटों के केवल अवशेष ही शेष हैं। बाद में चीकली के पहाड़ी क्षेत्रों में देवड़ा राजपूत और फिर रावत शाखा के राजपूत बस गए। इन समुदायों के दिवेर में बसने के कई कारण थे, जिनमें इसका सामरिक महत्व प्रमुख था। इसके अतिरिक्त दिवेर ऐसे मार्गों पर स्थित था, जहाँ से मारवाड़, मालवा, गुजरात और अजमेर के बीच आवागमन आसान था।

पहाड़ियों के बीच जल-स्रोतों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए बनाए गए प्राचीन अभियंत्रिकी के सुंदर उदाहरण—झरनों के बाँध, जल-कुंड और व्यापारियों तथा सैनिकों की सुरक्षा के लिए ऊँचाई पर बनी सामरिक चौकियाँ—आज भी देखी जा सकती हैं। अत्यंत संकरे और सदियों तक उपयोग में रहे इस दुर्गम मार्ग पर पत्थरों में घोड़ों की टापों से बने गहरे निशान दिखाई देते हैं। ऐसे मार्ग को स्थानीय भाषा में ‘नाल’ या ‘घाटी’ कहा जाता है। अकबर द्वारा कुंभलगढ़, देवगढ़ और मदारिया जैसे स्थानों पर अधिकार कर लेने के बाद मुगलों ने चौकियों से संपर्क बनाए रखने के लिए दिवेर को रक्षा-स्थल के रूप में चुना। यहाँ बड़ी संख्या में घुड़सवार और हाथी तैनात किए गए। आसपास की चौकियों को रसद पहुँचाने के लिए भी यह स्थान सुविधाजनक था। इस कारण प्रताप और मुगल—दोनों के लिए दिवेर अत्यंत महत्वपूर्ण था और दोनों इसे अपने अधिकार में लेना चाहते थे। इसी पृष्ठभूमि में दिवेर को लेकर दोनों पक्षों के बीच संघर्ष हुआ।

इस युद्ध की तैयारी के लिए महाराणा प्रताप ने अपनी शक्ति को सुदृढ़ करने की योजना बनाई। उन्होंने गुजरात और मालवा की ओर सैन्य अभियान भेजे और आसपास के मुगल क्षेत्रों में छापे मारने शुरू किए। इसी समय मेवाड़ के प्रधान और सैन्य व्यवस्था के प्रमुख भामाशाह ने मालवा पर आक्रमण कर 2.3 लाख रुपये और 20 हजार अशर्फियाँ एकत्र कीं। यह धनराशि उन्होंने चूलिया ग्राम में महाराणा को समर्पित की। इसी दौरान शाहबाज़ ख़ाँ के लौटने पर महाराणा ने कुंभलगढ़ और मदारिया के मुगली थानों पर अधिकार कर लिया। इन स्थानों पर नियंत्रण दिवेर पर कब्ज़े की तैयारी का संकेत था। सफलता सुनिश्चित करने के लिए महाराणा प्रताप ने नई सेना संगठित की, रसद और हथियार जुटाए तथा सैनिकों के लिए धन और सुविधाओं की व्यवस्था की। सिरोही, ईडर और जालोर के सहयोगियों का उत्साह बढ़ाया गया। सभी तैयारियाँ गुप्त रूप से की गईं, जिससे मुगलों को भ्रम हुआ कि महाराणा प्रताप मेवाड़ छोड़ रहे हैं। इस कारण मुगल सैनिक निश्चिंत हो गए।

तैयारी पूरी होने पर महाराणा प्रताप, कुंवर अमरसिंह, भामाशाह और अन्य राजपूत सरदार दल-बल के साथ दिवेर की ओर बढ़े। अन्य मार्गों पर भीलों की टोलियाँ तैनात कर दी गईं, ताकि मुगल चौकियों का संपर्क टूट जाए। महाराणा की सेना के अचानक पहुँचते ही मुगल दल में भगदड़ मच गई। सैनिक घाटी छोड़कर मैदानी क्षेत्र की ओर भागने लगे। महाराणा ने उनका पीछा किया। घाटी का मार्ग इतना कठिन था कि मैदानी युद्ध के अभ्यस्त मुगल सैनिक थक गए। अंततः दूसरे छोर पर, जहाँ कुछ चौड़ाई और जल-स्रोत था, महाराणा ने उन्हें घेरकर परास्त कर दिया। दिवेर थाने के अधिकारी सुल्तान ख़ाँ को कुंवर अमरसिंह ने भाले से मार गिराया। महाराणा प्रताप ने बहलोल ख़ाँ का भी अंत किया। एक राजपूत सरदार ने तलवार से हाथी का पिछला पैर काट दिया। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय हुई। मेवाड़ में मुगलों के सभी 36 थाने हट गए और शाही सेना भाग खड़ी हुई।

इसके बाद 1585 ईस्वी तक अकबर को मेवाड़ की ओर देखने का साहस नहीं हुआ। इससे महाराणा प्रताप को चावंड में नई राजधानी बनाकर लोकहित के कार्य करने का अवसर मिला। दिवेर की विजय उनके जीवन का उज्ज्वल कीर्तिमान है। जहाँ हल्दीघाटी का युद्ध परीक्षा का युद्ध था, वहीं दिवेर-छापली का युद्ध निर्णायक सिद्ध हुआ। इसी विजय से संपूर्ण मेवाड़ पर उनका अधिकार स्थापित हुआ। दिवेर में राजपूतों ने हल्दीघाटी का बदला चुकाया। इस विजय ने सिद्ध कर दिया कि महाराणा प्रताप का शौर्य और संकल्प अडिग था। इस संघर्ष को कर्नल जेम्स टॉड ने ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा है, जैसे एथेंस ने फारस को पराजित किया था।

दिवेर के बाद महाराणा प्रताप ने उतनी ही भूमि पुनः प्राप्त कर ली, जितनी पर उनका अधिकार राज्यारोहण के समय था। बारह वर्षों के संघर्ष के बाद भी अकबर इसमें परिवर्तन नहीं कर सका। यह काल मेवाड़ के लिए स्वर्ण युग सिद्ध हुआ। 1585 ईस्वी में अकबर का प्रभाव समाप्त हो गया। इसके बाद महाराणा प्रताप जनकल्याण के कार्यों में लगे, किंतु 19 जनवरी 1597 को चावंड में उनका निधन हो गया। यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि महाराणा प्रताप के भय से अकबर को अपनी राजधानी लाहौर ले जानी पड़ी थी।

हल्दीघाटी और दिवेर-छापली के युद्धों ने महाराणा प्रताप को भारतीय इतिहास में राष्ट्र-गौरव और हिन्दूशिरोमणि के रूप में स्थापित किया। यह उपाधि उन्हें उनकी अडिग धर्मनिष्ठा और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए दिए गए बलिदान के कारण मिली। उन्होंने राजमहलों का सुख त्याग कर घास की रोटी खाना स्वीकार किया, लेकिन विदेशी अधीनता नहीं। युद्धभूमि में भी उन्होंने उच्च नैतिक आदर्श स्थापित किए। अमरसिंह द्वारा मुगल सेनापति के परिवार की महिलाओं को बंदी बनाए जाने पर महाराणा ने उन्हें ससम्मान लौटाने का आदेश दिया। यह उनके महान चरित्र का प्रमाण है। मातृभूमि के रक्षक अमर महाराणा प्रताप को देश सदैव स्मरण करेगा और नमन करेगा।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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