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भारत में जीतेगा झूठ ही!

भारत हर दिन झूठ सुनता है। जैसे ताज़ा वाक्य है—हम बंगाल जीतेंगे और घुसपैठियों को बाहर निकालेंगे! सोचें, भाजपा ने पूरा देश बारह वर्षों से जीता हुआ है और इन बारह वर्षों में बारह दर्जन घुसपैठिए भी भारत से नहीं निकाले गए! और तो और बांग्लादेश से सटे असम, त्रिपुरा, मणिपुर से लेकर दिल्ली, बिहार, यूपी आदि सभी को मोदी सरकार ने पिछले बारह वर्षों से जीता हुआ हैं, पर कितने घुसपैठिए भारत से निकाले गए? बावजूद इसके, फिर झूठ के बूते ही भाजपा बंगाल जीतेगी! ऐसे ही बाहर वर्षों से इज़राइल हमें सीमा सुरक्षा, आतंकवाद के मामले में ड्रोन आदि हर तरह की मदद करता हुआ है, लेकिन इन्हीं बारह वर्षों में पुलवामा से लेकर पहलगाम के आतंकी हमले हुए, जो न तो सामान्य थे और न जिनका कोई ज़िम्मेदार एक भी आतंकी पकड़ा गया। बावजूद इसके, नागरिकों में भय और असुरक्षा पैदा कर उनके वोट लेते रहने के लिए आतंक मिटाने का झूठा नैरेटिव स्थायी है।

सोचें, पिछले सप्ताह नई वैश्विक क्रांति एआई का दिल्ली में कैसा मेला-तमाशा हुआ? भारत को अमेरिका, चीन जैसा एआई महाबली बताया गया। जबकि इस सप्ताह की हक़ीक़त यह है कि भारत की आईटी कंपनियों के शेयर बुरी तरह गिरे। टीसीएस, इंफोसिस जैसी नामी कंपनियों के शेयरों की कीमत 18 से 25 प्रतिशत लुढ़की। अकेले फरवरी में भारत की आईटी कंपनियों का 47 बिलियन डॉलर वैल्यूएशन खत्म हुआ है।

पर मुमकिन है इस सप्ताह से यह नया झूठ शुरू हो कि पहले से ही भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। यह छल होगा जीडीपी वृद्धि की गणना के “आधार वर्ष” को बदलकर।

इस नए आधार वर्ष के साथ भारत की सांख्यिकी एजेंसी डिजिटल सेवाओं और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे नए क्षेत्रों के योगदान को जीडीपी में बढ़ाने वाली है। मतलब जैसे एआई में भारत हवाहवाई है, वैसे ही डिजिटल सेवाओं और सोलर यानी नवीकरणीय ऊर्जा में भी बस ऐवें ही है। जबकि मैन्युफैक्चरिंग या खेती में ठोस उत्पादन या पैदावार के वास्तविक आँकड़े उपस्थित होते हैं। जैसे चीन के आँकड़े उसकी फैक्ट्रियों, खेती, इंफ्रास्ट्रक्चर, रोबोट, महानगरों के साक्ष्य से भी प्रकट हैं। मगर भारत में आगे डिजिटल खांचे से जीडीपी के आँकड़े चाहे जो हो सकते हैं।

वह भी तब, जब भारत के आईटी क्षेत्र की नामी कंपनियों को एआई की वजह से लेने के देने पड़ रहे हैं। नोट रखें, दशकों से भारत की आईटी कंपनियाँ कंप्यूटरी भाषा COBOL आधारित बैंकिंग सिस्टम, पुराने ERP प्लेटफ़ॉर्म, मेनफ़्रेम आदि के आधुनिकीकरण (legacy modernization) से अरबों रुपये कमाती रही हैं। वह सब एआई से सपाट होना है। मतलब भारत के शहरों—बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद से नोएडा, जयपुर आदि में फले-फूले 40–50 लाख आईटीकर्मी या तो छंटनी और बेरोज़गारी के मारे होंगे या अपने आपको नए सिरे से प्रशिक्षित करेंगे। मोटामोटी अनुमान है कि बहुत जल्द 20–40 प्रतिशत आईटीकर्मी निठल्ले होंगे।

बावजूद इस सबके भारत फिर दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था, एआई की महाशक्ति और विकसित भारत के नए झूठों से फिर प्रमाणित करने वाला है कि हमारी नियति “झूठमेव जयते” है।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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