राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

यूरोप-ब्रिटेन ने दिखाया गुर्दा!

लग नहीं रहा था कि यूरोपीय संघ, ब्रिटेन के नेता डोनाल्ड ट्रंप से भिड़ेंगे। सोचें, ट्रंप ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और प्रधानमंत्री मोदी पर कितना खराब बोले हैं लेकिन ट्रंप को झूठा करार देने का भारत सरकार ने एक वाक्य नहीं बोला। ट्रंप के 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने पर भी भारत का जवाबी टैरिफ नहीं है। फिर वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगुआ करवाने की ट्रंप की कार्रवाई से अलग दुनिया सहमी हुई थी। तभी ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय नेता की हल्की आनाकानी हुई  तो ट्रंप ने अपने अंहकार में फटाक ब्रिटेन, यूरोपीय संघ पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी।

और तब यूरोपीय नेता जैसे खड़े हुए तो सभी चौंके। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टार्मर, फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों, इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी, जर्मनी के चासंलर शोल्ज़ से लेकर डेनमार्क, नार्वे, यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद् के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा सभी ने ट्रंप को दो टूक जवाब दिया। घोर ट्रंप समर्थक मेलोनी का वाक्य था कि ‘ग्रीनलैंड कोई सौदे की वस्तु नहीं है। संप्रभुता पर बातचीत नहीं हो सकती’। (Greenland is not a commodity. Sovereignty is not negotiable.) ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस से, फिर संसद में साफ कहा कि हम ग्रीनलैंड की संप्रभुता के समर्थक हैं और अमेरिका का ऐसे टैक्स लगाना पूरी तरह गलत है। फ्रांस के मैक्रों, यूरोपीय परिषद् के प्रमुख एंटोनियो कोस्टा और जर्मनी के शोल्ज़ (सर्वाधिक बेबाक) के वाक्य ज्यादा मुखर थे। जैसे हम किसी भी तरह की धमकी के आगे नहीं झुकेंगे— न यूक्रेन पर, न ग्रीनलैंड पर। (No intimidation nor threat will influence us, neither in Ukraine nor in Greenland.)

नतीजतन सोशल मीडिया पर अमेरिकी झंडा पकड़े ट्रंप के ग्रीनलैंड की और बढ़ने वाले पोस्ट के बाद दावोस में ट्रंप का रंग बदला हुआ था। तभी उन्होंने दावोस में कहा कि सैनिक बल से ग्रीनलैंड नहीं कब्जाएंगे। फिर उन्होंने यूरोपीय देशों पर नए टैरिफ का फैसला भी वापिस लिया।

मगर यूरोपीय देश इससे संतुष्ट नहीं हुए। यूरोपीय संघ की पूर्व निर्धारित आपातकालीन बैठक हुई। बैठक बाद कहा गया, “यूरोपीय संघ अपनी रक्षा करेगा— अपने सदस्य देशों की, अपने नागरिकों की और अपनी कंपनियों की”। …“डेनमार्क और ग्रीनलैंड को यूरोपीय संघ का पूर्ण समर्थन प्राप्त है, और उनके भविष्य से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार केवल उन्हीं के पास है।… यह अंतरराष्ट्रीय कानून, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय संप्रभुता के उन सिद्धांतों के प्रति हमारी दृढ़ प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो यूरोप के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए अनिवार्य हैं”।

ये वाक्य मामूली नहीं हैं। इसलिए क्योंकि ट्रंप अपनी सनक में दूसरे महायुद्ध के बाद बनी विश्व व्यवस्था को बदल, जिसकी लाठी उसकी भैंस की व्यवस्था बनवा रहे हैं। ऐसा होना खतरनाक है। आखिर ग्रीनलैंड को ट्रंप ने इस तरह कब्जाया तो चीन के शी जिनपिंग को ताइवान या अरूणाचल प्रदेश कब्जाने में भला कौन रोक सकेगा? या पुतिन क्यों नहीं यूक्रेन के बाद बाल्टिक देशों पर कब्जे के लिए प्रेरित होंगे?

तभी यूरोप का ट्रंप के आगे खड़ा होना शेष विश्व के लिए महत्वपूर्ण है। यों ट्रंप प्रशासन रूकेगा नहीं। वह ध्यान बंटाने के लिए क्यूबा, ईरान की ओर बढ़ सकता है। बावजूद इसके यूरोपीय देशों ने रास्ता दिखाया है। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन, यूरोप में समझ बन गई है कि उन्हें वह महाशक्ति बनना है जो बिना अमेरिकी साथ के भी रूस, चीन के आगे खड़े हो सके। ट्रंप की रीति-नीति ने ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया सभी को जगाया है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

seven + 19 =