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चीनी टैंक-सैनिक बढ़ रहे थे मोदी कमडंल ढूंढ रहे थे!

सोचे, कल्पना करें भारत के सेनापति के 31 अगस्त 2020 की रात 8.15 बजे से 10.30 तक के क्षणों पर। तब चार टैंक लिए चीनी पैदल सेना भारत की सीमा की और बढ़ रही थी। कहां? लद्दाख के रेज़िन ला इलाके में। उत्तरी कमांड के जनरल योगेश जोशी ने 8.15 बजे भारत के सेनापति जनरल एमएम नरवणे को फोन पर चीनी सैनिकों, टैंकों के बढ़ने की आपतकालीन सूचना दी और पूछा–क्या आदेश है? थलसेना प्रमुख जनरल नरवणे ने तुरंत रक्षा मंत्री, एनएसए, विदेश मंत्री, एनएसए, सीडीएस को फोन किया। संकट और उसकी गंभीरता बताई। और ‘आदेश’ के लिए कहां। शायद इसलिए भी क्योंकि सेना को आदेश था कि ‘सबसे ऊपर से मंजूरी मिलने तक गोली नहीं चलानी है।’ पर थलसेना प्रमुख के लगातार फोन करने, आदेश मांगने के बावजूद न कोई आदेश! न सुरक्षा मामलों की केबिनेट सीसीएस की आपतकालीन बैठक।

ले.जनरल योगेश जोशी ने 9.10 पर वापिस सेना प्रमुख को फोन कर पूछा कि क्या आदेश है? ले. जनरल ने सेना चीफ को सूचना दी टैंक आगे बढ़ते जा रहे हैं, और अब वे चोटी से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर हैं, आदेश दे? सेना प्रमुख ने फिर सभी को (रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, एनएसए अजित डोभाल और सीडीएस जनरल बिपिन रावत) फोन किया, ताजा स्थिति बताई और साफ निर्देश मांगे। “हालात तनावपूर्ण थे। फोन लगातार बज रहे थे।”

जनरल नरवणे की किताब के जो अंश सामने आए हैं उसके मुताबिक उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है, “हर किसी से मेरा एक ही सवाल था, ‘मेरे आदेश क्या हैं? “हर किसी से मेरा एक ही सवाल था, ‘मेरे आदेश क्या हैं?’  … पीएलए कमांडर मेजर जनरल लियू लिन के साथ हॉटलाइन पर (सेनाधिकारियों ने) बातचीत की। इसमें सुझाव दिया गया था कि दोनों पक्ष कोई भी कदम न उठाएं और अगले दिन सुबह 9.30 बजे दोनों स्थानीय कमांडर दर्रे पर मिलें। इसकी सेना प्रमुख ने रात 10 बजे रक्षा मंत्री और एनएसए को जानकारी दी। “मैंने अभी फोन रखा ही था कि 10.10 बजे ले.जनरल योगेश जोशी ने फिर फोन किया। उसने बताया कि टैंक फिर से आगे बढ़ने लगे हैं और अब सिर्फ करीब 500 मीटर दूर हैं।,”

सेना चीफ ने फिर ऊपर फोन किया। पर कोई स्पष्ट आदेश नहीं। इसलिए क्योंकि ‘सबसे ऊपर से’ किसी को निर्देश नहीं था। आखिरकार रात 10.30 बजे सेनापति को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, “जो उचित समझो, वह करो।”

सोचें, वह जवाब, वह समय, वे क्षण भारत के सेनापति के लिए कितने भारी रहे होंगे। जिस ‘सबसे ऊपर’ यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आदेश आना था वह कहां थे? क्यों दुबके हुए थे? क्या वे मिजाज अनुसार हैरान-परेशान-भयाकुल कमंडल नहीं तलाश रहे होंगे? मेरा क्याजी मैं तो कमंडल उठा कर चल पड़ूंगा। शासन के कायदे (शास्त्री के पाकिस्तान से लड़ने से लेकर कारगिल के वाजपेयी संकट में कैबिनेट कमेटी की बैठक परंपरा) अनुसार प्रधानमंत्री को क्या एनएसए, कैबिनेट सचिव को देश की सुरक्षा पर आए आकस्मिक खतरे में सीसीए यानी सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक बुलानी नहीं चाहिए थी? प्रधानमंत्री ने सेनापति को घर बुलाकर मंत्रणा भी नहीं की। ध्यान रहे भारत का सेनापति दिल्ली में ही रहता है। ये सभी आला चेहरे लुटियन दिल्ली के एक किलोमीटर के दायरे में रहते हैं। मगर सेना प्रमुख बस इंतजार करते रहे ‘सबसे ऊपर..’ के दो शब्द सुनने के लिए।

और दो घंटे की सतत कोशिश के बाद उन्हें इतना भर कहा गया, “जो उचित समझो, वह करो”।

सलाम सेनापति जनरल नरवणे और उत्तरी कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल जोशी को जो इन्होंने तय किया कि चीनी सेना को रोकने का एकमात्र तरीका मध्यम तोपखाने से फायर खोलना है। बकौल नरवणे की पुस्तक, ‘जो (लेफ्टिनेंट जनरल जोशी) तैयार और तैनात था। पर मैंने उन्हे कहां, “‘हम पहली गोली नहीं चला सकते,’ …“इसकी बजाय, मैंने उनसे कहा कि हमारे टैंकों की एक टुकड़ी को दर्रे की आगे की ढलानों तक ले जाएं और तोपों को नीचे की ओर झुका दें, ताकि पीएलए सीधे हमारी तोपों के मुंह देखे”, जनरल नरवणे लिखते हैं, “यह तुरंत किया गया और पीएलए के टैंक, जो तब तक चोटी से कुछ सौ मीटर की दूरी पर आ चुके थे, वहीं रुक गए”। “उनके हल्के टैंक हमारे मीडियम टैंकों का मुकाबला नहीं कर पाते। यह एक ब्लफ़ का खेल था और पीएलए (चीनी सेना) ने कदम पीछे खींच लिए”।

उन क्षणों में अपने आपको अकेले पाने, वैधानिक राजनीतिक कमांड द्वारा बला टालने की अनहोनी ने ही शायद जनरल नरवणे को आत्मकथा (‘फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी’) लिखने के लिए प्रेरित किया होगा। मैंने किताब नहीं पढ़ी न देखी। एक जानकार ने बताया इसमें फॉरवर्ड जनरल वीके सिंह का लिखा है। दूसरी बात इसके प्रकाशन में मोदी सरकार ने अड़ंगा डाला हुआ था। तीसरी बात, राहुल गांधी के संसद में हंगामे का सप्ताह हो गया है पर सरकार का न कोई खंडन है और न जनरल नरवणे को झूठा करार दिया है। न देश को ज्ञान दिया गया कि भगवानश्री मोदीजी तब ध्यान अवस्था में थे तो कह दिया, “जो उचित समझो, वह करो”। और भारत के हिंदुओं चमत्कार देखो भगवानजी का वचन जनरल ने सुना और उनकी बुद्धि जागी और उसके आगे फिर चीनी टैंक ठिठक कर रूक गए।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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