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हिंदू न बढ़ई बनेगा न एआई बॉस

वैसे मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार नागेश्वरन ने गलत नहीं कहा। सोचें, पश्चिमी सभ्यता, चीन यदि बुद्धि बल से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का साम्राज्य बनाकर दुनिया पर राज करने के कगार पर है तो भारत की आश्रित भीड़ क्या करेगी? या तो एआई डाटा सेंटरों का रखरखाव करेगी या संविदा के ठेकों से इन सेंटरों में झाड़ू-पोंछा लगाएगी। निश्चित ही एआई से लोगों की नौकरियां (खासकर व्हाइट कॉलर) खत्म होनी हैं। तब भारत की भावी 160 करोड़ आबादी के लिए करने को क्या होगा?

उस नाते नागेश्वरन ने ठीक कहा, लोगों को बढ़ई, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन जैसे व्यवहारिक कौशल सीखने चाहिए। पर कहने या चाहने से भारत में भला कुछ होता है? याद है प्रधानमंत्री मोदी का स्किल इंडिया (Skill India) अभियान। क्या हुआ? किसी हिंदू घर में कभी सुनने को मिला है कि उनका बेटा, बेटी कारपेंटर बने हैं? या प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन की ट्रेनिंग ली है। जबकि ठीक विपरीत मुसलमान के घर-घर की कहानी में आज बढ़ई, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, रिपेयरिंग, मैकेनिक, फैब्रिकेटर, चिनाई यानी मेहनत करने, हाथ काले करके, कुशल कारीगर बन कर दबाकर पैसा कमाने का रिकॉर्ड है।

तभी बढ़ई बनने की नसीहत हिंदू के मतलब की है, न कि मुस्लिम आबादी के लिए।

हां, मुसलमान को संकट नहीं है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह, संघ परिवार की बारह वर्षों की नंबर एक उपलब्धि मुस्लिम आबादी का आर्थिक सशक्तीकरण है। मेहनत और कौशल दोनों में मुसलमान अब हिंदू की आवश्यकता है। मुसलमान सरकार का फ्री राशन, लाभार्थी योजनाओं का लाभ ले रहा है तो मेहनत और दबाकर कमाई भी कर रहा है। यह जमात परजीवी (कॉकरोच) नहीं है। मोदी सरकार की कॉकरोच उपलब्धि हिंदुओं की दास्तां है। हिंदू समाज श्रम, मेहनत का सम्मान वैसे ही गंवा बैठा है जैसे सत्य, बुद्धि, साहस, स्वाभिमान और उद्यमिता गंवा चुका है। सब नौकरी, धर्मादे, खैरात और धंधे यानी फटाफट मुनाफे की भूख में हैं।

भारत में फिलहाल 35 वर्ष से कम उम्र की नौजवान आबादी 65 प्रतिशत है। इनमें बहुसंख्यक बिना परीक्षा या कोचिंग की पढ़ाई की रट्टामार डिग्रियां लिए हुए हैं। इनकी डिग्रियों के आगे देशी–विदेशी कंपनियां यह रोना लिए हुए हैं कि इंजीनियर, एमबीए, एमबीबीएस आवेदकों में कुशलता का भारी टोटा है। ट्रेनी रखकर पहले प्रशिक्षित करना होता है। जाहिर है भारत में सीखने, समझने, मेहनत की पूरी प्रणाली दीमक की मारी है। इसका अनुभव सभी को है मगर उससे मुक्ति का समाधान कोई नहीं।

सोचें, प्रधानमंत्री मोदी ने बारह वर्षों में कितने जुमले फेंके? कभी स्किल इंडिया, कभी स्टार्टअप इंडिया, कभी मेक इन इंडिया, कभी विश्वगुरु, कभी एआई पावर। कभी सेमीकंडक्टर की बात तो कभी रोबोट इंडिया (याद है कैसे भारत के एक विश्वविद्यालय ने चीन के रोबोट कुत्ते से अपनी झांकी बनाई) और अब बढ़ई इंडिया बनाने की आवश्यकता का बोध।

पर हिंदू नहीं बनेंगे बढ़ई या कौशल से भरे मेहनती। इन सबके आगे मोदी सरकार का आदर्श है धंधा इंडिया। खरीदने-बेचने का वह बाजार जिसमें मुनाफे, पैसे, लूट की भूख में लोग टोपी पहनाना सर्वाधिक लाभदायी मानते हैं। तभी एक तरफ आर्थिक सलाहकार ने बढ़ई, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियनों का कुशल भारत बनाने की बात की, वहीं दूसरी तरफ मुकेश अंबानी ने जुमला फेंका कि भारत को वैश्विक एआई हब और ‘स्वदेशी एआई’ का केंद्र बनाना है। अर्थात अमेरिकी कंपनियों के साथ साझेदारी बना कर उनके लिए डाटा सेंटर खोलेंगे लेकिन भारत के लोगों को उल्लू बनाने के ‘स्वदेशी’ जुमले के साथ। दुनिया के विकसित देश डाटा सेंटरों से बिजली, पानी और प्रकृति के नुकसान का रोना लिए हुए हैं लेकिन अंबानी, अडानी भारत के लोगों को एआई आश्रित बनाने की अमेरिकी कंपनियों की संभावना के वैसे ही भागीदार बन रहे हैं जैसे बाकी मामलों में (फेसबुक से लेकर तमाम विदेशी ब्रांडों के भारत विक्रेता) भारत के बाजार को आश्रित, गुलाम बनाया है।

सो, 21वीं सदी का हिंदू काल न कौशल प्राप्ति का है और न एआई बना सकने, उससे कंपीट करने की बुद्धि का है। भारत अब भय, भूख, भक्ति के उस कैंसर का मारा है जो सभ्यता को आश्रित बनाती है या खत्म करती है। भारत को मालूम नहीं है कि अगले बीस वर्षों में वैश्विक बुद्धि दुनिया को किधर ले जाएगी और भारत कैसा आश्रित होगा? भारत सरकार के तीर-तुक्के परजीवी कॉकरोच पैदा करने वाले ही हैं। जब पूरा देश ही लाभार्थी (भारत का क्रोनी पूंजीवाद भी लाभार्थी, कॉकरोच श्रेणी का है) हो जाए तो क्यों कर कोई बढ़ई बने और कैसे वह बुद्धि खिलेगी जो एआई की नई क्रांति से अपना कुछ बना पाए।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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