मैं प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के समय से भारत के इज़राइल से संबंधों का हिमायती हूं। उस नाते प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने जनवरी 1992 में हिम्मत दिखाकर इज़राइल से पूर्ण राजनयिक संबंध बनाए और राजदूतों की नियुक्ति हुई, तब मैंने इसी कॉलम में वाह की थी। मगर इस सप्ताह नरेंद्र मोदी और नेतन्याहू के फोटोशूट में तो ग़ज़ब ही हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने इज़राइल की संसद केनेस्सेट में भाषण से दो देशों का वह मिलाप बनाया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने दुनिया, पश्चिमी एशिया, इस्लामी–अरब देशों की जमात सभी को बता दिया कि भारत केवल इज़राइल का सगा है। पता नहीं मोदी का भाषण किसने लिखा, मगर जब उन्होंने खुद अपनी ज़ुबानी कहा है तो यह साफ जाहिर हुआ मानो उनकी कूटनीति का एकमेव सत्य भारत और इज़राइल एक-दूसरे के लिए! सो मोदी ने सिंधु घाटी और जॉर्डन घाटी का उल्लेख कर आदिकाल में बने भारत-इजराइल संबंध बताए। उन्होंने ‘तिक्कुन ओलाम’ (दुनिया को सुधारने का हिब्रू विचार) और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (संसार एक परिवार है) को साथ रखा। उन्होंने हनुक्का और पुरिम को दीवाली और होली से जोड़ा।
मतलब कूटनीति, व्यापार और सहयोग अपनी जगह असल बात- मोदीजी ने जैसे रामलला की ऊंगली पकड उन्हे मंदिर में बैठाया वैसे ही उनके सौजन्य से दो प्राचीन सभ्यताओं मतलब फादरलैंड व मदरलैंड का अंततः हुआ मिलाप । मोदी ने स्वंय संसद में फादरलैंड, मदरलैंड शब्द का उपयोग किया। हालांकि उनका वाक्य यह परिप्रेक्ष्य लिए हुए था कि इज़राइल में रह रहे भारतीय मूल के यहूदी समुदाय भावनात्मक रूप से इज़राइल को अपनी पितृभूमि और भारत को अपनी मातृभूमि मानते हैं। वे दृढ़ता से मानते हैं कि इज़राइल उनकी पितृभूमि है और भारत उनकी मातृभूमि।
इस वाक्य के अलावा भाषण में सिंधु घाटी और जॉर्डन घाटी की दो सभ्यताओं के मिलाप और “अम यिस्राएल खाई” के साथ “जय हिंद” का नारा भी बोला। कुल मिलाकर भारत और इज़राइल के अस्तित्व और यात्रा की एक साझा कथा बनाते हुए फादरलैंड, मदरलैंड की तुकबंदी बनाई। इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू तथा इज़राइली मीडिया का गदगद होना स्वभाविक था। यों भी नेतन्याहू ने स्वागत भाषम में ही मोदी का यह कहते हुए अभिनंदन किया—“7 अक्टूबर के भयानक नरसंहार के तुरंत बाद आप स्पष्ट, नैतिक और दृढ़ता से इज़राइल के साथ खड़े हुए। आपने डगमगाहट नहीं दिखाई। आपने बहाने नहीं बनाए। आप सच के साथ खड़े रहे।”
इसलिए सोशल मीडिया में फादरलैंड, मदरलैंड की तुकबंदी अपनी जगह है मगर असल बात है कि भारत–इज़राइल के सामरिक–सैनिक संबंध ठोस हो गए हैं। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ सुरक्षा संधि कर अपना जो रणनीतिक दांव चला, उसके जवाब में भारत–इज़राइल की फादरलैंड, मदरलैंड वाली साझेदारी की अब कोई काट नहीं है। हो इसलिए यदि अगले सप्ताह अमेरिका ने ईरान पर हमला किया, तो भारत की विदेश नीति में ईरान के लिए आँसू नहीं होंगे। इसका एक और पुख्ता निष्कर्ष यह भी है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो कहेंगे, जो चाहेंगे, उस पर मोदी सरकार ना-नुकूर नहीं कर पाएगी।
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