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पूरी पीढ़ी की स्मृति में रहेगा आंदोलन

तभी जब आंदोलन शुरू हुआ तब सरकार और विपक्ष दोनों में किसी को अंदाजा नहीं था कि देश के युवाओं में इतना गुस्सा भरा हुआ है। तभी सब खामोश थे या अपनी पारंपरिक राजनीति में रमे हुए थे। दूसरी ओर युवा इस आंदोलन को बारीकी से देख रहे थे। उनके अंदर यह भावना थी कि लद्दाख से आया हुआ एक व्यक्ति उनके लिए भूख हड़ताल कर रहा है। तभी जब 18 जुलाई की सुबह सोनम वांगचुक को पुलिस ने जंतर मंतर से उठाया उसके बाद छात्रों और युवाओं के धैर्य का बांध टूट गया। उन्होंने जंतर मंतर की ओर कूच किया। 19 जुलाई की रात को जंतर मंतर पर जैसा माहौल था वह अद्भुत था। कंधे पर बस्ता टांगे बच्चे अपने आप वहां पहुंच रहे थे। तभी 20 जुलाई की सुबह, जो नजारा दिखा वह अद्भुत था। किसी ने कहा था कि फ्रांस की गौरवशाली क्रांति के समय जीवित होना बड़ी बात थी लेकिन युवा होना तो स्वर्गिक था। कुछ उस तरह का माहौल और उस तरह की फीलिंग सिर्फ जंतर मंतर पर नहीं, बल्कि पूरी दिल्ली कि फिजां में थी।

इस आंदोलन का अब चाहे जो नतीजे निकले लेकिन यह तय मानें कि एक पूरी पीढ़ी की स्मृति में यह बात दर्ज हो गई कि वे अपने अधिकार के लिए जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए और पुलिस ने लाठी चला कर, आंसू गैस के गोले छोड़ कर या पानी की बौछार करके उनका हौसला तोड़ने की कोशिश की। सबको पता है कि पुलिस कामयाब नहीं हुई। पुलिस और सरकार की नाकामी भी एक पूरी पीढ़ी की स्मृति में दर्ज हो गई है।

यह वो पीढ़ी है, जिसने भारत की राजनीति को परिभाषित और प्रभावित करने वाली तीन दशक पहले की घटनाओं को नहीं देखा है। उनके लिए यह सबसे बड़ी घटना है। उनका राजनीतिक और मतदान व्यवहार भी इस घटना से प्रभावित होगा। तभी 20 जुलाई के बाद से सरकार और भाजपा के हाथ पांव फूले हैं। उनको समझ में आ रहा है कि इस पीढ़ी के लिए अयोध्या के मंदिर की स्मृति चढ़ावा चोरी वाली है और शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था को लेकर उनकी स्मृति लाठीचार्ज वाली है। तभी देश भर के छात्र व युवा इस आंदोलन से जुड़े और बिना कहे उन्होंने हर गांव, कस्बे और शहर में एक जंतर मंतर बना दिया।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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