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इतनी बुरी गत किसी प्रधानमंत्री की नहीं हुई!

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कौन प्रधानमंत्री ऐसे बदनाम हुआ? इतना खलनायक हुआ? कौन गालियों का ऐसा पात्र बना? और क्यों? इसका जवाब एक प्रौढ़ महिला ने सोमवार, 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर दिया। मैंने उसे सोशल मीडिया पर सुना। उसने कहा, ‘भारत ने bad (बुरी) सरकारें देखी हैं लेकिन ऐसी Evil (दुष्ट, क्रूर, नीच) सरकार कभी नहीं’! प्रौढ़ महिला हिंदू थी, पढ़ी-लिखी थी। और यह वाक्य सचमुच स्वतंत्र भारत के 14 प्रधानमंत्रियों के इतिहास में नरेंद्र मोदी के शासन की वह सच्चाई है, जो इतिहास में अमिट रहेगी। इस वाक्य को सुन मुझे भी अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के 12 प्रधानमंत्रियों के चेहरे याद हो आए। आप भी याद करें, पिछले 12 सालों में केवल प्रधानमंत्री मोदी के झूठों को, लोगों को बेवकूफ बनाने वाले जुमलों को, समाज को बांटने या दुनिया में भारत को ‘कॉकरोच’ बनाने वाली मूर्खताओं पर। और फिर बाकि प्रधानमंत्रियों पर।

क्या ऐसा डा. मनमोहन सिंह, वाजपेयी से लेकर इंदिरा गांधी, नेहरू का कोई रिकॉर्ड है?

मैंने 12 प्रधानमंत्रियों को पत्रकार के रूप में देखते, सुनते, समझते इनके हर समय के नैरेटिव का अनुभव लिया है। 1977 में दिल्ली के जंतर-मंतर के ही एक छोर पर कस्तूरबा गांधी मार्ग में हिंदुस्तान टाइम्स की बिल्डिंग के बाहर खड़े हो कर मैंने इंदिरा गांधी के रायबरेली से हारने और राजनारायण के जीतने की खबर सुनी थी। जनता ने जोश भरे हुंकारे में अपनी जीत का तब जश्न मनाया था। बावजूद इसके इंदिरा गांधी को वैसी गालियां मिलती नहीं सुनीं जो इस सोमवार से जंतर-मंतर पर नौजवानों के उस सैलाब में सुनने को मिलीं है जो 35 वर्ष से नीचे की 60-65 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधि है! फिर भले लड़के हों या लड़कियां या महिलाएं!

सन् 2011-12 में जंतर-मंतर पर ही मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ नौजवानों के नारे थे, पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोई झूठा, दलाल या देश बेचने वाला रंडवा, भगोड़ा आदि (वे शब्द, जिन्हें सुनना, बोलना, लिखना मेरे लिए असंभव है) नहीं कह रहा था। मैं सोशल मीडिया नहीं देखता हूं। पर कहते हैं भारत के घरों में सोशल मीडिया से मोदी को दी जा रही गालियों पर मजा लिया जा रहा है। जो नौजवान 2014 में मोदी को वोट देने के लिए मरा जा रहा था, जो मोदी को भगवान और विश्वगुरू करार दे रहा था, वही आज मोदी को ऐसे-ऐसे संबोधनों से चिन्हित कर रहा है, जो संभवतया दुनिया के किसी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को शायद ही कभी मिले हों।

हां, वैश्विक पैमाने पर भी सोचें। दुनिया में उन नेताओं को बहुत गालियां मिली हैं, जिन्होंने नरसंहार, तानाशाही का पशुपन दिखाया। पर स्टालिन, हिटलर, माओ से लेकर पोल पोट, ईदी अमीन, चिली के पिनोशे, अफगानिस्तान के मुल्ला उमर या हाल में तख्तापलट वाली बांग्लादेश की हसीना वाजिद, नेपाल के केपी शर्मा ओली आदि सभी की गालियों की दास्तां उनकी विचारधारा केंद्रित क्रूरता, नरसंहार, सत्ता की भेड़िया भूख, धर्मांधता जैसे कारणों से है। वह पूरी सत्ता या सिस्टम या सरकार के खिलाफ था। जबकि नरेंद्र मोदी का मामला अनूठा है। हिंदुओं की व्यक्तिगत भक्ति का कल्कि अवतार अब हिंदू लड़के-लड़कियों में ही उस ठग के रूप में है, जिस पर जंतर-मंतर के यूथ उबाल में यह पछतावा करता हुआ है कि हां, मैंने भी अपने मां-बाप के साथ मोदी को वोट दिया था। लेकिन मुझे घरवालों ने ही कहा- जाओ दिल्ली, जंतर-मंतर!

और जंतर-मंतर पर पुलिस-सुरक्षा बलों की पूरी फौज नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह के लिए युवाओं से गालियां निकलवाते हुए है। नौजवान उस रचनात्मकता, बेलौस अंदाज में तख्तियों, मीम, पोस्टर, मोदी के फोटो के साथ जूते लटकाए हुए डायलॉग मार रहे हैं, जिसकी कल तक कल्पना नहीं थी।

यह नोट रखें कि नौजवानों के लिए न तो सोनम वांगचुक का अर्थ है और न कथित कॉकरोच पार्टी के चेहरों या पदाधिकारियों का। नई पीढ़ी अनुभवों के गुस्से में, अपनी दशा, अपने साथ झूठ, धोखे, फरेब-ठगी से घायल है। सभी केवल और केवल मोदी पर केंद्रीत है।

ऐसा स्वतंत्र भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ। इमरजेंसी से पहले और बाद में इंदिरा गांधी को गालियां मिलीं थी, पर उसमें राजनीति, गैर-कांग्रेसवाद, विचार, अनुभव सब थे। ‘गली-गली में शोर है, इंदिरा गांधी चोर है’ जैसे नारे जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने बच्चों को बिल्ले बांटते हुए बताए थे। अब बच्चे खुद ही गढ़ रहे हैं।

सभी के निशाने में केवल एक व्यक्ति नरेंद्र मोदी हैं। बच्चे, लड़के-लड़कियां, युवा के दिल-दिमाग में मोदी एकमेव हैं। अमित शाह और चुनाव आयोग के लिए संभव है कि वे जंतर-मंतर के कॉकरोचों की भीड़ से फोटो स्कैन कर इन सभी के नाम वोटर लिस्ट से काट दें। मतलब मोदी-शाह गालियों के बावजूद यूपी आदि के चुनाव जीतते जाएं। लेकिन अब वह जैविक नौजवान जोश कभी नहीं लौटेगा, जिसने कभी कभी घर-घर हर-हर मोदी बनाया था। चुनाव प्रक्रिया में कितनी ही तरह की ठगी रची जाए, राज चलता जाए, पर समय के साथ मोदी की स्मृति की गालियां भी बढ़ती जानी हैं।

इसलिए क्योंकि आगे वाले दिनों में बुरे दिनों के अनुभव अनिवार्यतः जुड़ने है। आगे मोदी सरकार में दैनंदिन जीवन की बदहाली और दर्ज होनी है। संभव ही नहीं है जो अच्छे दिन, छप्पन इंची छाती, विश्वगुरु, आत्मनिर्भर भारत, भ्रष्टाचार मुक्त भारत, महंगाई मुक्त भारत, सबका साथ-सबका विकास, हर हाथ को काम या शिक्षा-चिकित्सा में मोदी से कुछ भी पॉजिटिव बने। अपना अब वे जितना प्रोपेगेंडा रचेंगें उतने ही नेगेटिव मोदी बनेंगे। वह भी सोशल मीडिया के भोकाल वाली युवा जुबानी।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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