गुरूवार को भोपाल में भाजपा की चुनाव तैयारियों की बड़ी बैठक हुई। शनिवार को जयपुर में बैठक है। इनमें मंदिर को लेकर माहौल और माहौल को दो-ढ़ाई महिने बनाए रखने के रोडमैप पर विचार होता है तो लोकसभा चुनाव की ठोस रणनीति भी बनती हुई है। मतलब यह कि प्रदेश में विधानसभा चुनावों की थकान, सरकार-मंत्रिमंडल के गठन, विधायकों-मंत्रियों से स्वागत दौरे जैसे काम पूरे हुए नहीं उससे पहले ही प्रदेशों में भाजपा ने अपने आपको लोकसभा चुनाव की तैयारियों में झोंक दिया है।
जबकि ठिक विपरित छतीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान में कांग्रेस इस वक्त पूरी तरह हताश, लावारिश, बिखरी और बिना नेतृत्व के है। और उत्तर भारत में यह हर तरफ है। तय माने ऐसा अयोध्या में मंदिर कार्यक्रम, गणतंत्र दिवस और राहुल गांधी की यात्रा की भूमिका बनने (मतलब उत्तरपूर्व व बंगाल तक की उनकी यात्रा) तक रहेगा। कांग्रेस किसी स्तर पर भाजपा के गढ (यूपी, गुजरात, एमपी, राजस्थान, छतीसगढ़, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, हिमाचल, जम्मू, चंडीगढ) की 207 लोकसभा सीटों में जमीनी चुनावी तैयारियां करते हुए, कमर कसते नहीं दिख रही है। यह बात इंडिया एलायंस के अखिलेश यादव व जयंत चौधरी पर लागू है तो अरविंद केजरीवाल पर भी लागू है।
लग रहा है भाजपा भाजपा उम्मीदवारों की सूचियां जनवरी आखिर से आनी शुरू हो जाएगी। इससे पहले संगठन नेता, संघ-भाजपा मशीनरी राम मंदिर के आयोजन के प्रचार में घर-घर हवा बनाते हुए है तो उम्मीदवारों की छंटनी, संगठनात्मक बंदोबस्त करते हुए भी है तो कांग्रेस में तोड़फोड की संभावनाएं भी टटोली जा रही है।
इसलिए क्या न माना जाएं कि राम मंदिर की हवा में उत्तर भारत की 207 सीटों में कांग्रेस और इंडिया एलायंस रामभरोसे ही रहेगा। यों विपक्ष में सीटों के बंटवारे पर विचार-विमर्श है लेकिन पार्टियों में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की एकुजटता बने, आर-पार की लड़ाई का जुनून बने, ऐसा कुछ होता हुआ नहीं है। वजह यह भी है कि नरेंद्र मोदी इसका मौका ही नहीं बनने दे रहे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक के बाद एक, हर दिन के कलेंडर में घटनाओं की भरमार और उन पर मीडिया में नैरेटिव का सिलसिला ऐसा भारी है कि विपक्षी नेता करे तो क्या करें? कैसे तो नेता-संगठन सक्रिय हो, भीड़ जुटे और कवरेज मिले। इसलिए उत्तर भारत की इन 207 सीटों पर दमदारी से चुनाव लडने की हवा बनाना भी आसान नहीं है!
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