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कोरोना में भी चुनाव अब भी चुनाव!

प्रधानमंत्री मोदी ही नहीं, केंद्र सरकार के कभी मंत्रियों के चुनाव अभियान को देखें। भाषण सुने कहीं से भी नहीं लगेगा कि भारत में कोई संकट है। पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से दुनिया भले परेशान हो लेकिन भारत पर असर नहीं हो रहा है। इसका मैसेज भी बनवा दिया है। दुनिया भी हैरान होगी कि ऐसा कैसे हो रहा है कि 140 करोड़ लोगों का देश, जो पूरी तरह से अपनी ऊर्जा जरुरत के लिए आयात पर निर्भर है वह इतना बेफ्रिक है। लेकिन अगर दुनिया भर के देश कोरोना महामारी के समय भारत सरकार की बेपरवाही देखे होते तो उनको पता चलता।

संयोग से उस समय भी यही समय चल रहा था। मार्च और अप्रैल का ही महीना था, जब कोरोना महामारी की सबसे घातक लहर आई थी। चारों तरफ मौतें हो रही थीं। गंगा किनारे शव दफनाए जाने की तस्वीर आ रही थीं। शव गंगाजी में बह रहे थे। 24 घंटे शमशान में चिताएं चल रही थीं फिर भी लोगों को कई कई दिन तक इंतजार करना पड़ा रहा था। सड़कों पर ऑक्सीजन की कमी से लोग मर रहे थे। लेकिन सरकार चुनाव प्रचार में व्यस्त थी।

सोचें, पश्चिम बंगाल की 294 सीटों का चुनाव 2021 में कोरोना की सबसे घातक लहर के बीच आठ चरणों में संपन्न हुआ था। देश में बाकी सारी चीजों पर पाबंदी थी। कंपनियां बंद थीं, दुकाने और स्कूल आदि बंद थे, ट्रेनें बंद थीं या सीमित ऑपरेशन हो रहा था, लॉकडाउन लगा हुआ था लेकिन सभाएं हो रही थीं। प्रधानमंत्री मोदी की रैलियां हो रही थीं। मोदी बंगाल जीत लेने के लिए जी जान से लड़ रहे थे। समझदार लोग चुनाव के चरण कम करने और चुनाव जल्दी समाप्त करने की मांग कर रहे थे। लेकिन चुनाव जीतने का जज्बा ऐसा हाई था, सब जगह प्रचार और रैली के जाना था।

हालांकि अंत में आखिरी एक दो चरणों में चुनाव की रैलियों पर रोक लगी। लेकिन कोरोना महामारी की सबसे घातक लहर में भी सब कुछ सामान्य दिखाते हुए चुनाव प्रचार को प्राथमिकता दी गई थी।

वैसा ही अब भी हो रहा है। अब भी चुनाव प्रचार चल रहे हैं। चुनाव प्राथमिकता है और पश्चिम एशिया के संकट से निपटने की जरुरत बहुत महत्व नहीं रखती है। वह रूटीन का काम है। चुनाव तो पांच साल में एक बार आता है और अगर चुनाव नहीं जीते तो कैसे जिंदा रह पाएंगे। गैस नहीं है तो लकड़ी और कोयले से खाना बन जाएगा। फैक्टरी बंद हो जाएगी तो क्या हुआ पांच किलो अनाज तो दिया जा रहा है। बिजली आ रही है और डाटा सस्ता हो गया है। इसलिए पश्चिम एशिया के संकट की ज्यादा चिंता नहीं करनी है। चुनाव लड़ना, चुनाव प्रचार करना और रैलियों मे यह बताना कि सब कुछ ठीक है, ज्यादा जरूरी है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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