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भारत चंगा, सब अच्छा!

ऑस्ट्रेलिया, जापान, खाड़ी देश, अफ्रीका, फ्रांस, यूरोप, ब्रिटेन से लेकर अमेरिका, सभी चिंता में हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने कोविड के बाद पहली बार राष्ट्र को संबोधित कर समय खराब होने की हकीकत बताई। वहीं पाकिस्तान, चीन, मलेशिया तीनों मिल कर ईरान से तेल टैंकरों की आवाजाही सुरक्षित करने की कूटनीति कर रहे हैं। ईरान-ओमान खाड़ी को अपनी जागीर बनाने, टोल वसूलने का प्रोटोकॉल सोच रहे हैं। पुतिन तेल रिफाइनरियों के रखरखाव के बहाने सप्लाई कम करने की बातें कर अपना भाव बढ़ा रहे हैं। वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति जापान, दक्षिण कोरिया जाकर राष्ट्रपति ट्रंप की धौंस की काट की भूमिका बना रहे हैं। और आज सुबह ‘बीबीसी’ पर चर्चा में मालूम हुआ कि कैसे कच्चे तेल के ‘फ्यूचर’ बैरल दाम 140 डॉलर के पार हैं!

और पूरी दुनिया के सबसे बड़े आयातित गैस-तेल आश्रित 140 करोड़ लोगों का देश भारत क्या कर रहा है? बंगाल के चुनाव और हिंदू बनाम मुस्लिम वोट में खोया हुआ है! प्रधानमंत्री मोदी की सर्वोच्च चिंता विधानसभाओं के चुनाव जीतना है। वे इसकी उधेड़बुन में इस हद तक हैं कि 16 से 18 अप्रैल को संसद की फिर बैठक बुलाई है। लोकसभा में महिलाओं की सीटें आरक्षित कराएंगे! ताकि बंगाल की महिला मतदाता गैस सिलेंडर, ममता बनर्जी को छोड़ मोदी को वोट दें! इतना ही नहीं, प्रचार के ऐन समय में ममता बनर्जी के चुनावी प्रचार की सर्वे कंपनी पर भी ईडी के ताबड़तोड़ छापे! सो, अभी नहीं तो कभी नहीं के अंदाज में बंगाल, असम, केरल सभी चुनावी राज्यों में जीतने की जिद में सरकार यानी मोदीजी को चौबीसों घंटे खपे रहना।

भला किसलिए? राहुल गांधी, विपक्ष को पंक्चर करने के लिए। प्रधानमंत्री चुनाव सभाओं में कह रहे हैं कि राहुल गांधी जनता को उकसा रहे हैं! कैसे? इसलिए क्योंकि राहुल गांधी और ममता बनर्जी गैस सिलेंडर संकट से लेकर महंगाई, विदेश नीति, कूटनीति जैसे उन मसलों को हवा दे रहे हैं, जिससे पूरी दुनिया चिंता में है। ये संसद और संसद के बाहर हल्ला करते हैं। मोदी के खिलाफ नारे लगाते हैं!

मतलब विपक्ष का हल्ला जनता को उकसाना है! लोगों से कह रहे हैं, मोदी हराओ, देश बचाओ! तभी पांच राज्यों के चुनाव मोदीजी की अग्निपरीक्षा हैं। सो, इन चुनावों से भाजपा बतलाएगी कि न केवल असम में जीते हैं, बल्कि रसोई की गैस के संकट से परेशान महिलाएं भी बंगाल में ममता को छोड़ मोदीजी को वोट दे रही हैं!

तय मानिए, दुनिया में चाहे जो हो, भारत का 2026-27 का वर्ष बेफिक्री का साल होगा। पूरा साल भगवा जश्न का होगा। भक्ति का, दर्शनों का होगा। आखिर इस साल बंगाल जीतने के बाद उत्तर प्रदेश भी तो जीतना है। इसलिए गैस-तेल-आर्थिकी से बड़ा चुनावी संकट है। भाजपा बंगाल, असम में हार जाए तो गैस सिलेंडर, पेट्रोल-डीजल, महंगाई, बेरोजगारी के वैश्विक हाहाकार का भारत में भी वह भभका बनेगा कि लोग भक्ति छोड़ सड़क पर उतर आएं।

इस मामले में मोदी जैसे चुनावी चिंता में हैं, वैसे उनके सखा ट्रंप भी हैं! अमेरिका में भी दिसंबर में संसद के मध्यावधि चुनाव हैं। तभी वे ताबड़तोड़ ईरान को पाषाण युग में धकेल कर खाड़ी क्षेत्र से बाहर निकलने की जुगाड़ में हैं। यह अलग बात है कि अमेरिका लगातार फंसेगा। और ट्रंप का स्वर्णकाल भी वैसा ही होगा जैसा मोदीजी का है और होगा!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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