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बिहार जीत के बाद धराशायी हुए नेता

एक महीने पहले नवंबर में बिहार में भारतीय जनता पार्टी को बड़ी जीत मिली। पहली बार भाजपा बिहार विधानसभा के चुनाव नतीजों में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। इस जीत ने पार्टी के अनेक नेताओं के कद में बड़ा इजाफा किया। लेकिन नतीजों के एक महीने बाद भाजपा ने बिहार के नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर बिहार के तमाम बड़े नेताओं को जोर का झटका दिया। केंद्रीय मंत्री, बिहार के उप मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, दूसरे राज्यों के प्रभारी, केंद्रीय संगठन में पद संभाल रहे तमाम नेता एक झटके में धराशायी हुए। सोचें, इन सबकी श्रेणी में नितिन नबीन कहीं नहीं थे। यह जरूर है कि उनको जो काम दिया जाता था उसे पूरी निष्ठा से निभाते थे।

चाहे छत्तीसगढ़ में सह प्रभारी और प्रभारी के तौर पर काम करना हो या नीतीश सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी हो, उसमें वे चुपचाप काम करते थे। साथ ही ऊपर के दोनों शीर्ष नेताओं के संपर्क में थे। उनका भरोसा हासिल कर रहे थे। बाकी नेताओं की तरह उनका भौकाल नहीं था और न मीडिया में वे नायक बने थे। कायस्थ जाति से होने और बिहार में भाजपा की सबसे सुरक्षित राजधानी पटना की शहरी सीट से जीतने की वजह से भी वे बहुत ज्यादा सुर्खियों में नहीं रहते थे।

उनके भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही बिहार के सारे बड़े नेता दूसरी कतार में आ गए। सब उनके अधीनस्थ हो गए। वैसे भी भाजपा में हिसाब किताब कांग्रेस की तरह नहीं है। कांग्रेस में तो प्रदेश का या केंद्र का कोई भी नेता नेहरू गांधी परिवार के सदस्यों को छोड़ कर दूसरे किसी को नेता स्वीकार नहीं करता है। लेकिन भाजपा में सबको अध्यक्ष जी का नेतृत्व स्वीकार करना होता है। सिर्फ उन लोगों को छोड़ कर जिन्होंने अध्यक्ष बनवाया होता है। सो, मोदी और शाह को छोड़ कर बाकी सबके लिए नितिन नबीन अध्यक्ष जी हो गए हैं।

बिहार भाजपा में दोनों उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा की क्या स्थिति होगी यह सोचा जा सकता है। दोनों के नितिन नबीन के सामने अदब से पेश आना है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय जो अब तक अमित शाह के सबसे करीबी थे और बिहार में कई मामलों में अपने हिसाब से फैसले कराते थे। उनको भी अब नितिन नबीन के पास ही जाना होगा। राज्य सरकार के मंत्री, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल के प्रभारी मंगल पांडेय भी नितिन नबीन को रिपोर्ट करेंगे। केंद्रीय मंत्रियों में गिरिराज सिंह और उस समय के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल को सबने देखा कि वे पटना से नितिन नबीन के साथ दिल्ली आए और हवाईअड्डे पर उनके पीछे पीछे चल रहे थे।

बिहार के प्रभारी महासचिव विनोद तावड़े गुलदस्ता लेकर हवाईअड्डे पर खड़े थे नितिन नबीन के स्वागत के लिए। भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया सह प्रभारी संजय मयूख स्वागत के समय उनके हाथ से गुलदस्ता लेकर रख रहे थे। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव और बिहार में कायस्थ नेता के तौर पर तेजी से उभर रहे ऋतुराज सिन्हा का क्या होता है यह देखने वाली बात होगी? क्या नितिन नबीन की जगह बिहार में मंत्री बनेंगे या संजय मयूख दिल्ली से पटना भेज जाएंगे? जो हो, सरकार और संगठन के तमाम बड़े नेता नई और बदली हुई परिस्थितियों में एडजस्ट करने के प्रयास में लगे हैं।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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