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चुनाव से पहले योजना बन गई थी

नीतीश कुमार को ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री नहीं रहने देना है इसका फैसला नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले ही बन गई थी। सबको साफ दिख रहा था कि नीतीश कुमार भूलने की बीमारी से ग्रस्त हो गए हैं। इसका फायदा उठा कर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उनके आसपास के नेताओं को अपने साथ मिलाना शुरू किया। इसके लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपनाई गई। जिसे अंग्रेजी में स्टिक एंड कैरेट की नीति कहते हैं। नेताओं को डरा कर और लालच देकर साथ मिलाया गया। उनको इस बात के लिए तैयार किया गया कि वे नीतीश कुमार को भाजपा के बराबर सीट लेकर लड़ने के लिए राजी करें। उनको इस बात के लिए भी तैयार किया गया कि नीतीश को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करके चुनाव नहीं लड़ा जाएगा। नीतीश की मानसिक अवस्था ऐसी नहीं थी कि वे इन चीजों का प्रतिरोध कर सकें और उनके आसपास के ऐसे लोग, जो उनके प्रति ईमानदार थे, उनकी हैसियत ज्यादा बड़ी नहीं थी। और पार्टी के बड़ी हैसियत वाले नेताओं को डरा कर या लालच देकर भाजपा ने अपने साथ कर लिया था।

सो, 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और जनता दल यू दोनों बराबर सीटों पर लड़े। जदयू के एक सौ सीटों पर ल़ड़ने से ही साफ हो गया कि इस बार उसका प्रदर्शन भाजपा से कमतर होगा। ध्यान रहे हर चुनाव में भाजपा के मुकाबले जदयू का स्ट्राइक रेट कम होता है और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि भाजपा के कोर वोटर का पूरा वोट जदयू को ट्रांसफर नहीं होता है। सो, पहले तो जदयू को एक सौ सीटें दी गईं। उसके बाद तीन सहयोगी पार्टियों को 43 सीटें दे दी गईं। ये वो सहयोगी हैं, जो पहले भी भाजपा के साथ मिल कर नीतीश के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं। सो, भाजपा ने 143 सीटें अपने लिए और अपनी नजदीकी सहयोगियों के लिए रखीं, जबकि नीतीश की पार्टी एक सौ सीटों पर लड़ी। चुनाव नतीजों में भी भाजपा और अन्य सहयोगियों को 117 सीटें मिलीं, जो बहुमत से सिर्फ पांच कम हैं। यानी आज अगर भाजपा चाहे तो नीतीश की पार्टी को छोड़ कर भी सरकार बना सकती है।

सो, चुनाव से पहले भाजपा ने जिस योजना का ताना बाना बुना था उस पर अब अमल हो गया है। विधानसभा की गणित से ज्यादा नीतीश की मानसिक अवस्था और उनके करीबी लोगों के विश्वासघात से ही भाजपा इस योजना पर अमल कर पाई। इसमें चार महीने की देरी हुई है तो वह भी बिहार की जनता और नीतीश कुमार की पुरानी पुण्यता के कारण हुए। भाजपा को अनुमान नहीं था कि ऐसा छप्परफाड़ बहुमत आएगा। उनको लग रहा था कि भाजपा बहुत अच्छा करेगी और नीतीश 50 सीटों के आसपास रह जाएंगे। अगर ऐसा होता तो 14 नवंबर को नतीजे के बाद ही भाजपा का सीएम शपथ लेता। लेकिन पूरा चुनाव नीतीश के चेहरे पर हो गया और नतीजा यह हुआ कि भाजपा को 89 सीटें मिलीं तो जदयू को 85 सीटें मिल गईं।

तभी नतीजों के बाद जब मोदी और शाह की ओर से जदयू के नेताओं से कहा गया कि भाजपा का सीएम बनाया जाए तो उनके सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। उन्होंने किसी तरह से दोनों को समझाया कि अभी अगर नीतीश को नहीं बनाया गया तो बगावत हो जाएगी। उनकी पार्टी के नेता भड़क जाएंगे। तभी चार महीने इंतजार किया गया। नीतीश की मानसिक अवस्था इस बीच और बिगड़ती गई। जब भाजपा को लगा कि अब नीतीश किसी भी योजना का प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं हैं तो उसने जदयू के उन नेताओं को काम पर लगाया, जो उसके लिए काम कर रहे थे। उन्होंने नीतीश को पार्टी और राज्य का भला बुरा समझा कर तैयार करा लिया कि वे मुख्यमंत्री पद छोड़ें और राज्यसभा चले जाएं। इस तरह 2013 का बदला नीतीश से 2026 में ले लिया गया।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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