अब से 2029 के लोकसभा चुनावों के बीच और साथ-साथ 24 प्रदेशों के विधानसभाओं के लिए चुनाव होंगे। यानी इन राज्यों में 2986 नए विधायक अगले लोकसभा चुनाव के आसपास चुने जाएंगे। ….. मेरा यह आकलन लिख कर रख लीजिए कि इन में से कम-से-कम 1800 विधायक प्रतिपक्ष की गठरी में जाएंगे और 24 में से 13 प्रदेशों में तो कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन की सरकारें बनेंगी ही।
राहुल गांधी कल अपने जीवन के 57वें वर्ष में प्रवेश कर गए। उन के संसदीय जीवन को 22 बरस पूरे हो गए हैं और औपचारिक सांगठनिक ज़िम्मेदारी संभाले तीन महीने बाद 19 साल हो जाएंगे। 2004 के चुनाव में अमेठी से क़रीब तीन लाख वोट से लोकसभा चुनाव जीत कर राहुल ने अपनी संसदीय पारी शुरू की थी। सितंबर 2007 में उन्हें कांग्रेस का महासचिव बना कर भारतीय युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन का प्रभार दिया गया। फिर छह साल बाद 2013 में उन्हें कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया और इस के चार साल बाद 2017 में वे कांग्रेस-अध्यक्ष के पद पर निर्वाचित हो गए।
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तो हारी ही, राहुल ख़ुद भी अमेठी से अपना चुनाव 55 हज़ार वोट से हार गए। हालांकि वे दो सीटों से एक साथ लड़े थे और केरल के वायनाड से 4 लाख 40 हज़ार मतों से जीत गए थे, मगर उस साल जुलाई की शुरुआत में राहुल ने पार्टी-अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। 2024 का लोकसभा चुनाव होने के क़रीब एक साल पहले मार्च 2023 में राहुल की लोकसभा से सदस्यता रद्द कर दी गईं। गुजरात के सूरत की एक अदालत ने राहुल के खि़लाफ़ मानहानि के एक मामले में उन्हें दो साल की सज़ा सुना दी थी और नियमानुसार उन की सांसदी जाती रही। सांसद के नाते राहुल को मिला आवास भी रातोंरात सरकार ने खाली करा लिया।
सूरत की अदालत के फ़ैसले को राहुल ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। अगस्त 2023 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने उन की सज़ा पर रोक लगा दी। 7 अगस्त को लोकसभा सचिवालय ने राहुल की सदस्यता बहाल कर दी। सोनिया गांधी ने 2024 के आरंभ में ही स्वास्थ्य कारणों से लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ने का निर्णय ले लिया था। सो, वे फरवरी में राजस्थान से राज्यसभा में आ गईं। इसलिए राहुल 2024 का चुनाव रायबरेली और वायनाड से लड़े और दोनों ही जगह से जीत गए। वायनाड की सीट उन्होंने खाली कर दी और रायबरेली का प्रतिनिधित्व करना चुना। नवंबर के महीने में वायनाड से प्रियंका गांधी लोकसभा में पहंुच गईं।
राहुल अपनी राजनीतिक यात्रा के पहले दिन से ही झंझावाती मौसम का सामना करते रहे हैं – अपनी पार्टी के भीतर से निर्मित माहौल की वज़ह से भी और पूरी मज़बूती से बाहर मौजूद संघ-टोली द्वारा 22 बरस से उन पर किए जा रहे निर्लज्ज और अनैतिक अधोभागी-आक्रमणों के कारण भी। पिछले आम चुनाव में सरकार बनाने लायक पूर्ण बहुमत भी हासिल करने से वंचित रह जाने वाली भाजपा की खिसियाहट ने राहुल पर हमलों की बौछार आज अपनी चरम स्थिति में पहुंचा दी है। देवी पार्वती के आग्रह पर, संपूर्ण विश्व के नाथ, महादेव द्वारा बसाई गई काशी नगर से, लोकसभा का चुनाव 2019 में 4 लाख 80 हज़ार मतों से जीतने वाले नरेंद्र भाई मोदी, स्वयं भी 2024 में 1 लाख 52 हज़ार वोट से ही जीत पाए, तो सवा तीन लाख के इस गड्ढे ने उन्हें उन्माद के उस रथ पर सवार कर दिया है कि वे हर हाल में संसद के दोनों सदनों में अपने सहयोगी दलों के साथ मिल कर दो तिहाई बहुमत स्थापित करने के लिए सब-कुछ करने को कमर कस चुके हैं। विपक्ष के राजनीतिक दलों को छिन्नभिन्न करने के ताज़ा कुत्सित-वीभत्स दृश्य इसी का नतीजा हैं।
‘मोशा’-मंडली जानती है कि भारत के लोकतंत्र को इस स्खलन से बचाने की कूवत सिर्फ़ एक राजनीतिक दल में है और वह कांग्रेस है और एक व्यक्ति में है और वह राहुल गांधी है। इसलिए राहुल पर हर तरह की झपट्टामारी लगातार तेज़ होती जा रही है। मगर सियासत में उन्हें पूरी तरह नाकाम बताने वालों को यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस संगठन में राहुल के बाक़ायदा पद संभालने के बाद लोकसभा के चार चुनाव हुए हैं। ठीक है कि इन मे से कांग्रेस सिर्फ़ एक चुनाव जीती – 2009 में। तब उस की 206 सीटें आई थीं। 2014 के चुनाव में वह 44 पर सिमट गई। 2019 में वह ज़रा-सा आगे खिसक कर 52 पर रही। मगर सच्चाई यह भी तो है कि 2024 में न सिर्फ़ लोकसभा में कांग्रेस की ताक़त तक़रीबन दुगनी हो कर 99 पर पहुंच गई, उस ने चार सौ पार का दावा कर रही नरेंद्र भाई और अमित भाई शाह की भारतीय जनता पार्टी को पिछली बार की 303 से 240 पर ला पटका। तब हल्ला तो यह भी हो रहा था कि भाजपा जीती तो महज़ 171 सीटें है और बाकी के 69 खरगोश तो जादुई टोपी से बाहर निकले हैं। जो हो, ताल ठोक रहे नरेंद्र भाई का ख़्वाब अगर 160 सीटों से पिछड़ गया तो इस का सेहरा विपक्ष के नहीं तो आप किस के माथे पर बाधेंगे?
सच है कि कांग्रेस की राजनीति में राहुल के आगमन के बाद से देश भर में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय का आंकड़ा सौ के अंक को छू चुका है। लेकिन क्या यह भी सच नहीं है कि इसी दुर्दांत दौर में कांग्रेस ने विधानसभाओं के 35 से ज़्यादा चुनाव जीत कर अपनी सरकारें भी बनाई हैं? कांग्रेस के ख़िलाफ़ जिस तरह की धुआंधार बुलडोज़री व्यवस्था चल रही है, क्या उस में आप को यह तथ्य थोड़ा नख़लिस्तानी नहीं लगता है कि मई 2014 के बाद से देश भर में हुए तक़रीबन 65 विधानसभा चुनावों में से 16 जीत कर कांग्रेस ने सरकारें बनाई हैं। 2017 के पंजाब चुनाव को याद कीजिए। 2018 के मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव भूलिए मत और यह भी याद रखिए कि मार्च 2020 में मध्यप्रदेश की कांग्रेसी सरकार को ‘मोशा’-ग़िरोह ने किस तरह गिराया था। हिमाचल प्रदेश में 2022 की, कर्नाटक और तेलंगाना में 2023 की और केरल में अभी-अभी 2026 की जीत का कुछ तो श्रेय राहुल को भी है न!
बावजूद इस के कि अभी-अभी मध्यप्रदेश और झारखंड की सियासत में अपने-परायों ने कांग्रेस को करारा लप्पड़ लगाया है, एक बात याद रखिए, जिस दिन राहुल ने उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली में अपना थोड़ा-सा भी ज़मीनी कायाकल्प कर लिया, भाजपा आप को चारों खाने चित मिलेगी। हंसिए मत। अब से 2029 के लोकसभा चुनावों के बीच और साथ-साथ 24 प्रदेशों के विधानसभाओं के लिए चुनाव होंगे। यानी इन राज्यों में 2986 नए विधायक अगले लोकसभा चुनाव के आसपास चुने जाएंगे। अगर किसी को यह लगता है कि प्रतिपक्ष इतना गया-बीता हो गया है कि इस का बड़ा हिस्सा भाजपा और उस के सहयोगी दलों के पास चला जाएगा तो मेरा यह आकलन लिख कर रख लीजिए कि इन में से कम-से-कम 1800 विधायक प्रतिपक्ष की गठरी में जाएंगे और 24 में से 13 प्रदेशों में तो कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन की सरकारें बनेंगी ही।
इसे साकार करने के लिए उम्र के 57वें वर्ष में राहुल तीन काम करें। प्रयोगधर्मिता के चक्कर में अपने सारे अंडे नौनिहालों की बास्केट में रखना छोड़ कर अपना सियासी-निवेश विस्तारित करें। बग़लगीर काइयां द्वारपालों को एक झटके में राजनीतिक-साइबेरिया के हवाले कर दें। और, जैसा कि बरसों पहले उन्होंने तय किया था, जब दिल्ली में हों, सर्वसुलभ जन-चैपाल लगाना शुरू कर दें। यह त्रिशूल ही राहुल की अष्टसिद्धि का बीजमंत्र है। चाहें तो जाप करें, नहीं तो कांग्रेस भगवान भरोसे तो है ही।


