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हुनर अब सिर्फ मुसलमान के पास है

भारत में पिछले कई सालों से कौशल विकास की बात हो रही है। कई जगह हुनर हाट भी लगाए जा रहे हैं। लेकिन क्या इससे भारत के नागरिकों खास कर हिंदुओं में हुनर का विकास हो रहा है? इसका सवाल का जवाब नहीं है। हिंदू अब कोई पारंपरिक हुनर नहीं सीख रहा है। वह अब अलग किस्म के हुनर सीख रहा है। जैसे बिना जमीन के किसान बन कर कैसे किसान सम्मान निधि हासिल कर सकते हैं? अगर बहुत बड़े किसान हैं तब भी पांच सौ रुपए महीने वाली सम्मान निधि कैसे हासिल करें? वह सीख रहा है कि अच्छी नौकरी होने के बावजूद महिला रोजगार वाली योजना का पैसा कैसे मिल जाए? वह ये हुनर भी सीख रहा है कि सब कुछ होने के बावजूद पांच किलो अनाज कैसे प्राप्त किया जाए? अच्छा पक्का मकान है लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना का एक लाख रुपया और शौचालय बनाने क  20 हजार रुपया कैसे लिया जाए? कैसे फर्जी दिव्यांगता का सर्टिफिकेट बनवा कर दिव्यांगों को मिलने वाला पेंशन उठाया जाए?

बिहार में जब से सरकार ने वृद्धावस्था पेंशन चार सौ रुपए से बढ़ा कर 11 सौ रुपए की है यह होड़ मची है कि कैसे 60 साल उम्र होने का सर्टिफिकेट बना कर वृद्धावस्था पेंशन का पैसा लिया जाए। यह दूसरे राज्यों में भी हो रहा है। पिछले दिनों खबर आई थी कि बिहार में सैकड़ों पुरुषों ने महिला रोजगार योजना के तहत पैसा ले लिया। इस तरह की गड़बड़ियों के कारण महाराष्ट्र में लाखों नाम लड़की बहिन योजना में से हटाए गए हैं।

कह सकते हैं कि हुनर के मामले में सरकार और हिंदुओं में तू डाल डाल मैं पात पात का खेल चल रहा है। सरकार मुफ्त में वस्तुएं और सेवाएं बांटने की योजना शुरू कर रही है तो दूसरी ओर लोग उन योजनाओं को नायायज लाभ उठाने की स्कीम तैयार कर लेते हैं। सरकार दावा कर रही है कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से चार लाख करोड़ रुपए बचे हैं। सही है कि इससे लूट कम हुई है लेकिन सरकारी खजाने में सेंघ लगाने के तरह तरह के उपाय अब भी चल रहे हैं। सरकार इस तरह की गड़बड़ियों में मुस्लिम भी शामिल होंगे लेकिन ज्यादा संभावना हिंदुओं के होने की इसलिए होती है क्योंकि हिंदू अपना पारंपरिक हुनर भूलते जा रहे हैं या छोड़ते जा रहे हैं, जबकि मुस्लिम पारंपरिक हुनर के साथ दूसरे कामों में भी कुशलता विकसित कर रहे हैं। दूसरे, मुस्लिम आवेदकों की जांच अतिरिक्त सावधानी से हो रही है, खास कर भाजपा शासित राज्यों में। इसलिए वे गड़बड़ियों में कम शामिल हो रहे हैं।

पहले मुसलमान पारंपरिक रूप से गैरेज चलाते थे, पंक्चर लगाने का काम करते थे, टेलर मास्टर मुस्लिम होते, इत्र बेचने काम करते थे और हजामत के काम में थे। दूसरी ओर बढ़ई, पलम्बर, इलेक्ट्रिशियन, राज मिस्त्री, दुकानदार, सुनार आदि हिंदू होते थे। हजामत के काम में भी नाई समुदाय के लोग शामिल होते थे। चमड़े का काम खासतौर से जूते आदि बनाने का काम हिंदू ही करते थे। लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। अब तो फिल्मी गानों में जाति का नाम आ जाए तो जातियां इसको अपना अपमान मान कर प्रदर्शन करती हैं। पहले काम के आधार पर जातियों के नाम तय थे। लेकिन जब से राजनीतिक दलों ने अपने फायदे के लिए जातियों के अंदर एक झूठा गर्व भरना शुरू किया है तब से जातियां अपनी सामाजिक और राजनीतिक पहचान को लेकर आक्रामक हो गई हैं। उनको अगर उनके काम के नाम से पुकारा जाए तो वे अपमान महसूस करते हैं।

जिन लोगों के हाथ में हुनर था वे आरक्षण लेकर सरकारी नौकरी पाने या राजनीतिक शक्ति दिखा कर सत्ता में साझेदारी हासिल करने की होड़ में शामिल हो गए। वह भी करें उसमें समस्या नहीं है। लेकिन पारंपरिक हुनर को बचाए रखना चाहिए क्योंकि वह व्यावसायिक रूप से भी लाभप्रद है। इतिहास में भारत जब सोने की चिड़िया कहा जाता था तब वह स्थिति इन्हीं हुनरमंद लोगों के कारण हासिल हुई थी। बुनकर, दस्तकार, हस्तशिल्पी ही ऐसे उत्पाद तैयार करते थे, जिनका दुनिया में बाजार था। अब भी भारत के निर्यात में इन चीजों का बहुत बड़ा हिस्सा पर वह काम अब दूसरे लोग करते हैं।

इसके उलट मुसलमानों ने अपने पारंपरिक कौशल के साथ साथ दूसरे तमाम कामों का हुनर सीख लिया। अब मुसलमान सिर्फ पंक्चर नहीं लगाता है या गैरेज नहीं चलाता है या नाई की दुकान और टेलर मास्टर का काम नहीं करता है, बल्कि हर वह काम करता है, जिसकी आज सबसे ज्यादा मांग है। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वर ने कहा कि भारत में रोजगार के लिए युवाओं को पलम्बर, बढ़ई, इलेक्ट्रिशियन आदि का काम सीखना चाहिए। उन्होंने केयर गिविंग इंडस्ट्री में रोजगार की ब़ड़ी संभावना बताते हुए उसमें काम सीखने को कहा। ध्यान रहे वह काम केरल की महिलाएं और पुरुष पूरी दुनिया में कर  रहे हैं। नागेश्वर जो काम सीखने के लिए कह रहे हैं और उसमें रोजगार की संभावना सबसे ज्याद हैं उन क्षेत्रों में मुसलमानों की लगभग मोनोपोली बन गई है। अब बिहार से लेकर झारखंड और उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान तक कहीं भी देखें तो घर तामीर करने के काम में ज्यादातर ठेकेदार या काम करने वाले मुस्लिम मिलेंगे। वे राज मिस्त्री वाला काम कर रहे हैं, वे लकडी का काम कर रहे हैं, बिजली और पानी का काम कर रहे हैं। डेयरी फार्म चला रहे हैं, राइस मिल बना रहे हैं और फलों व ड्राई फ्रूट्स के कारोबार में ऐसी पैठ बनाई है, जिसकी थोड़े समय पहले तक कल्पना नहीं की जा सकती थी।

राजधानी दिल्ली से लेकर बिहार के किसी छोटे शहर तक अगर आप एसी, कूलर या बिजली की रिपेयरिंग के लिए मैकेनिक बुलाएं तो ज्यादा संभावना इस बात की है वह मुस्लिम होगा। ऐसा नहीं है कि मुस्लिम सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले रहे हैं। सारे लाभ लेते हुए वे हुनर विकसित कर रहे हैं और मेहनत करके अपना एकाधिकार बना रहे हैं। मुस्लिम समाज के लोग वैसे तमाम काम कर रहे हैं, जो एक या दो दशक पहले तक नहीं करते थे। दो दशक के भीतर अपारंपरिक कामों में उन्होंने एकाधिकार बनाया है, जबकि हिंदू उन क्षेत्रों में भी अपना एकाधिकार छोड़ते जा रहे हैं, जो पारंपरिक रूप से उनका अपना काम माना जाता था। कुल मिला कर सरकार की योजनाओं के कारण और जातियों के विभाजन की वजह से हिंदू परजीवी बनने की ओर बढ़ गया है तो मुस्लिम सारी योजनाओं का लाभ लेते हए भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रहा है।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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