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श्रम शक्ति का संकट

पश्चिम एशिया में चल रही जंग कितने तरह के संकट को जन्म दे रही है इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। तेल व गैस की आपूर्ति प्रभावित होने का असर सिर्फ उन उद्योगों पर नहीं पड़ा है, जो इन पर आधारित हैं, बल्कि हर सेक्टर पर इसका असर है। गैस नहीं आने से उवर्रक उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। खबर है कि भारत ने यूरिया की खरीद का एक सिंगल टेडर ढाई लाख टन का जारी किया है, जिसकी कीमत पहले के मुकाबले 50 फीसदी ज्यादा है। सरकार को पता है कि अगर अभी सब कुछ ठीक हो जाए यानी स्थायी युद्धविराम हो जाए और शांति समझौता हो जाए तब भी स्थिति सामान्य होने में कई महीने लग जाएंगे। उससे पहले उर्जा सुरक्षा, खाद सुरक्षा, खाद्यान्न सुरक्षा आदि का ध्यान रखना होगा। सो, उर्वरक उद्योग, प्लास्टिक उद्योग और कपड़ा उद्योग से लेकर हस्तशिल्प, दस्तकारी और लघु व कुटीर उद्योग तक हर सेक्टर पर किसी न किसी तरह मार पड़ी है। हर जगह एक्टिविटी कम हुई है, जिसकी वजह से छंटनी होने लगी है। लोग औद्योगिक शहरों से अपने घरों की ओर लौटने लगे हैं। बिहार, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल जाने वाली ट्रेनें भरी हुई जा रही हैं। राजधानी दिल्ली सहित एनसीआर के हर इलाके में अफरातफरी मची है।

मजदूर इतने कम वेतन पर काम कर रहे हैं और गैस व तेल की कीमतें बढ़ने से उनके लिए सर्वाइव करना मुश्किल हो गया है। पिछले दिनों नोएडा और ग्रेटर नोएडा के मजदूरों ने प्रदर्शन किया और सड़कों पर उतरे तब पता चला कि नौ हजार और 10 हजार रुपए महीना वेतन पर मजदूर 12 घंटे काम कर रहे हैं। इस फैक्टरियों में छुट्टी की सुविधा नहीं है। मजदूर ठेके पर रखे गए हैं। न्यूनतम वेतन या काम के न्यूनतम घंटे तय नहीं हैं। फैक्टरियों में शौचालय तक की व्यवस्था नहीं होती। जब भी मजदूर वेतन बढ़ाने, ओवरटाइम देने या बेसिक सुविधा देने की मांग करते हैं तो कंपनियां हाथ झाड़ लेती हैं।

असल में उनको यह सुविधा इसलिए मिली हुई है क्योंकि छोटी या बड़ी हर कंपनी ने मजदूरों और कर्मचारियों की सीधी बहाली लगभग बंद कर दी है। फैक्टरियां और कंपनियां अब मैन पावर सप्लाई करने वाले ठेकेदारों के जरिए बहाली कर रही हैं। हर तरह की सेवा के लिए यानी सफाईकर्मी से लेकर सुरक्षाकर्मी तक और तकनीकी पेशेवर से लेकर सामान्य कर्मचारी तक यहां तक कि अस्पतालों में नर्स की सप्लाई तक सबका ठेका मैन पावर सप्लाई करने वाली कंपनियों को दिया जा रहा है।

ये कंपनियां न्यूनतम वेतन और सेवा शर्तों को ताक पर रख कर जरूरतमंद नौजवानों को भरती करती हैं। इस व्यवस्था में कंपनियां हर तरह की जिम्मेदारी से मुक्त होती हैं। इंटरमीडियरी यानी मैन पावर सप्लाई करने वाली कंपनी पर हर चीज का ठीकरा फोड़ दिया जाता है। इस व्यवस्था में अगर मान पावर सप्लाई करने वाली कंपनी एक मजदूर के लिए 12 हजार रुपए ले रही है तो मजदूर को नौ हजार या दस हजार रुपए मिलेंगे। बोनस, ओवरटाइम या दूसरी सुविधाओं की कोई बात नहीं होती है। राजधानी दिल्ली की कॉलोनियों में जिस तरह से सिक्योरिटी गार्ड सप्लाई होते हैं उसी तरह भारत सरकार की कंपनियों में सिक्योरिटी गार्ड सप्लाई हो रहे हैं। नॉन स्ट्रेटेजिक इमारतों की सुरक्षा निजी सुरक्षाकर्मियों के हवाले है। रेलवे से लेकर केंद्र सरकार तक के दफ्तरों में सफाईकर्मी मैन पावर सप्लाई करने वाली कंपनी के हैं। चाहे शहरों में निजी कॉलोनी या दुकानों के सामने खड़ा सिक्योरिटी गार्ड हो या भारत सरकार की इमारतों की पहरेदारी करने वाला उसे 12 घंटे की नौकरी करनी पड़ती है 10 हजार रुपए की मामूली रकम के लिए।

समस्या यह है कि तेल और गैस की आपूर्ति कम होने से उनकी समस्या बढ़ गई है। इस तरह काम करने वाले चार या पांच या उससे ज्यादा लोग एक एक कमरे में रहते हैं। छोटे गैस सिलेंडर पर उनका खाना बनता है या जहां ड्यूटी होती है वहां ढाबे, रेस्तरां में खाते हैं। एक तो औद्योगिक गतिविधियों में कमी से उनकी नौकरी जा रही है और दूसरी ओर खाना बनाना या खरीद कर खाना उनके वश से बाहर होता जा रहा है। इसलिए मजदूर वापस लौट रहे हैं। पांच किलो का सिलेंडर हजार, दो हजार रुपए में खरीदने की उनकी हैसियत नहीं है। इसके बावजूद सरकार सब कुछ ठीक होने का दावा कर रही है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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