इस सप्ताह रुपया लुढ़कते हुए डॉलर के मुकाबले 89.49 पर जा पहुंचा। रिज़र्व बैंक ने बाज़ार में डॉलर निकालकर उसे 90 रुपए की संख्या छूने से रोका। पर जल्द रुपया 90 से पार होगा। यदि अमेरिका से टैरिफ, सौदा नहीं पटा, निर्यात बढ़े नहीं तो नामुमकिन नहीं जो एक डॉलर सौ रुपए के बराबर हो। खबर है कि इस साल एशिया में सर्वाधिक लुढ़कती करेंसी भारतीय रुपया है। 2025 में अब तक रुपया 4.5 प्रतिशत टूट चुका है। एशिया की क्षेत्रीय करेंसियों में रुपए का लगातार कमजोर प्रदर्शन है। यह तब है जब शेयर बाज़ार तेज़ है और जीडीपी का नया आंकड़ा 6.5 प्रतिशत है।
सवाल है दुनिया जीडीपी के आंकड़े को देख रही होगी या गिरते रुपए को? मेरा मानना है जीडीपी की असल सच्चाई दुनिया के निवेशक जानते हैं। भारत की जीडीपी खपत और सरकारी खर्च के बूते है, न कि निवेश, निर्यात और निजी क्षेत्र की भागीदारी की ताकत पर। इसलिए रुपए का लुढ़कते रहना घाटे, सुस्त निवेश और निर्यात की जगह आयातों में बढ़ोतरी की खोखली अर्थनीति का भी प्रतीक है।
फिर दुनिया के लिए आदर्श स्थिति है यदि भारत का रुपया उसकी वास्तविक वैल्यू अनुसार लुढ़कता रहे। दुनिया लगातार देखती-समझती हुई है कि भारत की अर्थनीति और उसकी करेंसी दोनों लुढ़कते हुए हैं। सब कुछ खोखला है और जो जीडीपी के आंकड़े आ रहे हैं, वे पूरी तरह सरकार के ही दम, सरकारी खर्च, खैरात यानी खपत चालित हैं, न कि निजी क्षेत्र में नए निवेश, नए कारखाने या उत्पादकता बढ़ने से।
तभी आश्चर्य नहीं जो अच्छी जीडीपी से निवेश आने या विदेशी कंपनियों के भारत आकर कारखाने खोलने का हल्ला लगातार है, लेकिन चीन की कंपनियां भी अब भारत में कारखाने नहीं
लगा रही हैं। ऑटो में जरूर दो कंपनियां सक्रिय हैं। मगर ऑटो क्षेत्र को देखें तो टेस्ला भारत में
शोरूम खोल रही है पर कारखाना लगाने को तैयार नहीं। भारत संभवत: अकेला देश है जहां पिछले दस सालों में अमेरिकी ऑटो कंपनियों ने अपना काम समेटा जबकि एशिया के तमाम देशों में इनकी फैक्टरियां चल रही हैं। अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, यूरोप आदि कहीं से बड़े कॉरपोरेट नए निवेश लेकर नहीं आ रहे हैं। मगर हां, भारत के बाज़ार में उत्पाद जरूर सभी लॉन्च कर रहे हैं, 140 करोड़ लोगों की आबादी के अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग खरीदारी के लिए।


