राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

मोदी का आखिरी दांव!

नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री तय कर दे रहे हैं कि उनके बाद संघ परिवार का कोई नेता प्रधानमंत्री नहीं बने! यह वैसा ही क्षण है जैसा कभी वीपी सिंह का था। वीपी सिंह ने तिकड़मों (भाग्य भी कह सकते हैं) से प्रधानमंत्री पद पाया था। तब उन्होंने क्या सपने बुने? अपने आपको मसीहा, इतिहास पुरूष, समाज को बदल देने की क्रांतिकारिता में वह नींव सोची, जिससे सत्ता पक्की होगी। वापिस चुनाव जितेंगें। और मरने के बाद राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है की स्मृति में उनकी मूर्तियां गली मोहल्लों में लगी हुई होंगी। पर आज क्या कोई नामलेवा भी है। न कोई राजनीतिक विरासत है और न नस्ल, धर्म, समाज की स्मृति में जगह!

पर वे अपने ख्यालों के राजा तो थे! वैसे ही जैसे नरेंद्र मोदी ने आधुनिक इतिहास के पहले हिंदू राजा के ख्यालों में देश को पत्थरों में बदल दिया है! लोकतंत्र पत्थर तो जनता भी पत्थरों की भक्ति में डूबी हुई। मोदी का धौलपुरी पत्थरों का विकास मॉडल वैसा ही है जैसे मायावती का लखनऊ या यूपी विकास था। मोदी ने मायावती की तरह समझा हुआ है कि अपनी दिल्ली में पत्थरों के सेवा तीर्थ, कर्तव्य पथ, कर्तव्य भवन, नया संसद भवन उनके नाम के कीर्ति स्तंभ होंगे। कोई आश्चर्य नहीं जो उन्होने अपने ही हाथों रामलला की उंगली पकड़ उनको भी पत्थरों की छत के नीचे बैठाया? सोचें, आस्था को कैसे पत्थरों की दर्शनीयता में कनवर्ट किया! यह भी ध्यान रहे उन्होने संघ के भाईबंदों को भी दिल्ली में पत्थरों की वह बहुमंजिला इमारत दिलाई है, जिसमें सभी पदाधिकारी लाठी भांजते हुए मोदीजी की छप्पन इंची छाती में लगातार हवा भरते हुए हैं!

मुझे याद है वीपी सिंह की छाती तब शरद यादव-लालू यादव, देवीलाल से लेकर कॉमरेड सुरजीत, ज्योति बसु तथा जनवादी क्रांति के हरकारे लुटियन पत्रकारों ने कैसे मंडल के नगाड़े बजा कर फुलाई थी! मतलब देश में सामाजिक क्रांति आई। और ऐसी तमाम हवाबाजी के लगभग चालीस साल बाद आज न जनवादी बचे हैं, न मंडलवाद है और न फकीर मार्क्सवादियों की जमात है! आज कोई नहीं बूझ सकता है कि तब कम्युनिस्ट पार्टी और खास कर मार्क्सवादियों का संगठन, कैडर कैसा गजब था। उस वैचारिकता में बंधा हुआ जो संघ के स्वंयसेवकों की तरह न सत्ता की भूख लिए था न परमपूजनीयों की भक्ति। पूरी पार्टी समानता के कॉमरेडवाद में जीती थी। एक से फक्कड़ और फकीर।

याद करें ज्योति बसु ने कितने दशक बंगाल में राज किया पर क्या भ्रष्टाचार, कदाचार का कोई किस्सा फाइल में, स्मृति में रिकॉर्ड है? मैं वामपंथ से हमेशा असहमत रहा। लेकिन मैंने पत्रकारिता के पचास सालों में मार्क्सवादी ज्योति बसु, माणिक सरकार, नयनार के 23 साल या 20-15 साल के शासन को गहराई से जाना-सुना है। ये मुख्यमंत्री न झूठ बोलते थे, न झांसे देते थे, न बांटो और राज करो की राजनीति करते थे। न ही इन्होंने ठेकेदारों से पत्थरों की इमारतें बनवा कर उनको तीर्थ का नाम दे कर अपने को तीर्थ में बैठा भगवान दिखलाया। ये कम्युनिस्ट नेता विचार प्रेरित चाल, चेहरे, चरित्र से चलते हुए थे कि न भय, भूख, भक्ति के हिंदू विकारों से!

पर वीपी सिंह की भूखी राजनीति के वायरस में बेचारे वामपंथी फंसे और उनका भी पतन शुरू। जनवाद जातवाद में याकि मंडलवाद में ऐसा खोया कि कमंडल लिए स्वयंसेवकों का समय आ गया। वैश्विक कारणों, इस्लाम ने अलग भगवा रथयात्राओं को धक्का दिया। उभरते बाजार (पीवी नरसिंह राव की बदौलत) में गुजरातियों याकि अंबानी-अडानियों की चांदी की जूतियों का वह चुंबक बना कि भाजपा के स्वंयसेवक प्रमोद महाजन, गोविंदाचार्य, नरेंद्र मोदी, वेंकैया आदि रथयात्रा और भीड़, मैनेजमेंट, कारपेट बमबारी से लोगों को उल्लू बनाने की तकनीक में धीरे-धीरे प्रवीण हो गए। सो, कमंडल हिट और मंडल आउट। हिंदुओं का भक्ति युग प्रारंभ!

अब नारी राजनीति का मोड़ है! सोचें, जिस संघ में निर्णयकर्ताओं की टीम में एक भी नारी पदाधिकारी कभी नहीं हुई और जिसकी पार्टी भाजपा में ले देकर कुसुम राय, शोभा करंदलाजे, वंसुधरा राजे, सुषमा स्वराज, रेखा गुप्ता, स्मृति ईरानी, निर्मला सीतारमण या आनंदी बेन जैसे कुछ चंद नाम है वह मोदी के महिला आरक्षण के युग में प्रवेश कर रही है तो आगे क्या होगा? अपना दो टूक जवाब है केवल सोनिया गांधी का सपना साकार होगा। सो, यह वैसा ही क्षण है जैसा वीपी सिंह को मंडल आरक्षण के इलहाम का क्षण था। इस क्षण से राजनीति आगे वैसे ही मोड़ लेगी जैसे मंडल से आया था। महिला आरक्षण के बाद चुनाव 2029 का हो या 2034 का, भाजपा का पतन तय है। सोचें, भाजपा अपने इतिहास में एक खुद्दार, मनमौजी उमा भारती को बरदाश्त नहीं कर पाई? एक के लिए भी जब जगह नहीं तो भविष्य में संभव है जो लोकसभा के आरक्षित महिला ब्लॉक की राजनीति का प्रियंका गांधी या ममता बनर्जी जैसी नेता उभरें। इसलिए मोदी का दांव केवल इस सोच में है वे इतिहास में आरक्षण कराने वाले माने जाएंगे। सोचें, सोनिया गांधी ने विधेयक बनवाया और उसकी क्रेडिट मोदी लेंगे!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

three × two =