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एल्गोरिद्म, लाठी और इक्कीसवीं सदी

इक्कीसवीं सदी दिमाग की है और प्रमाण पूरी मानवता द्वारा चिप, एआई को मस्तिष्क बनाना है। औद्योगिक क्रांति का बीज भाप से ऊर्जा थी तो नई सहस्राब्दी की मानव क्रांति का बीज वह नया मस्तिष्क है जो डेटा सेंटरों, चिप, रोबो से गुंथता तथा विकसित होता हुआ है। और यह बिना दिल के है। उस नाते मेरा मानना है कि बीसवीं सदी दिल की थी जबकि इक्कीसवीं सदी सौ टका बुद्धि केंद्रित है। और बुद्धि पूरी तरह ठूंठ चिप, एआई निर्माण में केंद्रित है। अभी प्रारंभिक अवस्था है। बावजूद इसके यह दिखने लगा है कि जैसे यूरोपीय पुनर्जागरण से दिल-दिमाग के भभके बने, फिर भाप की औद्योगिक क्रांति के असर में पूंजीवाद बनाम सर्वहारा तथा गणित-गणना-सोच की कोडिंग से डिजिटल क्रांति और इंटरनेट से दुनिया ने भूमंडलीकरण के अनुभव लिए, तो अब बौद्धिक क्रांति मनुष्यता का दिल खो रहा है, लाठी आगे आई है।

भला कैसे? सोचें, यूरोप-अमेरिका 14-15वीं सदी के पुनर्जागरण से अब तक सभी क्रांतियों का जनक रहा, वह अब किस मोड़ पर है? गुजरी दास्तां में यूरोपीय देशों व ढाई सौ साल पुराने अमेरिका का साझा रहा। यूरोप से अमेरिका बना तो अमेरिका से यूरोप बचा। पर अब इक्कीसवीं सदी की जनवरी 2026 में क्या दिख रहा है? अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जतला रहे हैं—भाड़ में जाए नाटो, यूक्रेन, यूरोप—वे तो वही करेंगे जो चाहेंगे! अमेरिका निर्विवाद नंबर एक महाशक्ति है। इसका नंबर एक प्रतीक अमेरिका की नई बुद्धिगत (संज्ञानात्मक क्रांति) छलांग है,

जिसके भाप-माफिक एल्गोरिद्म इंजन से वह भारत जैसे देशों की अरबों लोगों की दशा को “गिग मनुष्यों” जैसी बना रहा है!

ऐसी अकल्पनीय ताकत का स्वामी अमेरिका है मगर उसका व्यवहार, उसके राष्ट्रपति की सोच क्या है? उत्तरी ध्रुव के ग्रीनलैंड से लेकर दक्षिणी ध्रुव में चिली से नीचे तक के पूरे पश्चिमी उत्तरार्ध का स्वामी है अमेरिका। यह केवल ट्रंप की सनक नहीं है। यह उस सत्ता-बोध की अभिव्यक्ति है जो उन्हें चुनाव जिताने वालों, चंदा देने वालों, और उनके शपथ समारोह में उपस्थित उन डिजिटल-संज्ञानात्मक क्रांति की अगुआ कंपनियों के सीईओ, सभी में साझा रूप से मौजूद है कि दुनिया जब पहले ही उनकी मुट्ठी में है, तो भला राष्ट्रपति भवन से ‘अमेरिका  फर्स्ट’ का नगाड़ा क्यों न बजे?

मेरा मानना है दुनिया-मुट्ठी का अमेरिकी अहंकार या चीन, रूस का अहंकार अपने-अपने ठोस आधार लिए हुए है। कोई दो अरब लोगों के इन तीन देशों के आगे पृथ्वी के बाकी छह अरब लोगों का वजूद कुल मिलाकर वैश्विक गिग भीड़ जैसा है। सोचें भारत के 145 करोड़ लोगों पर। यदि राष्ट्रपति ट्रंप अपनी कंपनियों को एक दिन अचानक भारत में गूगल, फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप, यूट्यूब, एक्स बंद करने का आदेश दें तो कैसे तो भारत सरकार, प्रधानमंत्री मोदी का दफ्तर चलेगा और कैसे 145 करोड़ लोगों का दिमाग चलेगा! आज वास्तविकता है कि भारत की भीड़ न तो निर्णय-निर्माता, न नैरेटिव-निर्माता है और न ही इस काम की आवश्यक ज़रूरत में तकनीक-बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान की मौलिक रचनाकार है। जैसे चीन यदि सामान सप्लाई बंद करे तो बाज़ार खाली हो जाने हैं तो नैरेटिव-आइडिया के पाइप यदि ट्रंप बंद करवा दें तो मंदिर के चक्कर लगाते कुत्ते की भक्ति के दर्शन भी स्क्रीन से गुल होंगे।

ऐसे ही बाकी देशों, दुनिया की छह अरब आबादी की दशा है। यूरोप भी इसमें शामिल है। जैसे भारत आश्रित है वैसे यूरोप भी अमेरिका और चीन पर निर्भर है। अमेरिका ने दिमाग, नैरेटिव और चीन ने सामान, आवश्यकताओं की वह सप्लाई बनाई है, जिसका ये शायद ही कोई तोड़ निकाल पाएं। अमेरिका की खूबी है कि वह किसी बात में किसी पर निर्भर नहीं है, तो चीन का पच्चीस वर्षों का यह कमाल है, जिसने दुनिया की फैक्टरी व सप्लाई-चेन बनकर लगभग सभी बाज़ारों पर एकाधिकार बना लिया है। उसकी तोड़ केवल अमेरिका के पास है। उसे डोनाल्ड ट्रंप अपने यहां से अगले तीन वर्षों में बेदखल कर देने वाले हैं। इसलिए क्योंकि ट्रंप और उनके अनुदारवादी अमेरिकियों ने तय किया है कि लाठी और बुद्धि जब है तो दुनिया पूरी तरह उनकी मुट्ठी में बंद हो!

तभी इक्कीसवीं सदी का विश्व, दिमाग व लाठी के उस मिक्स की है जो बीसवीं सदी से जुदा है। बीसवीं सदी में दो महायुद्ध हुए, जर्मनी के हिटलर से लेकर तमाम तरह के दक्षिणपंथी नेताओं ने तानाशाही की विभीषिका बनाई, तो कम्युनिस्ट विचारधारा में स्टालिन, माओ, पोल-पोट जैसे नरभक्षियों के हाथों नरसंहार हुए। बावजूद इसके अंततः मानवता ने स्वतंत्रता, उदारता की नई विश्व-व्यवस्था रची। उपनिवेश खत्म हुए। विकास-भूमंडलीकरण से दुनिया के एक गांव में बदलने की अनहोनी हुई।

मतलब बीसवीं सदी की धुरी में मानव, मानवाधिकार, उदारवाद के वैश्विक सरोकार ऐसे सघन थे, जिसकी नेटवर्किंग ने मनुष्यों का जीना न केवल आसान बनाया, बल्कि घुलने-मिलने सहित अवसरों के मार्ग बने। तभी अतिवादी अनुभवों के बावजूद बीसवीं सदी जन-मन के दिली सफ़र की थी। आम धारणा है कि औद्योगिक क्रांति से असमानता, शोषण हुआ। पूंजीवाद मज़दूर-सर्वहारा वर्ग का खून चूसता था। पर वह दौर यदि एडम स्मिथ पैदा करने वाला था तो कार्ल मार्क्स को भी जन्म देने वाला था। पूंजीवाद के साथ जनवाद, कल्याणकारी व्यवस्था भी बनवाने वाला था। दोनों के प्रयोग में जो हुआ सो हुआ पर सौ फूल खिलने की सदी तो बनी थी। पहली बार सभ्यताओं के संघर्ष की थ्योरी के बीच ‘इतिहास के अंत’ तथा होमो सेपियंस के रूप में मानवता के साझा भविष्य का हिसाब-किताब सोचा और लिखा गया।

उस सब पर इक्कीसवीं सदी में ब्रेक है। गंगा उलटी बहने लगी है। भावना, उदारता, दिल और मन नहीं, बल्कि गणित, मुनाफ़े तथा ठूंठपन का वह दिमागी कोना एक्टिव है, जिससे सभी तरफ लोकतंत्र की लोक-भावना झांसों में बहकी हुई है। मतलब जन खाते में पांच सौ या दो हज़ार, तीन हज़ार रुपए आ गए तो विकास घर पहुंचा और नैरेटिव की अमेरिकी पाइपलाइनों से झूठ की टोटी खुली तो विश्वगुरु बन गए।

मात्र भारत का मामला नहीं है। तुर्की में भी ऐसा है तो फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका में भी ऐसा है। डोनाल्ड ट्रंप की उपज उस पोस्ट-ट्रुथ से है, जिसमें अमेरिका का देहाती गोरा भी उसी विषाणु का मारा है जैसे गंगा-जमुना किनारे का ब्राह्मण है या कोईरी-कुर्मी है या दक्षिणी फ्रांस में वाइन बनाने वाला किसान (दक्षिणपंथी नेत्री ले पेन समर्थक) है। भूमंडलीकरण, इस्लाम और चीन—तीन ऐसे फ़िनॉमिना थे या हैं, जिससे बीसवीं सदी का खुला दिमाग अचानक सिकुड़ा। हर कोई इस झूठ में जीने लगा कि हम असुरक्षित हैं। नतीजतन या तो ‘अमेरिका फर्स्ट’ नहीं होने का स्यापा बना या दिमाग सुरक्षा, पहचान, अस्मिता में भयाकुल हुआ।

सो, खुली दुनिया, खुले दिल पर दिमाग में ताले लगने शुरू हुए। स्वाभाविक जो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का ताला और लाठी उभरी। कल की ही बात है। ग्रीनलैंड को खरीदने के ट्रंप के इरादे के खिलाफ ग्रीनलैंडवासियों और डेनमार्क के लोगों ने प्रदर्शन कर जब कहा कि ‘यह इलाक़ा बिक्री के लिए नहीं है’ तो ट्रंप ने तुरंत लाठी भांजते हुए घोषणा की कि जो यूरोपीय देश ग्रीनलैंड लेने के उनके इरादे में बाधक बनेंगे, उन पर वे नए सिरे से टैरिफ बढ़ाएंगे। मतलब डेनमार्क सहित ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के सामानों पर एक फ़रवरी से दस प्रतिशत टैरिफ बढ़ेगा। वह एक जून को 25 प्रतिशत हो जाएगा! इसके जवाब में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा, “न तो डराने-धमकाने से और न ही किसी धमकी से हम प्रभावित होंगे—न यूक्रेन के मामले में और न ग्रीनलैंड के”। स्वीडन के प्रधानमंत्री का कहना था— “हम अपने आप को ब्लैकमेल नहीं होने देंगे”। वही ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टार्मर ने अमेरिकी टैरिफ धमकी को “पूरी तरह ग़लत” बताया।

सोचें, यूरोपीय देशों पर ट्रंप की इस लाठी पर। ग्रीनलैंड का स्वामी डेनमार्क नाटो का सदस्य है, तो ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि वे देश भी हैं, जिन्होंने अमेरिकी धमकी के बाद ग्रीनलैंड में अपने सैनिक उतार ट्रंप को मैसेज दिया। सवाल है एक फ़रवरी से जब यूरोपीय देशों को अमेरिका से व्यापार में दस प्रतिशत का घाटा होगा तो नाटो एलायंस व यूरोप-अमेरिका के रिश्ते किधर जाएंगे? लेकिन ट्रंप को चिंता नहीं है। उन्हें दिली रिश्तों में नहीं, बल्कि उस लाठी से नए रिश्ते बनाने हैं, जिसके पीछे बुद्धि का अहंकार है।

सो, सब गड़बड़ है। मानवता की चाल इक्कीसवीं सदी में उस मोड़ पर है, जहां से शीतयुद्ध, सभ्यताओं के संघर्ष, चीन-रूस-अमेरिका के परंपरागत रिश्तों से ऊपर, अलग ही दुनिया यानी विश्व-व्यवस्था का अजब रास्ता बनेगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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