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असल ‘धुरंधर’ अमेरिका

यह तारीफ़ नहीं है। वह सत्यमेव जयते है, जिसका आधार बुद्धि‑ज्ञान और सैन्य शक्ति, दोनों के एवरेस्ट की वाह है। अमेरिका ने सन् 2025–26 में दिमाग से कृत्रिम बुद्धि को स्थापित कर जहां मानवता को चमत्कृत किया, वहीं तीन जनवरी 2026 की रात में उसके सैन्य बल ने वेनेज़ुएला देश के राष्ट्रपति को उठा कर विश्व को चौंकाया। व्यर्थ है इसके लिए डोनाल्ड ट्रंप को ‘धुरंधर’ बताना। असल सत्य ढाई सौ साल पुराने अमेरिका के उस संविधान, उस व्यवस्था का है, जिसमें असंभव को संभव बनाने का डीएनए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सांचे की धुन में निहित है। यह व्यवस्था की वह बुनावट है, जिसमें हर व्यक्ति असंभव को संभव बनाने के अवसर को खोजता है, लपकता है और उसमें अपने को खपाता है।

भारत में हम लोग व्यक्तियों, चेहरों यानी राष्ट्रपतियों, नेताओं को ताकते हैं, जबकि धुरंधरी व्यवस्था से बनती है। सिस्टम से उत्प्रेरित व्यक्तिगत मानसिकता, वृत्ति और आचरण से ही फिर अर्थ (पूंजीवाद, नवाचार, तकनीक, वित्तीय धुरी), काम (इच्छा, व्यक्तिगत भोग, उपभोक्तावाद, प्रतिस्पर्धा, जुनून, विलासिता) तथा धर्म की सार्वभौमिक, सेक्युलर समझ पैठती है। निश्चित ही खांटी अमेरिकी लोग परलोक, जन्म‑जन्मांतर या मोक्ष‑मुक्ति की धारणाओं में नहीं जीते हैं। वे वर्तमान के सत्य में जीते हैं। वहां के नागरिक अंधविश्वासों, टोने‑टोटकों, भक्ति और झूठ से लगभग मुक्त हैं। वे अतीत में नहीं, आधुनिकता में आगे बढ़ते जाने के लिए सतत हाथ‑पांव मारते हैं।

इसलिए डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका में भी वही है, जो जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बराक ओबामा या राष्ट्रपति आइज़नहावर और उनके विदेश मंत्री जॉन फोस्टर डलेस के “डोनरो डॉक्ट्रिन” के शक्ति‑सूत्र में था। वेनेज़ुएला के ताज़ा प्रकरण में मुझे राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की कद‑काठी, भाव‑भंगिमा, बड़बोलेपन से बार‑बार सद्दाम हुसैन, कर्नल गद्दाफ़ी, ओसामा बिन लादेन, इस्लामिक स्टेट के बग़दादी आदि वे चेहरे याद होते हैं, जो कथित शक्ति, क्रूरता, बर्बरता के सूरमा‑भोपाली थे (इतिहास में एक नाम हिटलर भी है)। ये सब किसके शिकार हुए?

अमेरिकी सैन्य ऑपरेशनों के। सही है कि इस काम में रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपतियों की संख्या अधिक है, मगर डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपतियों ने भी संकोच नहीं किया। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ट्रंप के ताज़ा ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ की तरह ही ‘ऑपरेशन नेप्च्यून स्पीयर’ को हरी झंडी दी थी। पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिका की नेवी सील टीम ने 9/11 हमलों के मास्टरमाइंड ओसामा को 1–2 मई 2011 की रात में मारने के ऑपरेशन को वैसे ही अंजाम दिया, जैसे इस तीन जनवरी की आधी रात को काराकास के राष्ट्रपति भवन में निकोलस मादुरो को दबोचने का सैन्य अभियान हुआ।

सो, ओबामा हों या डोनाल्ड ट्रंप, ये उस अमेरिकी व्यवस्था के प्रतिनिधि हैं, जिसमें ओलंपिक मेडल जीतना सामान्य बात है, तो सिलिकॉन वैली में कृत्रिम बुद्धि (एआई) की रचना का प्रतिमान भी सामान्य है; तो नौसेना की नेवी सील टीम हो या डेल्टा फ़ोर्स या सीआईए, सभी अपनी क्षमताओं का वह जज़्बा लिए होते हैं, जो वेयक्तिक धुन, टीम में पकती है और फिर बस उद्देश्य व कमांड की ज़रूरत होती है।

ऐसे जज़्बे वाले दूसरे देश का नाम इज़राइल है। इज़राइल की वजह यहूदियों का इतिहास‑बोध और संकल्प है। इज़राइल ने 1948 में गठन के बाद से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बूते ही अर्थ, धर्म, काम की मनुष्य‑वृत्तियों में नागरिकों और व्यवस्था को ऐसा बनाया है कि प्रधानमंत्री कोई हो, वह ज्ञात ख़तरों के प्रति कभी लापरवाह नहीं होता। इज़राइली व्यवस्था भी चेक‑बैलेंस में पाबंद है। नेतन्याहू हों या कोई प्रधानमंत्री, वे संस्थाओं और व्यवस्थाओं की स्वतंत्रता, जीवंतता का गला नहीं घोंटते। तभी ये दो ही देश हैं, जो विश्व राजनीति में बतौर धुरंधर बाकी सभी देशों को ठेंगा दिखाते हैं। ये जो चाहते हैं, वह करते हैं, फिर भले कोई इसे दादागीरी कहे या गुंडागर्दी!

सन् 2025 की जनवरी से इस तीन जनवरी की ताज़ा घटना में डोनाल्ड ट्रंप की पहचान मनमर्ज़ी की है। इससे अमेरिकी पहचान बिगड़ी, तो अमेरिका में भी आर‑पार की राजनीति के पाले बने हैं। मगर अमेरिका के हित की कसौटी में गौर करें, तो ट्रंप के फैसले अर्थिकी, सैन्य क्षमता, उद्यमशीलता, सामाजिक संरचना, पूंजीवाद आदि, सभी कसौटियों में ठीक ही हैं। भाषा और तौर‑तरीकों का फर्क है; अन्यथा राष्ट्रहित में उनके वैश्विक फैसलों (टैरिफ़ जंग, चीन को कसना, यूरोपीय देशों के सुरक्षा‑खर्च का बोझ घटाना, अपने से सटे दक्षिण अमेरिकी देशों यानी पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व की दादागीरी पर क्यों अमेरिका में कोई आपत्ति करेगा?

वेनेज़ुएला के तानाशाह राष्ट्रपति को उठवाने के बाद ट्रंप ने कहा है, अब से “पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व पर फिर कभी सवाल नहीं उठेगा। अमेरिका बहुत लंबे समय से ‘मुनरो डॉक्ट्रिन’ पर अमल के प्रति लापरवाह था। अब से ऐसा नहीं होगा।” ध्यान रहे, ‘मुनरो डॉक्ट्रिन’ का उद्देश्य लैटिन अमेरिका से विदेशी शक्तियों को बाहर रखना है। मतलब पूंजीवादी अमेरिका को अपने पिछवाड़े या पड़ोस में सोवियत संघ, रूस, वामपंथियों का प्रभाव बर्दाश्त नहीं। इस नीति के कारण उन्नीसवीं सदी में अमेरिका ने पनामा, निकारागुआ, क्यूबा, बोलीविया, चिली, अर्जेंटीना आदि सभी देशों में हस्तक्षेप किया, सरकारें बदलीं, दक्षिणपंथी सरकारें बनवाईं। शीत युद्ध के दौरान क्यूबा पर तो अमेरिका और सोवियत संघ में ज़बरदस्त ठनी थी, जिसके समाधान में सोवियत संघ झुका, उसने क्यूबा से अपनी मिसाइलें हटाईं।

वे दिन वापिस लौट आए हैं। डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा है कि अमेरिका अब वेनेज़ुएला को “चलाएगा”, यदि ज़रूरत पड़ी तो ज़मीन पर सैनिक उतार कर भी। वेनेज़ुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल‑भंडार हैं। उसकी कंपनियां “बेहद विशाल संपदा” निकालेंगी। अमेरिकी और वेनेज़ुएलावासी, दोनों की अमीरी बढ़ेगी। इसके साथ ट्रंप ने कोलंबिया और क्यूबा को भी धमकाया है। उन्होंने कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो पर “कोकीन बनाकर” उसे “अमेरिका भेजने” का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि वे अब अपने को बचाएं।

विश्व राजनीति में अपने इलाके में अपनी दबंगई की चाह हर महाबली को रही है। इसी कारण रूस के पुतिन ने यूक्रेन में पंगा बनाया। ऐसे ही चीन अपने प्रभाव‑क्षेत्र की ज़िद में है। हिसाब से दक्षिण एशिया में भारत का हित भी पड़ोसी देशों पर प्रभाव बनाए रखने से, बाहरी प्रभाव यानी चीन को बाहर रखे रखने में है। मगर भारत की व्यवस्था पोली है, चेहरे ठगने वाले हैं; इसलिए चीन को आंख दिखाने या अपने इलाके में अपने रुतबे की ताक़त ही नहीं है। लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी (दोनों की कमान में दुनिया ने असल सैन्य क्षमता जानी थी) के अपवाद को छोड़, भारत की व्यवस्था और उसके तमाम प्रधानमंत्री या तो रक्षात्मक रहे हैं या जनता को दिखावे, शौर्य के ऑपरेशन बनाते हुए।

याद करें युगांडा के हवाईअड्डे से नागरिकों को छुड़वाने के इज़राइली ऑपरेशन को; या अमेरिका के पाकिस्तान में आतंकियों को मारने, ईरान के एटमी ठिकानों पर हमले; या वेनेज़ुएला के ताज़ा ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ के परिणामों को। और अब ज़रा प्रधानमंत्री मोदी के छप्पन‑इंची छाती की कमान में बने ऑपरेशनों पर ध्यान दे? उनके क़िस्से हैं, कहानियां हैं, फ़िल्में हैं, पर परिणाम शून्य। पिछले ग्यारह वर्षों में भारत ने उरी की छावनी में घुसपैठ देखी। वही पुलवामा की आतंकी भयावहता दहलाने वाली थी; तो पहलगाम में हत्याएं नृशंस… मगर इन घटनाओं का एक भी दोषी, आतंकी अपराधी भारत की जेल में नहीं है। जबकि ट्रंप अभी कोकीन सप्लाई के आरोप में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को उठवा कर न्यूयॉर्क की अदालत में पेश करने वाले हैं; उधर एटमी ख़तरे में ईरान के एटमी ठिकाने पाताल में धंसा दिए हैं। जबकि भारत की सूरमा एजेंसियों, धुरंधरों का बूता नहीं है जो वे दाऊद इब्राहिम को दबोचें या भारत में ख़ौफ़नाक घटनाओं के ज़िम्मेदार आतंकी, मौलाना मसूद अज़हर, हाफ़िज़ सईद, लख़वी, कासकर को पाकिस्तान से उठा कर जेल में डालें।

बहरहाल, अमेरिका की एजेंसियां व संस्थाएं ठोस हैं, तो नतीजे भी असल और ठोस होंगे। वेनेज़ुएला के ऑपरेशन की गूंज चीन‑रूस को भी हैसियत बताने वाली है। दोनों देशों के हाथ‑पांव फूलेंगे। वेनेज़ुएला का राष्ट्रपति रूस के भरोसे था; सो, फिर साबित है कि रूस या चीन में वह क्षमता ही नहीं कि किसी के लिए वे अमेरिका से भिड़ें। चीन आज बैटरी यानी ईवी वाहनों के उत्पादनों से वैश्विक बाज़ार में जो डंका बजाए हुए है, उस पर संकट आ सकता है। इसका अधिकांश कच्चा माल, लिथियम, निकल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट—दक्षिण अमेरिका की खदानों से (चिली, अर्जेंटीना और बोलीविया के ‘लिथियम ट्रायंगल’ व ब्राज़ील की ‘लिथियम वैली’) मिलता है। सो, असंभव नहीं कि ट्रंप प्रशासन अपने रुतबे में चीन की सप्लाई रुकवाए। अमेरिकी विदेश‑रक्षा नीति में ‘मुनरो डॉक्ट्रिन’ पर अमल का संकल्प ठोस हुआ, तो सर्वाधिक प्रभावित चीन होगा।

दक्षिण अमेरिका को चीन ने चुपचाप लपेटे में लिया है। ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला, ब्रिक्स के ज़रिए चीन से जो नाता बनाए हुए हैं, वह ट्रंप प्रशासन को खटक रहा है। तभी 2026 में कोलंबिया, क्यूबा के बाद ब्राज़ील भी ट्रंप प्रशासन के निशाने में होगा। उधर ट्रंप ने ईरान के अयातुल्ला शासन को धमकी दी है कि वे अपने प्रदर्शनकारियों पर गोली न चलाएं; अन्यथा अमेरिका चूकेगा नहीं। मेरा मानना है कि इज़राइल तथा खाड़ी‑अरब के सुन्नी‑बहुल देश—सभी मिलकर—शिया ईरान पर ट्रंप प्रशासन से कार्रवाई चाहते होंगे।

ईरान भी रूस‑चीन पर आश्रित है; तो वेनेज़ुएला की तरह यदि ईरान का अमेरिका ने टेकओवर किया, तो विश्व राजनीति में अकल्पनीय धमाल होगा। उससे पाकिस्तान, भारत, रूस, दक्षिण एशिया—सब प्रभावित होंगे। इसलिए 2026 की शुरुआत असाधारण है। वेनेज़ुएला में अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन पर दुनिया चाहे जो कहे, हल्ला करे—पर ट्रंप रुकने वाले नहीं हैं। पिछले वर्ष उन्होंने व्यापार‑अर्थिकी के मोर्चे पर दुनिया को घायल किया; तो इस वर्ष वे सामरिक‑भूराजनीतिक मोर्चे में हैरान‑परेशान करने वाले हैं। नोट रखिए—कोई कुछ नहीं कर सकता। इसलिए क्योंकि अमेरिकी व्यवस्था का कोई तोड़ नहीं है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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