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महान राष्ट्र हमेशा गैंगस्टरों जैसे, छोटे राष्ट्र वेश्याओं की तरह

आज लिखना शुरू करने ही वाला था कि ‘द इकॉनोमिस्ट’ पत्रिका के ऐप पर आज के ही (8 मार्च 2026) Today’s Quote खंड में लिखा हुआ यह कोट पढ़ा — “द ग्रेट नेशन्स हैव ऑलवेज एक्टेड लाइक गैंगस्टर्स, एंड द स्मॉल नेशन्स लाइक प्रॉस्टिट्यूट्स।” (महान राष्ट्र हमेशा गैंगस्टरों की तरह व्यवहार करते हैं, वहीं छोटे राष्ट्र वेश्याओं की तरह) मुझे लगा भला अब अमेरिका-ईरान युद्ध, वैश्विक राजनीति, भारत की विदेश नीति पर लिखने के लिए क्या बचता है? इस एक वाक्य में 185 देशों में बंटी पृथ्वी के आठ अरब मनुष्यों के इतिहास-वर्तमान की व्याख्या है!

यह सूत्रवाक्य फिल्मकार स्टैनली क्यूब्रिक का है। वे, जिन्होंने पहले महायुद्ध से लेकर वियतनाम युद्ध, परमाणु हथियारों की प्रतिस्पर्धा, शीतयुद्ध आदि पर बेजोड़ फिल्में (Fear and Desire, Paths of Glory, Dr. Strangelove, Full Metal Jacket, Barry Lyndon आदि कई) बनाई। उन्होंने लगातार युद्ध, सत्ता, तकनीक और मानव स्वभाव को पर्दे पर उतारा।

मतलब स्टैनली क्यूब्रिक न केवल वैश्विक पैमाने के फिल्मकार थे बल्कि उनका उन वैश्विक बौद्धिक प्रतिष्ठानों  में भी मान था फिर भले वे ग्रेट नेशन्स याकि ग्रेट गैंगस्टर्स के पोषक रहे हैं!

सो महाशक्तियों की गुंडई-गैंगगिरी के आगे सभी देशों की वेश्यावृति पर सोचे तो आधुनिक राष्ट्रों की रीति नीति में क्या निकलेगा? मोटामोटी देश के लोगों के हितों, देशहित को मजबूरी में छोड देना। झुक जाना, सौदा कर लेना। भारत की नई जेनरेशन वेश्या शब्द से राजनीति के भाव शायद नहीं समझ पाए। खासकर हिंदीभाषियों और सोशल मीडिया के भक्तजन। ये देवदास की पारो के आगे भव्य फिल्मी कोठे की फिल्मी वेश्या चंद्रमुखी में खोए हो सकते हैं तो कॉलगर्ल, देवदासी, तवायफ जैसे शब्दों को ख्यालों में यह नहीं मानेंगे कि देशों के विदेश मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति भी ट्रंप, नेतन्याहू या शी जिनपिंग के आगे अपनी जमीर, अपना ईमान बेचे तो वह वेश्यावृत्ति है!

जबकि भारत का राजनीतिक इतिहास, देश की दशा-दिशा का ब्यौरा वेश्याओं, विषकन्याओं, दरबारी जनखों के अनुभवों से भी भरा हुआ है। हम हिंदुओं की गुलामी याकि मुगलों, राजे-रजवाड़ों के इतिहास के सत्ता खेल में इनका बड़ा रोल रहा है। पाटलीपुत्र का दरबार हो या आगरा, दिल्ली के लालकिले के बादशाह के आगे छोटे ठिकानेदारों के झुकने, नजराने-हरजाने, शुक्रियाना के साथ जमीर-रियासत बेचने से लेकर, बेटी ब्याहना तक सहज राजनीतिक व्यवहार रहा है। याद है अकबर के आगे जयपुर के राजा मानसिंह का अपने को बेचने का इतिहास। ग्रेट अकबर के आगे कथित  देशी ग्रेट मानसिंह ने झुक कर जो गुलामी की थी वह क्या था? स्वतंत्रतचेता राणा प्रताप को घास की रोटियां खानी पडी थी।

बहरहाल, 2026 के मौजूदा समय में लाठी के ग्रेट नेशन्स, ग्रेट गैंगस्टर्स कौन हैं? इनके आगे कितने राष्ट्र, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति झुके हुए हैं? मेरा मानना है इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग।

दूसरे शब्दों में तीन सभ्यतागत महाशक्ति लाठियां। बुद्धि-पूँजी की यहूदी महाशक्ति नंबर एक पर, तो ईसाई (इवेंजेलिकल ईसाई राष्ट्रवाद) महाशक्ति दूसरे स्थान पर तथा मैन्यूफैक्चरिंग-औद्योगिक-व्यापारिक महाशक्ति के रूप में चीनी सभ्यता!

रूस और व्लादिमीर पुतिन का अर्थ नहीं है। पुतिन ने रूस को पिछलग्गू बना दिया है। वे यूक्रेन युद्ध चीन की छाया में और उसकी कृपा पर लड़ रहे हैं।

नंबर एक पर बेंजामिन नेतन्याहू। इसलिए क्योंकि दूसरे महायुद्ध के बाद से यहूदी लगातार बुद्धि-पूंजी-तकनीक की बदौलत अपनी दुधारी तलवार लिए हुए हैं। इससे अमेरिका चलता हुआ है। उसी के बल पर इन दिनों डोनाल्ड ट्रंप का मनमानी है।  ध्यान रहे इस्लाम के प्रति जैसा यहूदी दिमाग है वैसा ही इवेंजेलिकल ईसाई राष्ट्रवादी दिमाग है। तभी नेतन्याहू ने अमेरिका से ईरान पर वह कराया है जिसकी कल्पना नहीं थी।

सोचे, अमेरिका की सेना लगभग सबकुछ तो नेतन्याहू के कहने में काम कर रही है। खुफिया सूचनाएं, नक्शा, रोडमैप, ब्रीफिंग सब का केंद्र बिंदु नेतन्याहू। और फिर ट्रंप गैंग लीडर की तरह बोलते हुए। क्या यह अपने आपमें “द ग्रेट नेशन्स-ग्रेट गैंगस्टर्स” का साक्ष्य नहीं है?

और ग्रेट इजराइल-अमेरिकी गैंगस्टर जोड़ी के आगे ठुमकने की वेश्यावृत्ति लिए हुए कौन है? मेरा मानना है पूरा पश्चिम एशिया, सभी अरब-इस्लामी देश! कैसे? सोचे, अक्टूबर 2023 से लेकर आज 8 मार्च 2026 तक गाजा में नेतन्याहू ने अरब लोगों (फिलिस्तीनी मूल के वे अरब, जिन्हें खदेड़ कर 1948 में तब की ग्रेट महाशक्ति अमेरिका-ब्रिटेन की गैंग ने इजराइल बनाया था) को बेरहमी से मारा, उजाड़ा, खदेड़ा लेकिन ऐसा आंखोंदेखी के बावजूद  इस्लाम के ठेकेदार सऊदी अरब, कतर, जॉर्डन, यूएई, इराक, तुर्की के शेखों, राष्ट्रपतियों ने सार्वजनिक तौर पर इजराइल को यह अल्टीमेटम देने की इतनी भी जुर्रत नहीं की कि इजराइल अब रुक जाए नहीं अन्यथा…

उस नाते  पश्चिम एशिया के शेखों, सऊदी किंग-प्रिंस, राष्ट्रपतियों, तानाशाहों, प्रधानमंत्रियों की अस्सी वर्षों की कूटनीति, सैनिक-भू राजनीति की अमेरिका-इजराइल के आगे लाचारगी का मामला अतुलनीय है। इजराइल जीरो से शुरू हुआ था लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों में बुद्धि (सर्वाधिक नोबेल पुरस्कार विजेता, हार्वर्ड-ऑक्सफोर्ड, बौद्धिक प्रतिष्ठानों में प्रोफेसरों, वैज्ञानिकों, उद्यमियों के बतौर महाशक्ति जैसा ठोस यहूदी दबदबा) तथा पूंजी के महाशक्ति बल से यहूदियों ने इजराइल को सबकुछ दिया या दिलाया। नतीजतन इजराइल जैसा बना, उसका छटांग भी अरब-इस्लामी देश नहीं बन पाया।

जबकि अरब-खाड़ी के इन देशों ने तेल से बेइंतहा कमाई पाई। अमीरी बनी मगर आया तो कंक्रीट के मकान, शहर बसाने या इमारतें खड़ी करने के अलावा कुछ नहीं किया। इजराइल की राजधानी येरूशलम, व तेल अवीव के बगल के देशों में चमक भरपूर है मगर मौलिक ज्ञान-विज्ञान, स्वतंत्रता की भूख नहीं है। इजराइल की राजधानी में  कुवैत, दुबई, बहरीन, सऊदी, कतर जैसी इमारतें नहीं मिलेंगी। न ही नेतन्याहू ने अपने प्रधानमंत्री मोदी जैसा किलेनुमा प्रधानमंत्री आवास बनाया है,दफ्चर बनाए है। उलटे नेतन्याहू ने प्राचीन शहर येरूशलम को राजधानी बनाया।

और पता है दुबई, कुवैत, सऊदी के नए शहरों की शान का रक्षक कौन है? ग्रेट नेशन इजराइल-अमेरिका याकि नेतन्याहू-ट्रंप की गैंग। तथ्य है कतर, सऊदी, दुबई, बहरीन, इराक में अमेरिका ने अपने सैनिक अड्डे बना रखे हैं। इनकी रक्षा के लिए। ईरान के हमलों के आगे इससे इन देशों को कवच मिला हुआ है। लेकिन इससे साबित क्या हो रहा है?  इन देशों ने हमला नहीं करने की हर संभव मिन्नत की। लेकिन अधिनिस्थ क़ॉलोनियों या शक्तिहीन-छोटे देशों की कौन सुनता है!  तभी दुनिया का मुसलमान यह ज्यादा सोच रहा होगा कि इन देशों पर मिसाइल छोड़ ईरान सही कर रहा है। दुनिया के सवा दो अरब मुसलमानों (शिया और सुन्नी दोनों) में अधिकांश का मनोविज्ञान पहले गाजा और अब ईरान पर इजराइली-अमेरिकी ध्वंस से बेहद घायल है। सोचना भी गलत नहीं है कि खाड़ी के इन देशों के मुसलमानों में भी यह सोचने वाले होंगे कि ईरान सही कर रहा है!

तभी पश्चिम एशिया के अरब-खाड़ी देशों पर यह वाक्य बेमतलब नहीं है कि ‘द स्मॉल नेशन्स लाइक प्रॉस्टिट्यूट्स।”

पर क्या करें, ऐसे ही कायदे है। बड़ी मछली छोटी को खाएगी ही! जिसकी लाठी उसकी भैंस होगी ही। इसी भाव में ही तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी छप्पन इंची छाती की हवा-हवाई विदेश नीति की। अपने को ग्रेट नेशन, विश्वगुरु, चमकती अर्थिकी के हवाले शी जिनपिंग, पुतिन, ट्रंप से गलबहियां के फोटो बनवाएं। एजेंसियां मोसाद की तरह कनाडा, अमेरिका में दुश्मन तलाशने लगी तो पड़ोस में ठेके दिलवाने से लेकर उन्हे ठोंकने के तौर-तरीके भी बने? पर भला असल तीन गैंगस्टर महाशक्तियों से यह छिपा रह सकता था?

तभी पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के समय राष्ट्रपति ट्रंप का मूड बिगड़ा नहीं कि भारत तब से वह सब भुगतता हुआ है जो दुनिया में किसी ने नहीं भुगता। मई 2025 से ट्रंप भारत को लगातार जलील करते आए है? भारत की सैन्य क्षमता से लेकर उसे दंड देने से लेकर किसके साथ क्या व्यापार करें, और करें या न करें जैसे आदेश भी अमेरिका से आ रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री और भारत को सबकुछ मान्य। कभी कोई प्रतिवाद नहीं।

और डोनाल्ड ट्रंप कई और देशों के साथ भी यही व्यवहार कर रहे हैं क्योंकि “द ग्रेट नेशन्स हैव ऑलवेज एक्टेड लाइक गैंगस्टर्स!”

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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