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वह सनातन चरित्र कहां जो भारत बने?

देश इन दिनों सत्य-शोध की कोयला खदान है, जिससे यदा-कदा निकले चमकीले कण दिमाग़ और बुद्धि को खदबदा देते हैं। हाल में रक्षा बजट में एक लाख करोड़ रु. से अधिक बढ़ोतरी की खबर थी। भारत 2026–27 में 2.19 लाख करोड़ रु. के सैन्य उपकरण खरीदेगा। ऐसे ही यूरोपीय संघ के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप से व्यापार समझौते की सुर्ख़ी है। मतलब जहाँ सैन्य क्षमताओं में बढ़ोतरी का क़दम, वहीं भारत की आर्थिकी का खुलना। कभी मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने लिखा है कि अब भारत विश्व की सर्वाधिक खुली आर्थिकी होने के क़गार पर है! बहुत अच्छा। पर ये फ़ैसले भारत की मजबूरी से हैं या ठोस संकल्प से हैं?

आख़िर चीन से हारने के बाद सैन्य ताक़त का विस्तार तो नेहरू के समय में ही शुरू हो गया था। फिर लालबहादुर शास्त्री ने मुंबई में ट्रॉम्बे में एटमी भट्टी का शिलान्यास किया। इंदिरा गांधी ने परमाणु परीक्षण कराया। नरसिंह राव ने परमाणु बम–मिसाइलें बनवाईं, तो वाजपेयी ने बिना आगे–पीछे सोचे पोखरण में पाँच परीक्षण कर दुनिया को बताया—आज बुद्ध पूर्णिमा है!

ऐसे ही नरसिंह राव ने आर्थिकी खोली। मनमोहन सिंह ने उससे भूमंडलीकरण साधा, तो ट्रंप के झटकों के बाद भारत अब उनकी शर्तों पर व्यापार समझौता किए हुए है। सर्वाधिक खुली आर्थिकी के जुमले बन रहे हैं, तो स्वाभाविक सवाल है—खुलने से हम बाज़ार बनेंगे या समर्थ, आत्मनिर्भर होंगे या आश्रित ? यह मानना तो मूर्खता ही होगी जो सोचे कि चीन डरकर लद्दाख, अरुणाचल से निगाह हटा लेगा या पाकिस्तान की कश्मीर से नज़र हट जाएगी। हक़ीक़त है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद वैश्विक सैन्य जगत में भारत की जो किरकिरी हुई, उसने मोदी सरकार को सैन्य ख़र्च बढ़ाने के लिए मजबूर किया है।

ऐसे ही अमेरिका और यूरोप के साथ व्यापार करार भी भयाकुल मनोदशा में हैं।

यही कलियुगी हिंदुओं का वह इतिहासजनित डीएनए है, चरित्र है, जिसमें मुझे कोयला खदान का बिंब झलकता है! कोई तीन दशक पहले मैंने झारखंड घूमते हुए कोयला खान के मुहाने के घने काले परिवेश में काली धूल में लथपथ जीवन महसूस किया था। मिट्टी, मज़दूरी, झोपड़ियाँ, मज़दूर (आदिवासी बहुल), इन्फ़्रास्ट्रक्चर—सब काली धूल में लथपथ। मानो शनि का घर। फिर घूमते-घूमते कोल इंडिया, स्टील इंडिया के सरकारी प्रतिष्ठान, बोकारो का स्टील प्लांट देखा-समझा, तो दिमाग़ बुरी तरह खदबदाया। मेरी इस सोच को बल मिला कि नेहरू के समाजवाद, लाइसेंस–कोटा–परमिट और अंग्रेज़ विरासत ने सब गुड़गोबर किया है।

अर्थात मुस्लिम–मुग़ल लुटेरों–शासकों से जहां हिंदुस्तान खेतीहर पैदावार, हस्तशिल्प की उत्पादकता–व्यापार में लुटा तो अंग्रेज़ हुक्मरानों ने लगान-लूट के अलावा खदानों–कच्चेमाल (माइनिंग), व्यापार (मर्केंटाइल)—यानी कोयले की दलाली—के काले हाथों में हिंदुस्तानियों को रंगा। लुटेरे जगतसेठ पैदा किए। वही दिशा स्वतंत्रता के बाद, प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू से बनी। उन्होंने पुराने अंग्रेज़ मॉडल की विरासत की नींव पर ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ गढ़ा। ऐसा समाजवाद अपनाया, जो सत्ता द्वारा, सत्ता के ख़ातिर, सत्ता की लूट का तंत्र विकसित करने वाला था। नतीजतन भारत के लोग पावरफ़ुल ‘नागरिक’ बनने की बजाय और अधिक हुकूम के बंधुआ, क़ानूनों में बंधे, माई-बाप सरकार पर आश्रित हुए। नौकरशाही ने समाजवाद के नाम पर आर्थिकी को माइनिंग–मर्केंटाइल के ढाँचे वाली कोयला खान को पुनर्गठित किया!

समय कुछ बदला। सो बुद्धिमान पी. वी. नरसिंह राव की मौन बहादुरी से भारत ने ताज़ा हवा पाई। डॉ. मनमोहन सिंह की दृष्टि, विद्वत्ता से वैश्विक राजधानियों में भारत का मान बना। पर हम हिंदुओं का इतिहास तो भयाकुल क़ौम का है। समर्पण—भूख—भय—भक्ति का है। वह कैसे मिटता? मेरा लिखना इमरजेंसी के समय 1976 से शुरू हुआ है। तब वैश्विक विषयों (सोवियत संघ, शीतयुद्ध, अफ़ग़ानिस्तान आदि) पर लिखता था, तो साम्यवाद, समाजवाद, गरीबी हटाओ, 20 सूत्री कार्यक्रमों से भारत समझ आता था। पूरा ठीकरा नेहरू के आइडिया, समाजवाद, गिरगिटी नौकरशाही की कोयला खदान पर केद्रीत हुआ। तब भी ज़ाहिर था कि हिंदुओं का वह भक्ति काल है, जो हज़ार साल की ग़ुलामी से पैदा कायरता का बाय-प्रोडक्ट है।

इसलिए मेरे लिए 1977 में कांग्रेस की हार और इंदिरा गांधी की जगह निर्भीकता का मंत्र देने वाले मोरारजी देसाई का शपथ लेना मानो क्रांति के क्षण थे। पर उन्होने भी नेहरू के आइडिया ऑफ़ इंडिया के ढाँचे को नहीं समेटा। उलटे सदियों से सत्ता के लिए फड़फड़ाती क़ौम के नए प्रतिनिधि भुख्खड़ों में घमासान बना। पहले समाजवादी, फिर कम्युनिस्ट नेताओं की वह तोड़फोड़, वह आचरण प्रकट हुआ, जिसमें आयाराम–गयाराम भी हुआ; तो बाँटो और राज करो की मंडल राजनीति, फिर संघ–आडवाणी की कमंडल राजनीति भी खिली। चुपचाप भगवा रंग चढ़ने लगा।

बीच में जरूर नरसिंह राव ने अफ़सरों (शासन) की दख़ल घटाई, भारत खुला; पर सत्ता की भूख, हड़बड़ी (जैसे 1947 से पहले नेहरू–गांधी की थी) भी खुली। मंडल–कमंडल के वे नेता ज़मीनी हल्ला बनाते हुए थे, जिससे देश ने चीन के साथ-साथ उठने के अवसर गँवाए। कम्युनिस्ट सुरजीत–प्रकाश करात, लालू, रामविलास आदि प्रगतिशीलता, सामाजिक न्याय के हवाले अपने ही समर्थ से बनाई मनमोहन सिंह सरकार की नाक में भी दम किया।

कुल मिलाकर आर्थिकी खुली, तब भी देश चीन की तरह फ़ायदा नहीं उठा पाया। हाँ, नारायणमूर्ति जैसे कुछ नए उद्यमियों की बदौलत भारत ज़रूर आईटी क्षेत्र में दुनिया का बैकऑफ़िस, आईटी-कुलियों का सप्लायर देश बना। मेरा मानना है कि ग़ुलामी के इतिहासजन्य डीएनए से हम हिंदू बुद्धि-बल से ज्ञान–विज्ञान–शोध–तकनीक–लेखन में कुछ भी मौलिक रचने में समर्थ नहीं हैं। हमें केवल जुगाड़ आता है। समय रीपिट होता रहता है। अंग्रेज़ों के समय गन्ना पैदा करने वाले किसान विदेश (फ़िजी, मॉरिशस, सूरीनाम आदि) गए। वैसे ही नए मिलेनियम में भारत का योगदान खाड़ी देशों में मज़दूर सप्लाई तथा आईटी-कर्मियों की दुनिया की सेवा था। उसी से अमेरिका, पश्चिमी देशों में भारतीयों का जाना हुआ।

सोचे, प्रवासियों ने जो कमाया, वह किसमें जाया हुआ? केरल के मलयाली परिवार की प्रवासी कमाई हो या पूर्वी यूपी के खाड़ी देशों में गए मज़दूरों की कमाई, या बेंगलुरु के आईटी हब में उत्तर भारत की काम कर रही श्रमशक्ति, या बिहार से देश भर में फैले मज़दूरों की कमाई—इससे देश की शक्ल दो तरह से बदली है। 2010 के बाद का कथित भारत-विकास या तो खपत-बाज़ार बढ़ाने का चक्र लिए हुए है, या टैक्स, जीएसटी से सरकार की फ़िज़ूलख़र्ची (वेतन आयोगों, लुटियन दिल्ली में इमारतें बनाने, इन्फ़्रास्ट्रक्चर, फिर उन्हें क्रोनी पूँजीपतियों को बाँट देना) का वह दुष्चक्र है, जिसके झाँसे, ललक ने घर–परिवारों, नौजवान दंपत्तियों, मध्यवर्ग, निम्न वर्ग, किसान—सभी को क़र्ज़ में जीने का आदी बना दिया है। सोचे, कभी भारत का ग़रीब बचत के रिकॉर्ड बनाता था और अब हर कोई क़र्ज़ों में डूबा है, ख़ैरात पर ज़िंदा है। देश में संतुष्ट, स्वपोषक, आत्मनिर्भर केवल वही आबादी है, जो कोयले की खान की काली कमाई, दलाली से हराम का जीवन जी रहे हैं!

विकास के नाम पर कोयले की खान का क्या रूप-परिवर्तन है? मशीनें चीन की लग गई हैं, भ्रष्टाचार के भरपूर विकास में दुनिया के नंबर एक हैं। पर दिल्ली हो या झारखंड का निवासी—हर भारतीय धुएँ, धूल से फेफड़े काले करते हुए है। मज़दूर हो, आधुनिक गिग वर्कर हो—सब लाचारी, दीनता, क़र्ज़ से जीते हुए हैं। पर यह जरूर हुआ सत्ता की काली खान, कोयले के काले धंधों ने नए जगतसेठ पैदा किए। वे सेठ जो सस्ता कच्चा तेल खरीदते हैं, कोयला निकालते हैं और पेट्रोल–डीज़ल–गैस तथा बिजली सब मंहगा भारतीयों को बेचते हैं—तो विदेशियों को भी बेचते हैं। मुग़ल–अंग्रेज़ ज़माने के जगतसेठ अब उन नए चेहरों में कन्वर्ट हैं, जो “न हल्दी लगे, न चूना—रंग चोखा आए” के नुस्खे में ख़रबपति बनने के वैश्विक रिकॉर्ड बना रहे हैं।

सो वैश्विक पैमाने पर भारत की आर्थिकी सर्वाधिक खुले तब भी क्या होना है? पर खुलना मजबूरी भी है। अमेरिका या योरोप से भारत  समझौता न करे, तो सहारा क्या है? भारत किनके बूते दुश्मन चीन और पाकिस्तान से बचेगा? ये वे दो देश हैं, जिनकी चिंता में सरकार ने रक्षा बजट में 2.19 लाख करोड़ रु. के सैन्य उपकरण खरीदने का फैसला किया।

पर क्या सैन्य हथियार ख़रीदने से क्या चीन और पाकिस्तान डरेंगे? हथियार तो हिंदू राजा–रजवाड़े भी रखते थे। उनकी पूजा भी करते थे। मगर ख़ैबर पार से आ रहे हज़ार–पंद्रह सौ घुड़सवारों के आगे भाग खड़े होते थे। लड़ने के बजाए भागने, समर्पण का राजा जुगाड़ तलाशता था।

क्यों? जवाब है कौम का कलियुग की काली बुद्धि, काले शनि की छाया में जो जीना है। याद करें, मोदी सरकार ने राफ़ेल खरीद कर कैसी सूरमाई झांकी बनाई थी।  नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह ने पूजा की, काला धागा बाँधा। हुआ क्या? ऑपरेशन सिंदूर के सत्य के लिए वैश्विक रिपोर्ट तलाशीं, तो मालूम हुआ—राफ़ेल का नुक़सान। ट्रंप ने क्या बोला? … मोदीजी के निजी दोस्त ट्रंप क्या कह रहे थे…. तब विमान गिर रहे थे, पाँच… छह!

जाहिर है संकट गहरा-दिमागी है। भयाकुल हिंदू जीवन झूठ की कोयला खदानों में सांस ले रहा है।  भीड़ अब सनातनी चरित्र वाली नहीं बल्कि उस कायर, कलियुगी जमात की है जो एक सनातनी दंडीधारी शंकराचार्य से सवाल करता है कि साबित करो—तुम शंकराचार्य हो! सनातनी परंपरा के उस प्रतीक से सवाल, जिसका सत्त्व-तत्त्व है—उठो, जागो और श्रेष्ठ को प्राप्त सत्य को जानो, सत्य में ही जियो। (“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” — कठोपनिषद्)

ध्यान रहे जो कौम बुद्धि श्रेष्ठ, शुद्ध, सत्य लिए नहीं होती वही मनुष्य, देश अपने और सत्य के बीच दूरी बनाता है और सदैव भय में जीता होता है। (“यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते, अथ तस्य भयं भवति।” — बृहदारण्यक उपनिषद्)। तभी मेरा मानना है—भारत भय, बुद्धिहीनता की वह कोयला खदान है जिससे सब कुछ कलुषित है। काली जुबां है, काले जुगाड़ हैं।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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