आज इक्कीसवीं सदी के वर्ष छब्बीस की 26 जनवरी है। और यह पंडित नेहरू का दिन है। क्या आप चौंके? स्वाभाविक है। हम वे नागरिक हैं जो इतिहास और इतिहास-बोध से कम, मिथक और कल्पनाओं में जीते आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले माने कि राजपथ को कर्तव्यपथ नाम देकर, और लुटियन दिल्ली में नई सत्ता-इमारतें खड़ी करके, वे नेहरू को स्मृति से विस्थापित कर देंगे। पर क्या उन्हें यह बोध है कि 26 जनवरी स्वयं नेहरू की अमिट विरासत है? यही वह तिथि थी जिसे नेहरू ने 1930 में ‘पूर्ण स्वराज’ का दिवस घोषित किया था। फिर उसी ऐतिहासिक संकल्प की निरंतरता में प्रधानमंत्री नेहरू ने 26 जनवरी के दिन देश को संविधान दिया। तभी 26 जनवरी से जुडी हर स्मृति, संविधान और उसके उत्सव, परेड सभी में नेहरू की धुरी को भारत कभी भूला नहीं सकता।
यों राजपथ की अंग्रेज़-निर्मित संसद की जगह नई संसद के अपने निर्माण तथा अंग्रेज़–नेहरू की विरासत की इमारतों को ढहा कर प्रधानमंत्री मोदी अपनी विरासत की प्रतीक कई बेढब कंक्रीट इमारतें बनवा रहे हैं। लेकिन भला इमारतों से कोई राज अमिट बनता है? अमिटता तो 26 जनवरी की उस तारीख़ में है, जो स्वराज, स्वतंत्रता, संविधान और गणतंत्र के हर उत्सव में—उसकी परेड के हर पग पर पंडित नेहरू की स्मृति को उभारती है, जीवित रखती है।
26 जनवरी की तारीख सचमुच पंडित नेहरू का दिन है। वह दिन जिसकी 1930 की तारीख पर लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी। तब रात में नेहरू ने तिरंगा फहराया था। स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी। ध्यान रहे—इसके ठीक 27 दिन पहले गांधी ने सरदार पटेल आदि वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को दरकिनार कर 29 दिसंबर को मोतीलाल नेहरू की लॉबिंग से नौजवान नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाया था। पिता मोतीलाल ने बेटे जवाहरलाल को अध्यक्ष पद हस्तांतरित कर उसका राजतिलक किया था। उस दिन नेहरू लाहौर में रावी नदी के किनारे नौजवान कांग्रेसियों के जुलूस (परेड) में सफ़ेद घोड़े पर सवार कांग्रेस मंच पर पहुंचे। पिता से कमान संभाली। फिर बतौर अध्यक्ष पूर्ण स्वराज का संकल्प बताया। कांग्रेस का देशव्यापी कार्यक्रम बना। और अंततः 26 जनवरी 1930 को लाहौर में नेहरू ने तिरंगा फहराया, भाषण दिया।
उसके बाद हर वर्ष नेहरू के आइडिया ऑफ इंडिया में 26 जनवरी का दिन पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाता रहा—नेहरू की अगुआई और उनकी व्यक्तिगत शान से। और गौर करें इस विडंबना पर कि 15 अगस्त 1947 की आज़ादी के बाद आई 26 जनवरी 1948 को नेहरू ने बतौर प्रधानमंत्री स्वराज दिवस की अपनी परंपरा में लाल किले के समारोह में झंडा फहराया, तब भी स्वतंत्र भारत के अधिष्ठाता लॉर्ड माउंटबेटन (बतौर गवर्नर-जनरल) थे। हां, नेहरू ने स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल की शपथ उन्हीं माउंटबेटन की करवाई, जिनसे उन्हें सत्ता-हस्तांतरण हुआ था।
इसलिए मेरा मानना है—15 अगस्त 1947 का स्वराज औपनिवेशिक विरासत, अंग्रेज़ छाया, मिज़ाज, शासन से बुरी तरह गुंथा हुआ है। और उसकी मिसाल 26 जनवरी का दिन है, परेड है और नेहरू के आइडिया में रचा-पका संविधान है। वह तंत्र है जो अंग्रेज़ों की विरासत है और गण पर वैसा ही शासन करते हुए है, जैसे नेहरू ने किया और फिलहाल नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। और सर्वाधिक विचारणीय सवाल यह है कि 2014 से 2026 के मोदी शासन में संघ परिवार मनसा, वाचा, कर्मणा से वही पथ-संचलन कर रहा है, जिसका नाम राजपथ था, है और रहेगा—फिर भले प्रधानमंत्री अपनी और सत्ता की शान का कर्तव्यपथ से बखान करें।
26 जनवरी का दिन पूर्ण स्वराज के आयोजन में नेहरू के तरानों का दिन था, तो उनकी सोच, उनके नेतृत्व, उनकी छाप, उनकी विरासत का भी दिवस है। इस दिवस के लिए उन्होंने इवेंट मैनेजर के रूप में वैसे ही सब कुछ किया, जैसे प्रधानमंत्री मोदी उनकी विरासत की अनुपालना में अपने राज की भव्यता, शान बनाने के लिए करते हैं।
इतिहास में लौटें। संविधान बना तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उसे लागू करने की तारीख 26 जनवरी तय की। उसी दिन उन्होंने प्रथम राष्ट्रपति की शपथ और नए राष्ट्रीय चिन्ह, राष्ट्रीय पक्षी का फ़रमान बनाया। सब कुछ अपने प्रतीक-दिवस 26 जनवरी में सिमटा। स्वाभाविक था—आखिर वे ही तो सर्वेसर्वा थे। उनकी धुरी, उनकी राजनीतिक-वैचारिक दिशा में संविधान लिखा गया। उनके मिज़ाज-अनुकूल औपनिवेशिक राज्य-तंत्र के आधार—अर्थात भारत सरकार अधिनियम, 1935 और उसमें संशोधन से बने अंग्रेज़ों के भारत स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Government of India Act, 1935; Indian Independence Act, 1947)—से संविधान का ढांचा ढला। तभी अंग्रेज़-राज निर्मित दोनों अधिनियमों की व्यवस्था की बदौलत नेहरू से मोदी-राज तक का भारत-शासन उस कार्यपालिका, विधान व न्याय की संरचना से संचालित है, जिसे ब्रिटेन की संसद और वहां की कार्यपालिका ने हिंदुस्तानियों पर राज करने की आवश्यकता में गढ़ा था। और यह तथ्य भी जानें कि 26 जनवरी 1950 को हम—भारत के लोगों—ने जिस संविधान की पालना का सामूहिक संकल्प लिया था, उसकी संरचना का लगभग 70 प्रतिशत आधार अंग्रेज़-निर्मित भारत सरकार अधिनियम, 1935 है। मतलब—शासन कैसे चलेगा, इसकी व्यवस्था और तंत्र। सो, मशीन वही पुरानी और उससे गणतंत्र के गण—यानी प्रजा—अनुशासित व पाबंद।
1947 में स्वतंत्रता से 17 वर्ष पहले पंडित नेहरू आज़ादी दिलवाने वाले मसीहा के नाते 26 जनवरी के दिन सुर्खियों में हुआ करते थे। और सचमुच वे फिर प्रथम प्रधानमंत्री बने। स्वतंत्र भारत की नियति के नियंता के रूप में भारत की उंगली पकड़ भारत का सफ़र शुरू कराया। संविधान सभा से संविधान बनवाना शुरू किया। तब भी धुरी जवाहरलाल नेहरू थे। अपने भरोसेमंद आईसीएस अफ़सर बीएन राव को संविधान सभा का संवैधानिक सलाहकार बनाया। राव ने दुनिया घूम कर, अंग्रेज़ ढांचे को पकड़ कर प्रारंभिक मसौदा तैयार किया। उसी से मशीनरी के अनुच्छेद बने। बहस संविधान सभा ने की, पर किन विकल्पों को अपनाया जाए, किन्हें छोड़ा जाए—यह नेहरू व राव ने तय किया। केंद्र सरकार कितनी ताक़तवर होगी, आपात शक्तियों में नागरिक अधिकारों से अधिक राज्य का तंत्र क्यों कर सर्वोच्च होगा—ऐसे सवालों में निर्णय नेहरू के राजनीतिक विवेक से था। नेहरू ने अनुच्छेद नहीं लिखे, पर उन्होंने यह तय किया कि राज्य कैसे सोचेगा और नागरिक से क्या अपेक्षा रखेगा।
सो, बीएन राव ने संविधान का संरचनात्मक ढांचा गढ़ा—प्रारंभिक मसौदा, तुलनात्मक अध्ययन, संघीय व्यवस्था, आपात शक्तियां और न्यायिक व्यवस्था की वह रूपरेखा बनाई, जिन पर फिर पूरा संविधान खड़ा हुआ। दूसरी ओर जवाहरलाल नेहरू ने संविधान की राजनीतिक-वैचारिक दिशा तय की। उन्होंने अनुच्छेद नहीं लिखे, पर यह निश्चित किया कि राज्य-सत्ता कैसी होगी, केंद्र कितना शक्तिशाली रहेगा, स्थिरता को कितनी प्राथमिकता मिलेगी और नागरिक से किस स्तर की सहभागिता अपेक्षित होगी। इस तैयार ढांचे को फिर डॉ. आंबेडकर ने कानूनी स्पष्टता और वैधानिक भाषा दी।
इसलिए कहने को संविधान सभा ने संविधान बनाया। मगर असल में अंग्रेज़ विरासत और पंडित नेहरू का यह वह योगदान है, जिसकी स्तुति-गान में 1950 में प्रधानमंत्री नेहरू ने वह सब किया जिससे 26 जनवरी का दिन इतिहास में उनकी अमिटता का दिन बना रहे। एक राष्ट्रीय इवेंट मैनेजर की तरह उत्सव के आयोजन बनाए—प्रथम राष्ट्रपति की शपथ, अपने मध्यमार्गी मिज़ाज के अनुसार बुद्ध की स्मृति के सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ का सिंह-शीर्ष, राष्ट्रीय पक्षी मोर और अंग्रेज़ परंपरा की सत्ता-परेड का आयोजन भी।
सोचें—1930 में लाहौर में रावी नदी के किनारे अपने राजतिलक (पिता से पुत्र को प्राप्त अध्यक्ष पद), पूर्ण स्वराज के उद्घोष, संविधान-निर्माण, उसे अपनाने के संकल्प—सभी को 26 जनवरी की तारीख़ में गूंथने का उत्सव-आयोजन एक नेता ने जैसा रचा है, क्या वैसा दुनिया में कहीं और है?
उत्सव में राजपथ की परेड से लेकर एट होम, बीटिंग रिट्रीट—हर नेहरू-आयोजन अंग्रेज़ विरासत से प्रेरित था। आज़ादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश महारानी की शान में भारत की प्रजा, राजे-रजवाड़े अपनी झांकियों व हाथी-घोड़ों से शासक को सलामी देते थे। ध्यान रहे—अंग्रेज़ों की शक्ति, सैनिक-प्रदर्शनी की परेड में ही 1857 की क्रांति की चिंगारी सुलगी। गुलाम प्रजा के अधिपति होने, शासन-सत्ता-शक्ति के सर्वशक्तिमान होने के ब्रिटिश औपनिवेशिक अहंकार में ही गवर्नर-जनरलों ने दिल्ली दरबार (1903, 1911) के आयोजन किए—शक्ति और प्रभुत्व दर्शाया। तब लाल किले से अंग्रेज़ शासक नज़ारा देखते थे। सैन्य परेड, शाही जुलूस और राजाओं-ठिकानेदारों की हाथी-घोड़े पर सवारी-झांकियों से वे अपना जलवा दिखाते थे। तब वह साम्राज्य की सत्ता का प्रदर्शन था।
उसी परंपरा को पंडित नेहरू ने 26 जनवरी की आदत बनवाया। वह सब किया जो नई दिल्ली में अंग्रेज़ विरासत का ठाठ-बाट था—26 जनवरी की सुबह परेड, तो शाम को राष्ट्रपति भवन (तब वायसराय का निवास) में एट होम दावत; तीन दिन बाद 17वीं सदी की ब्रिटिश सैन्य परंपरा का बीटिंग रिट्रीट समारोह।
नेहरू ने 26 जनवरी 1950 की परेड में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो को मुख्य अतिथि बनाया था। तानाशाह सुकर्णो उनके मित्र बने। इंडोनेशिया के बांडुंग में निर्गुट देशों के समूह की शुरुआत हुई। नेहरू, सुकर्णो, नासर की तिकड़ी ने विश्व-शांति के कबूतर उड़ा कर विश्व-नेता का अपना लेबल बनाया—वैसे ही जैसे बारह वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी ने बनाए हैं। नेहरू का भी जादू था, मोदी का भी है। तभी मेरा मानना है कि भारत के समकालीन इतिहास में अंग्रेज़ और नेहरू की विरासत ही टिकाऊ, स्थायी है। हर प्रधानमंत्री उनका अनुगामी है। सो, आज जब आप परेड देखें, तो ज़रूर सोचें—इसमें कहां गणतंत्र की प्रजा है, कहां संघ परिवार, हिंदू आइडिया ऑफ इंडिया व नरेंद्र मोदी हैं? और क्या सब कुछ अंग्रेज़-नेहरू की कदमताल में नहीं है?


