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नरेंद्र मोदी और गोबर भारत!

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यों गाय, गोबर और गोमूत्र अपनी पहचान है। पांच हजार वर्ष पहले गाय की उपादेयता में पूर्वजों ने जो माना था वह अब कलियुगी रूप में है। गोबर में लक्ष्मी का वास और गोमूत्र में माता गंगा। इसलिए गोबर भारत, गोबर पट्टी, गोबर संस्कृति जैसे जुमलों पर हम-आपको नाक-भौं नहीं सिकोड़नी चाहिए। हम वैसे हैं तो हैं, यह स्वीकारना चाहिए। फिर पिछले दस वर्षों में नरेंद्र मोदी ने भारत का जो गोबरीकरण किया है वह भला विश्वगुरूता से कम है? और यह नोट करें कि चार जून को चाहे जो नतीजा आए, कोई प्रधानमंत्री बने, भारत उस गोबर पथ से मुक्त नहीं होगा, जिस पर वह 2014 से चला है।

इसलिए 2014 में अवतरित दो चेहरों नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की देन पर जरा सोचें। दोनों राष्ट्रवादी और भारत माता का जयकारा करते हुए। दोनों ने उम्मीदें पैदा कीं। भक्त बनाए। इनकी एक से बढ़ एक झांकी और लीलाएं। दोनों में तू डाल-डाल, मैं पात-पात की होड़! एक दहला, दूसरा नहला। एक देश का प्रधानमंत्री, दूसरा दिल्ली का मुख्यमंत्री। एक बड़ा झूठ, दूसरा छोटा झूठ। एक राम भक्त, दूसरा हनुमान भक्त। एक घर का बेटा, भाई तो दूसरे का देश ही परिवार! 

कोई न माने इस बात को लेकिन सत्य है कि अन्ना हजारे के आंदोलन से नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल एक-दूसरे के फॉलोवर हैं। दोनों ने हिंदुओं के मूड-मिजाज में एक-दूसरे की नकल कर राजनीति की है। नतीजतन पूरा देश झूठमय। राजनीति से सत्य खत्म। चरित्र खत्म। नैतिकता खत्म। विचार, मूल्य, मर्यादा, प्रतिबद्धता, शिष्टाचार सब खत्म। और सत्यमेव जयते की जगह झूठमेव जयते देश का उद्घोष। राजनीति हर तरह से गोबर-कीचड़ से लथपथ। राजनीति लोगों को उल्लू बनाने, लोगों को बांटने तथा येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाने की तिकड़म की कला में बदली। राजनीति ने अपना धर्म, मूल, मकसद और मूल्यवत्ता गंवा दी। न विचारधारा, न ईमान और न जनकल्याण। 

तभी मेरा मानना है चुनाव में मोदी जीतें या केजरीवाल या राहुल गांधी, भारत वापिस नेहरू से मनमोहन सिंह के समय के सच्चेपन में नहीं लौटेगा। मोदी और केजरीवाल ने भारत को जात-पांत, बांटो-राज करो, रेवड़ीवाद, झूठवाद, पाखंडवाद, निरंकुशवाद के उस अंधेरे कुएं में धकेला है, जिससे भारत को कोई भी बाहर नहीं निकाल सकेगा। राहुल गांधी भी नेहरू की वैज्ञानिक सोच वाली राजनीति नहीं कर सकते हैं। यदि ‘इंडिया’ गठबंधन की सरकार बनी तो राहुल वोट की चिंता में मोदी, केजरीवाल की तरह जिद्दी नेता जैसा टकाटक, खटाखट राजनीतिक व्यवहार करेंगे। संभव ही नहीं जो सत्ता में आने के बाद कांग्रेस में विचार-विमर्श की सामूहिकता में फैसला हो। आगा-पीछा सोचा जाए। राष्ट्र की राजनीति हो न कि जात और वोटों की। 

तभी मोदी और केजरीवाल का राजनीतिक-सत्ता मॉडल अब गोबर भारत का राष्ट्रमार्ग है। अखिलेश, तेजस्वी, ममता, जगन मोहन, स्टालिन आदि तमाम नेता और पार्टियां मोदी-केजरीवाल के पदचिन्हों पर चले हैं, चलेंगे। सबकी मजबूरी है जो वे जात-पात, फूट डालो-वोट पाओ, झूठ बोलो, रेवड़ियां बांटों से राजनीति साधे। सच्चाई और आदर्शों, विचारों, बड़े दिमाग, बड़ी बुद्धि, संघर्ष और जन जागरण की राजनीति कोई भला क्यों करेगा जब झूठ से, राशन-पानी बांटने से, सस्ते में सत्ता मिल जाए! 

दुनिया के किसी चुनाव में मैंने यह नहीं सुना कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री लोगों से यह कह कर वोट मांगे कि मेरी गारंटी पांच किलो फ्री अनाज। निश्चित ही इससे यह भी जाहिर है कि भारत में वोट सस्ते और गंवार हैं। बहकावे, झूठ में प्रभावित हो वोट डालते हैं। मोदी-केजरीवाल के राजनीतिक मॉडल का ही परिणाम है जो मोदी का चार सौ पार का नारा उलटा पड़ा। और विपक्ष ने लोगों को बहका दिया कि इन्हें चार सौ सीटे संविधान बदलने, आरक्षण खत्म करने के लिए चाहिए। इसलिए सोचें झूठ से या एक सिलेंडर, पांच किलो अनाज, छह हजार रुपए की नकदी के साथ जात आधारित जनगणना, आरक्षण और जात-पात के भावनात्मक फॉर्मूले की चिंगारी में 97 करोड़ मतदाताओं का भेड़-बकरियों की तरह इधर से उधर होना कैसी राजनीति है? 

जाति, आरक्षण और गरीब को राशन की हकीकत नेहरू के समय थी तो मनमोहन सिंह के समय भी थी। वीपी सिंह, लालू यादव, नीतीश कुमार ने मंडल आरक्षण, सामाजिक न्याय के नाम पर खूब राजनीति की लेकिन लोगों की बुद्धि का हरण करके, अपने आपको गोबर पट्टी में अवतार स्थापित करने जैसा सियासी विज्ञान पहले कभी नहीं आजमाया गया। 2014 से मोदी-केजरीवाल ने भारत की राजनीति को खालिस व्यक्तिवादी बना दिया है। दोनों अपनी उंगली पर राजनीति का सुदर्शन चक्र घूमाते हैं। दोनों स्वयंभू सवर्ज्ञ हैं। उनकी देखादेखी बाकी पार्टियों ने, पूरे लोकतंत्र ने मान लिया है कि अंधों-अंधविश्वासियों के बीच सत्ता व्यक्ति विशेष की ब्रांडिंग-मार्केटिंग से ही संभव है। संसदीय लोकतंत्र में प्रतिनिधियों, पार्टियों का प्रतिनिधित्व फिजूल है असल बात गड़ेरिए का करिश्मा है। 

मनमोहन सिंह के वक्त ऐसा नहीं था। न वाजपेयी व नेहरू के समय था। नेहरू-पटेल की पीढ़ी ने भारत की विविधताओं, जात-धर्म से लेकर क्षेत्र-भाषा-वर्ग आदि की तमाम विभिन्नताओं के मद्देनजर संसदीय लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था को इसलिए अपनाया था क्योंकि सत्ता और व्यवस्था में प्रतिनिधित्व, भागीदारी के बिना विभिन्नताओं में एकता लंबे समय तक संभव नहीं हैं। उस सोच को अब अनावश्यक माना जा रहा है। इसी के चलते व्यवस्था भी गोबर हो गई है।

वह वापिस बादशाह और कोतवाल के मुगल काल में लौट गई है। तभी कल्पना करें यदि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनें तो उनका व्यवहार मोदी-केजरीवाल की विरासत की अनुपालना में होगा या पंडित नेहरू की विरासत अनुसार? मेरा मानना है नरेंद्र मोदी ने नेतृत्व तथा राजनीति का वह गोबरीकरण किया है कि प्रधानमंत्री कोई बने, सब मोदी की तरह काम करेंगे। वह भी दिन-रात चुनाव, वोट की चिंता करते हुए होगा। वह सब करेगा जो मोदी के ठसके वाले दस साला राज में हुआ है!

इसलिए गोबर राजनीति अब स्थायी है। राहुल गांधी-तेजस्वी-अखिलेश जीते तो गोबर पट्टी की मजबूरी में वे जातीय जनगणना कराएंगे ही। दुनिया को तब मालूम होगा कि हिंदुओं की जातियों में कितनी तरह के जीव-जंतु हैं। कितनी भेड़ें, कितनी बकरियां, कितने भेड़िए, कितने हाथी, कितनी चींटियां, कितने मगरमच्छ, कितने सुअर, कितनी गायें, कितने चतुर कौवे, कितने बंदर, लोमड़ियां याकि मनुष्य जीव की अलग-अलग ताकत-प्रकृति को जांचने की वह जनगणना जिस पर फिर एनिमल फार्म के अधिपति सुअर फैसला लेंगे कि किसको किस हैसियत में कितनी रेवड़ियां, आरक्षण और अवसर बांटने हैं। 

सो, मोदी राज के दस वर्षों के परिणामों में भारत में नए सिरे से मनुष्यों का जीव-जंतुओं जैसे वर्गीकरण होगा। भारतीय पशु फार्म में जंतुओं की पहचान, हैसियत अनुसार आईडेंटिफिकेशन होगा। फिर फ्री में चारे-पानी-नौकरी से उनके सशक्तिकरण का शासन बनेगा। बदले में जातियां अपने फार्म के रखवालों, गड़ेरियों, मालिकों, शक्तिशालियों को वोट दे कर उन्हें भी वही करने की छूट देंगी जो नरेंद्र मोदी ने दस वर्षों में पाई है। मतलब देश को अंबानी, अडानियों, चीनी व्यापारियों का गिरवी होने देना और दुनिया में भारत को नाकाबिल-गोबर-फिसड्डी भारत साबित होने देना। चीन जैसे देशों का भारत बाजार में प्रभुत्व होने देना।

मैं दस साल बाद हाल में मुंबई गया। पहली नजर मुझे समझ नहीं आया कि मैं सिंगापुर में हूं या गोबर भरे तबेले में! महानगर सीमेंट-स्टील-क्रंकीट के निर्माणों से मानों नया। लगा मोदी के राज में विकास तो है। मेरे वहां रहते (मैं मुंबई में रहा हूं) बांद्रा-कुर्ला का जो दलदली इलाका था वह अब सिंगापुर जैसी भव्य इमारतें लिए हुए है। फ्लाईओवर, नई बिल्डिंगों से ले कर लंबे अटल सेतु से आंखें चमत्कृत हुईं। लेकिन कंक्रीट का हर विकास झुग्गी-झोपड़, मछली बाजार और तबेलों की बदबू तथा बड़ा-पाव खाते लोगों की अथाह भीड़ लिए हुए भी। अटल सेतु से उतर गाड़ी ज्योंहि वडाला पहुंची तो वही मुबंई जो 40 साल पहले थी।

तभी क्रंक्रीट के विकास और आम आदमी की असलियत बूझनी हो तो मुंबई घूमने लायक है। भव्य एयरपोर्ट अभी भी विशाल धारावी झुग्गी बस्ती के बीच में तो दक्षिण मुंबई ज्यादा सड़ा हुआ। सोचें, सी लिंक, अटल सेतु बना और अब समुद्री हाईवे बन रहा है लेकिन धारावी का पुनर्वास अभी तक नहीं। क्यों? इसलिए क्योंकि सरकारों की अब प्राथमिकता है कि 140 करोड़ लोगों की भीड़ को चीन (दुनिया) का बाजार बनाने, उनके बिचौलिये व्यापारियों अंबानी-अडानी की जरूरत की वित्तीय राजधानी व इंफ्रास्ट्रक्चर को पहले भव्यता से बनाए। मुंबई को झुग्गी-झोपड़ियों से मुक्त बनाने की धुन, संकल्प इसलिए नहीं है क्योंकि इस आबादी का पेट तो फ्री के राशन, आरक्षण, बैकअप नौकरियों से चल ही रहा है तब क्यों इनके लिए (मानव संसाधन) क्यों कैपिटल इनवेस्टमेंट हो। 

हां, मोदी-केजरीवाल की व्यक्तिवादी सत्ताखोर राजनीति से शासन-प्रशासन और शासकीय रीति-नीति में, दिल्ली के नेताओं, एलिट-भद्रजनों की सोच में यह बेसिक फर्क बना है कि बड़ी बातें, बड़े प्रोजेक्ट (मोदी के असंख्य जुमले) कंक्रीट की विशाल इमारतें, हाईवे आदि बना कर उनकी झांकी से लोगों को चमत्कृत करे रहों। ऐसा गोबर पट्टी में मायावती ने किया तो अखिलेश और योगी आदित्यनाथ ने भी किया। कोई हिसाब लगाए तो नरेंद्र मोदी और मायावती की बनवाई मूर्तियों, स्मारकों के खर्च का आंकड़ा अरबों रुपए का बनेगा। भारत की प्राथमिकता में अब 140 करोड़ लोगों को काबिल बनाना, अच्छी-सस्ती शिक्षा देना और अच्छा-सस्ता इलाज उपलब्ध कराना नहीं है और न ही लोगों में आर्थिक, सामाजिक समानता बनवाना है, बल्कि इन सबसे आंख मूंद सब कुछ असमान, महंगा और घटिया बनने देना है।

पूरी राजनीति, हर नेता, हर अफसर और व्यवस्था इस धुन में है कि आम लोगों को कैसे उल्लू बनाएं। एक हाथ से फ्री राशन, सिलेंडर, छह हजार रुपए बांटेंगें तो दूसरे हाथ से जीएसटी के जरिए लूटने का सॉलिड प्रंबंध। वही विकास के हवाले सभी तरह की सेवाओं, दुकानों के सप्लाईकर्ता क्रोनी पूंजीवादियों को अपने ग्राहकों को लूटने की बेधड़क छूट (कहीं कोई जवाबदेही नहीं) इस डिजिटल सिस्टम के साथ है कि उसकी लूट के अनुपात में जीएसटी के जरिए सरकार का भी हिस्सा फटाफट जमा होता जाए।

हां, किसी को यह हिसाब लगाना चाहिए कि पिछले दस वर्षों में पेट्रोल-डीजल, बिजली, पानी, सड़क, मोबाइल से लेकर शिक्षा, चिकित्सा व खाने-पीने की आटे-दाल, बीज-खाद जैसी बेसिक चीजों पर मोदी सरकार ने कितने खरब रुपए जीएसटी के जरिए लोगों से वसूले और बदले में फ्री राशन, सब्सिडी व आयुष्मान कार्ड जैसी रेवड़ियों पर कितना पैसा खर्च हुआ? दिन-रात का अंतर मिलेगा! ऐसा सब इसलिए हुआ क्योंकि दस वर्षों में जनता की बुद्धि हरण करने का बाकायदा एक सिस्टम और नैरेटिव बना है। मोदी (केजरीवाल भी) की राजनीति का एकमेव उद्देश्य लोगों की बुद्धि के हरण की है। लोगों की सोचने-समझने-अनुभव करने व प्रतिरोध की बुद्धि का हर तरह से हरण। रेवड़ियों से लोगों को बहकाया गया तो उन्हें जात-पात के बाड़ों में बांधा और गुंथा गया। 

तभी गोबर भारत में आज गरीब नौजवान की शिक्षा गोबर है। पूरी आबादी सही सूचनाओं से महरूम। कथित पढ़े-लिखों को भी अहसास नहीं है कि भारत पूरी तरह चाइनीज आर्थिक साम्राज्य का अब गुलाम है। दस वर्षों में कुछ सौ अरबपति-खरबपतियों की बनी मोनोपोली ने देश के थोक-परचून व्यापार से लेकर सूचना तंत्र, सप्लाई चेन, शिक्षा-चिकित्सा, ईंधन-बिजली, परिवहन को इतना महंगा बना डाला है कि अगले कई दशकों न जिंदगी आसान हो सकेगी और न आर्थिक असमानता का बढ़ना रूकेगा।

इसलिए यह भी नोट रखें कि 140 करोड़ लोगों की भीड़ में कोई कितना ही आरक्षण पा जाए, आरक्षित कोटे से कितने ही सेक्रेटरी बन जाएं, इन सबकी आरक्षित बुद्धि अनिवार्यतः अंबानी-अडानी की चांदी की जूतियों के नीचे होगी। किसी का भी रियल सशक्तिकरण नहीं होना है। इसलिए भी क्योंकि बिना काबलियत, बुद्धि के कोई कैसे सशक्त हो सकता है? कोई भी सरकार बने, कोई भी प्रधानमंत्री बने झूठ, रेवड़ियों, झुनझुनों, जात-पात और आरक्षण की राजनीति का गोबर भारत कतई रियल शक्ति, सच में शिक्षित और संपन्न नहीं होने वाला।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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