समय विरोध और असंतोष का है। दिल्ली और मुंबई में बेचैनी है तो यूरोप भी असंतोष की शरद ऋतु से गुजर रहा है। पेरिस में गुस्सा सुलग रहा है। जर्मनी के हैम्बर्ग में बैरिकेड जल रहे हैं। मिलान और ट्यूरिन में प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़पें हैं। अल्बानिया और बेलग्रेड से लेकर केन्या और तुर्की तक युवा सड़कों पर हैं। दक्षिण एशिया में तो जनता के गुस्से ने सरकारें तक गिराई हैं। देश अलग हैं। समस्याएं अलग हैं। मगर सब जगह एक जैसी बेचैनी है। जिस पीढ़ी को अपने माता-पिता से बेहतर जीवन मिलने की उम्मीद थी, वह अब उन्हीं सत्ताधारियों से जवाब मांग रही है जिन्होंने उसे अच्छे दिनों के सपने दिखाए थे।
सत्ता की प्रतिक्रिया में कुछ नया नहीं है। सरकारें अव्यवस्था की निंदा करती हैं। टेलीविजन स्टूडियो साजिशें खोजते हैं। और हमेशा की तरह विदेशी हाथ भी बता दिया जाता है। खबरों में जलते बैरिकेड हैं। पुलिस से भिड़ते प्रदर्शनकारी हैं। युवाओं को पकड़कर पुलिस वैन में ठूंसने के दृश्य हैं। मगर यह जानने की फिक्र किसे है कि आखिर ये युवा सड़कों पर उतरे क्यों हैं? उनका गुस्सा किस बात पर है? वे किससे और क्या मांग रहे हैं?
विचित्र विरोधाभास है। वर्षों तक युवाओं को राजनीति से उदासीन बताया गया। कहा गया कि वे मोबाइल की स्क्रीन में खोए हैं। घोषणापत्रों से अधिक मीमों में उनकी दिलचस्पी है। लेकिन अब जब उसी पीढ़ी ने स्क्रीन का इस्तेमाल संगठित होने, सवाल पूछने और सत्ता को चुनौती देने के लिए शुरू किया है तो उसकी राजनीतिक जागरूकता ही चिंता का कारण बन गई है। युवा राजनीति से दूर रहें तो शिकायत और राजनीति में उतरें तो साजिश!
दरअसल, जवाब उन वादों में है जिन्हें सुनते हुए यह पीढ़ी बड़ी हुई। पढ़ाई से अवसर मिलेंगे। आर्थिक विकास से समृद्धि आएगी। तकनीक जीवन आसान बनाएगी। जेन ज़ी को विश्वास दिलाया गया कि उसका भविष्य पिछली पीढ़ी से बेहतर होगा। सरकारों ने उसकी आकांक्षाओं का उत्सव मनाया। कंपनियों ने उसमें विशाल बाजार खोजा और राजनेताओं ने उसकी भाषा बोलना सीख लिया।
मगर बड़े होने पर युवाओं ने क्या पाया? शिक्षा महंगी है, नौकरी अनिश्चित है। घर खरीदना मुश्किल है। करियर का भरोसा नहीं और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उन पेशों का भविष्य भी बदल रहा है जिनके लिए उन्होंने वर्षों पढ़ाई की। अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। शेयर बाजार रिकॉर्ड बना रहे हैं। लेकिन देश की समृद्धि और नौजवान की अपनी आर्थिक सुरक्षा के बीच फासला क्यों बढ़ रहा है?
इसमें तकनीक ने एक नई विडंबना पैदा की है। अमीरी, ऐश्वर्य और अच्छे जीवन की तस्वीरें हर समय मोबाइल पर हैं। सब कुछ दिखाई देता है, लेकिन सबकी पहुंच में नहीं है। शायद इसीलिए वह पीढ़ी भी पुराने समय का आकर्षण पाल रही है जिसने वह समय देखा ही नहीं। विनाइल रिकॉर्ड, फिल्म वाले कैमरे, हाथ से लिखे पत्र, धीमी रफ्तार की जिंदगी! इसे फैशन कह सकते हैं। मगर सोचें, जो युवा अतीत में कभी रहे ही नहीं, वे उसमें सुकून क्यों खोज रहे हैं? क्या इसलिए कि भविष्य उन्हें भरोसेमंद नहीं लगता?
और असंतोष केवल आर्थिक नहीं है। राजनीति से भी मोहभंग है। केन्या में करों के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन सत्ता के विशेषाधिकारों और जवाबदेही के सवाल तक पहुंचा। तुर्की में विपक्ष पर कार्रवाई के विरोध में छात्र सड़कों पर आए। नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध ने भ्रष्टाचार और राजनीतिक परिवारों के विशेषाधिकारों के खिलाफ जमा गुस्से को भड़का दिया। यूरोप में भी अलोकप्रिय नीतियों और राजनीतिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ विरोध है। हर जगह तात्कालिक कारण अलग है, लेकिन सवाल उससे बड़ा है। आखिर सत्ता किसके लिए है और किसके प्रति जवाबदेह है?
भारत में यह विरोधाभास और दिलचस्प है। एक दशक से युवाओं को बताया गया कि भारत महान बनने की दहलीज पर है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, युवा आबादी का लाभ और विकसित भारत! बड़े सपने देखो। उद्यमी बनो। दुनिया से मुकाबला करो। मगर इन्हीं सपनों के बीच रोजगार की अनिश्चितता, महंगी शिक्षा, परीक्षाओं के विवाद और अवसरों के लिए निर्मम प्रतिस्पर्धा भी है। सवाल यह नहीं कि देश ने प्रगति नहीं की। सवाल है कि देश की उपलब्धियों का युवाओं के अपने जीवन से कितना मेल है? देश अमीर हो रहा हो, लेकिन उसका नौजवान अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित हो तो वह विकास को कैसे समझेगा?
इतिहास में इसकी गूंज है। मई 1968 में पेरिस के छात्रों ने विश्वविद्यालयों की जकड़ी व्यवस्था और चार्ल्स द गॉल की सत्ता को चुनौती दी। मजदूर भी साथ आए। फ्रांस हिल गया। वह विद्रोह केवल आर्थिक शिकायतों का नहीं था। समाज की आकांक्षाएं बदल चुकी थीं, लेकिन सत्ता और संस्थाएं पुराने ढर्रे पर थीं। द गॉल तत्काल संकट से बच गए, मगर उस आंदोलन ने बता दिया कि सत्ताधारी अपनी नई पीढ़ी को कितना कम समझते हैं।
आज का पेरिस 1968 का पेरिस नहीं है। आज के युवाओं के पास वैसी वैचारिक प्रतिबद्धता, संगठन या क्रांति का सपना भी जरूरी नहीं। तब घोषणापत्र, बौद्धिक बहस और छात्र संगठन थे। आज मीम, व्यंग्य और डिजिटल नेटवर्क हैं। एक मजाक नारा बनता है। नारा प्रदर्शन में बदलता है और प्रदर्शन कभी राजनीतिक संकट पैदा कर देता है। राजनीतिक चेतना है, मगर किसी पार्टी के प्रति स्थायी निष्ठा हो, यह जरूरी नहीं।
यहीं स्थापित राजनीतिक दलों की मुश्किल है। वे मानते आए हैं कि मतदाता सरकार से नाराज होगा तो विपक्ष के पास जाएगा। लेकिन ऐसा क्यों हो? युवा सरकार को खारिज कर सकता है, बिना विपक्ष पर भरोसा किए। किसी नीति का विरोध कर सकता है, बिना किसी विचारधारा का समर्थक बने। सड़क पर उतर सकता है, बिना किसी पार्टी का झंडा उठाए। राजनीति में दिलचस्पी और राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठा दो अलग बातें हैं।
सरकारें विपक्षी पार्टियों से लड़ना जानती हैं। नेताओं पर हमले, आरोप-प्रत्यारोप, चुनावी मुकाबले, सब आजमाए हुए तरीके हैं। मगर उस गुस्से का क्या करें जो किसी पार्टी ने पैदा नहीं किया? जिसे किसी नेता के बयान से शांत नहीं किया जा सकता? उधर विपक्ष भी यह मानकर नहीं चल सकता कि सरकार के खिलाफ हर प्रदर्शन उसके समर्थन में है। संभव है कि युवा सत्ता और विपक्ष, दोनों से एक साथ सवाल कर रहे हों।
दक्षिण एशिया ने इस गुस्से की ताकत दिखाई है। श्रीलंका में 2022 के आर्थिक संकट के दौरान प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति आवास तक पहुंच गए। बांग्लादेश में 2024 के छात्र आंदोलन ने शेख हसीना के लंबे शासन का अंत किया। नेपाल में 2025 के युवा विद्रोह के बीच केपी शर्मा ओली को पद छोड़ना पड़ा। मगर सरकार गिराना और बेहतर व्यवस्था बनाना एक बात नहीं है। अरब स्प्रिंग याद करें। मिस्र में मुबारक गए, मगर लोकतंत्र स्थायी नहीं हुआ। लीबिया संघर्ष में फंस गया और सीरिया विनाशकारी गृहयुद्ध में। जनविद्रोह परिवर्तन की शुरुआत हो सकता है, उसकी सफलता की गारंटी नहीं।
लेकिन इन आंदोलनों में एक फर्क समझना जरूरी है। एक पीढ़ी वह होती है जो नई दुनिया बनाने का सपना लेकर विद्रोह करती है। दूसरी वह जो पूछती है कि जिस दुनिया का वादा किया गया था, वह बनी क्यों नहीं? पहली के पास कोई विचार, आदर्श या मंजिल होती है। दूसरी के पास टूटे भरोसे का अनुभव है। वह पुराने जवाब मानने को तैयार नहीं, मगर जरूरी नहीं कि उसके पास नए जवाब हों।
आज के युवा असंतोष में यही सवाल प्रमुख है। नौजवानों को केवल सरकार बदलने से क्या मिलेगा? रोजगार, शिक्षा, आवास और भविष्य की सुरक्षा के सवाल क्या सत्ता परिवर्तन से हल हो जाएंगे? और यदि विपक्ष भी उन्हीं पुराने राजनीतिक तौर-तरीकों में उलझा है तो उस पर भरोसा क्यों किया जाए?
इसलिए पेरिस, नैरोबी, काठमांडू और दिल्ली को एक ही राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा मानना गलत होगा। हर देश की परिस्थितियां अलग हैं। हर प्रदर्शन क्रांति का संकेत नहीं है। मगर सबको युवाओं की अधीरता या सोशल मीडिया का क्षणिक उबाल बताकर खारिज करना भी ठीक नहीं।
सरकारों ने युवाओं तक पहुंचने के तमाम तरीके सीख लिए हैं। वे उनकी स्क्रीन पर हैं। उनकी भाषा बोलती हैं। उनके लिए वीडियो, रील और मीम बनवाती हैं। उनकी पसंद-नापसंद का अध्ययन करती हैं। चुनावी प्रचार को डिजिटल मनोरंजन में बदल देती हैं। मगर क्या वे युवाओं के सवाल सुनने को भी उतनी ही तैयार हैं?
असल मुश्किल यही है। सत्ताधारी जानते हैं कि नौजवानों का ध्यान कैसे खींचना है, लेकिन जब नौजवान जवाब मांगने लगें तो क्या कहना है? उन्हें राष्ट्र की उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं, भविष्य के सपने दिखाए जा सकते हैं, विरोधियों की नीयत पर सवाल उठाए जा सकते हैं। मगर नौजवान का अपना सवाल तो फिर भी बना रहता है। पढ़ाई की, मेहनत की, सपने देखे, अब आगे क्या?
और शायद राजनीति के लिए सबसे बड़ा सवाल भी यही है। जिस पीढ़ी को राजनीति से उदासीन समझा गया, वह अब राजनीति से जवाब मांग रही है। लेकिन सत्ता और विपक्ष, दोनों के सामने चुनौती है कि क्या वे उसे अपने पुराने वादों से अलग कुछ ठोस दे सकते हैं?
आखिर युवा राजनीति से भाग नहीं रहे। वे उस राजनीति पर भरोसा खो रहे हैं जो उनके भविष्य की बातें तो बहुत करती है, मगर उनके वर्तमान का जवाब नहीं देती।
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