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जंतर-मंतरः आग अभी बुझी नहीं है

ग्राउंड रिपोर्ट

नई दिल्ली। लुटियन दिल्ली को सोमवार को जिस छात्र आंदोलन ने झकझोरा था, उसकी आग अब भी बुझी नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इस आंदोलन को सबसे अधिक ऊर्जा जेनरेशन-ज़ेड का रचनात्मक हास्य है। गुस्सा है, लेकिन उसके साथ व्यंग्य है, मीम हैं, तख्तियों पर लिखी चुटीली पंक्तियाँ हैं और व्यवस्था को चुनौती देने का एक नया आत्मविश्वास भी।

राहुल गांधी की हिरासत के एक दिन बाद बुधवार को दिल्ली के संसद इलाके का माहौल तनावपूर्ण था, लेकिन वजह बदल चुकी थी। सरकार के लिए यह घेराबंदी का एक और दिन था। वही छात्रों के लिए आंदोलन का एक और सामान्य दिन—जोश, धैर्य और जिद से भरा हुआ।

लुटियंस दिल्ली अब भी एक ऐसे शहर की तस्वीर है, जो किसी बड़े टकराव की आशंका में खुद को किले में बदला हुआ है। प्रधानमंत्री आवास से संसद की ओर जाने वाली सड़कें बैरिकेडिंग की कई परतों के पीछे गुम थीं। पश्चिम बंगाल और कश्मीर से भी अतिरिक्त सुरक्षा बल बुलाए गए है। राजधानी की परिचित हरियाली पर मानों नीले और खाकी रंग का कब्ज़ा। दिल्ली पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स, सीआरपीएफ, दंगा-रोधी वाहन, अश्रु गैस, धुआँ छोड़ने वाले लॉन्चर और लाठियाँ थामे जवान हर चौराहे पर मौजूद। मानो पूरा सत्ता क्षेत्र एक ही संदेश दे रहा हो—राज्य किसी भी स्थिति के लिए तैयार है। सुबह से खान मार्केट, जोर बाग और इंद्रप्रस्थ सहित सोलह मेट्रो स्टेशन बंद थे।

लेकिन इन सबका छात्रों पर कोई खास असर नहीं दिखाई दिया। वे लगातार बसों, मेट्रो के खुले स्टेशनों और ऑटो से जंतर-मंतर पहुँचते रहे।

आज जब मैं आंदोलन के केंद्र जंतर-मंतर पहुँची तो मंच पर अभिजीत दिपके मौजूद थे। उनके आसपास मीडिया का घना घेरा था। उसी घेरे में समर्थन देने आने वाले राजनीतिक नेताओं की आवाजाही भी लगी हुई थी। लेकिन असली आंदोलन उस घेरे के बाहर था। उमस से भरे आसमान के नीचे सैकड़ों छात्र ज़मीन पर पालथी मारकर बैठे थे। कोई नारे लगा रहा था, कोई गीत गा रहा था, कोई हाथ से बने पोस्टर लहरा रहा था और कोई अपने साथियों का हौसला बढ़ा रहा था।

आज मेरी मुलाकात कई ऐसे छात्रों से हुई जो पहली बार किसी प्रदर्शन में शामिल हुए थे।

इंदौर से आए तीन युवक पूरी रात यात्रा करके बुधवार तड़के दिल्ली पहुँचे थे। उन्हें किसी संगठन ने नहीं बुलाया था। वे सोशल मीडिया पर आंदोलन के वीडियो देखकर यहाँ आए थे।

“हम इसलिए आए क्योंकि लगा कि दूसरे छात्रों के साथ खड़ा होना चाहिए,” उनमें से एक ने मुझसे कहा। “सिर्फ एकजुटता दिखाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि व्यवस्था को कोई तो ठीक करने की कोशिश करे।”

फिर उसने एक ऐसी बात कही जिसने शायद पूरे आंदोलन का सबसे सटीक अर्थ सामने रख दिया।

जब मैंने पूछा कि पेपर लीक तो वर्षों से होते आए हैं, फिर यह आंदोलन अलग क्यों है, तो उसने बिना एक पल रुके कहा, “पिछली पीढ़ी ने इसे स्वीकार कर लिया था। उन्हें कभी लगा ही नहीं कि गलत को गलत कहकर बदला भी जा सकता है। अगर उन्होंने तब सवाल पूछे होते, तो शायद आज हमें यहाँ खड़ा नहीं होना पड़ता।”

उसके इतना कहते ही आसपास बैठे छात्रों ने तालियाँ बजानी शुरू कर दीं।

उस एक संवाद ने वह बात समझा दी जिसे आँकड़े कभी नहीं समझा सकते। इस आंदोलन की ताकत सिर्फ इसकी संख्या में नहीं, बल्कि उस स्पष्टता में है जिसके साथ नई पीढ़ी अपने गुस्से को शब्द देती हुई है।

अगर सोमवार ने इस आंदोलन के जन्म की घोषणा की थी, तो बुधवार ने साबित कर दिया कि उसमें टिके रहने की क्षमता भी है।

बुधवार तक आते-आते यह आंदोलन अपना अलग जीवन जीने लगा है। यह अब सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा समुदाय बन चुका है जहाँ असहमति केवल नारों से नहीं, व्यंग्य और हास्य से भी व्यक्त हो रही है। भीड़ में हँसी उतनी ही सहजता से फैल रही थी जितनी नारेबाज़ी। अनजान लोग एक-दूसरे का ख़याल रख रहे थे। और सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि लगभग पूरा प्रबंधन स्वयं छात्रों के हाथ में था।

दस-दस, बारह-बारह छात्रों के छोटे समूह बारिश से भीगी सड़कों पर अपनी जगह बनाए बैठे थे। कोई रातभर सफर करके आया था और योगा मैट पर थोड़ी देर के लिए सो गया था। कोई किताब पढ़ रहा था। कहीं आंदोलन के गीत गूँज रहे थे। कहीं संविधान पर बहस चल रही थी। कहीं कोई अचानक खड़ा होकर भाषण देने लगा था। और कहीं अनजान लोग एक-दूसरे के साथ बिस्कुट और पानी बाँट रहे थे। नारों के बीच-बीच में ठहाके लगातार सुनाई देते रहे।

सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात उनका अनुशासन था। स्वयंसेवकों ने मानव श्रृंखलाएँ बनाकर आने-जाने के रास्ते खुले रखे। कुछ लोग पानी बाँट रहे थे। कुछ नए आने वालों को छाँव की ओर भेज रहे थे। कुछ थके हुए प्रदर्शनकारियों को गत्ते के टुकड़ों से हवा कर रहे थे, क्योंकि दिल्ली की उमस किसी की परीक्षा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। मेरे लिए ऐसे दिन में घूमना, रिपोर्टिंग करना खुद बेहद थका देने वाला अनुभव था। लेकिन छात्रों ने मानो तय कर लिया है कि न मौसम और न थकान—उनके रास्ते की कुछ भी नई बाधा नहीं बनेगा।

उनके पोस्टरों में जेनरेशन-ज़ेड की अपनी राजनीतिक भाषा साफ दिखाई देती है—तीखी, चतुर, आत्मसजग और बेधड़क व्यंग्यात्मक। मीम अब कार्डबोर्ड पर है। संविधान के उद्धरणों के साथ व्यंग्य, तीखा कटाक्ष  सहजता से खड़ा मिला। यहाँ हास्य राजनीति से बचने का माध्यम नहीं था; वही राजनीति की सबसे प्रभावी भाषा बन चुका था।

मेरी मुलाकात आईपी विश्वविद्यालय के कानून के छात्रों से हुई, इग्नू के बीस वर्षीय छात्र से हुई, इंजीनियरिंग स्नातकों से हुई, एमबीए की तैयारी कर रहे युवाओं से हुई और ऐसे अनेक छात्रों से हुई जो पहली बार किसी आंदोलन में आए थे। वे सिर्फ इसलिए रातभर यात्रा करके दिल्ली पहुँचे क्योंकि उन्होंने अपने मोबाइल फ़ोन पर इस आंदोलन को देखा और उन्हें लगा कि उन्हें भी इसका हिस्सा बनना चाहिए।

यह आंदोलन अब किसी एक संगठन या परिसर तक सीमित नहीं रहा। यह पूरी एक पीढ़ी को अपनी ओर खींच रहा है।

शाम ढलते-ढलते जंतर-मंतर किसी पारंपरिक धरना स्थल से अधिक एक आत्मनिर्भर छात्र गणराज्य जैसा दिखाई देने लगा। बैरिकेड वहीं थे। सुरक्षा बल भी वहीं थे। लेकिन छात्र भी वहीं थे। उनकी पोस्टर और पंचलाइन की राजनीति लगातार जारी। ह्यूमर, सटायर, कटाक्ष और क्रिएटिव रेज़िस्टेंस की राजनीति के लगातार नए-नए अनुभव। सोमवार को सत्ता की लुटियन दिल्ली ने उनका गुस्सा देखा। बुधवार को वह धैर्यपूर्ण तैयारी, संगठन क्षमता और यह विश्वास लिए हुए थी कि लंबी लड़ाइयाँ केवल नारों से नहीं, बल्कि लगातार टिके रहने से जीती जाती हैं।

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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