nayaindia Rajasthan assembly election 2023 भीड़ न राजकुमारी (दीया) के लिए और न पीएम (मोदी) के लिए!
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भीड़ न राजकुमारी (दीया) के लिए और न पीएम (मोदी) के लिए!

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जयपुर। दीया कुमारी का चुनाव प्रचार अल सुबह शुरू हो जाता है। वे सुबह 7 बजे अपने महल से रवाना हो जाती हैं।वे एक वोल्वो कार में चलती हैं और उनके काफिले में दो और कारें रहती हैं। राजकुमारी चाहती हैं कि लोग उन्हें अपना मानें, अपनी बेटी की तरह देखें।मंगलवार को वे सुबह 8 बजे हरमदा की करणी कालोनी पहुंचती हैं और एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करती हैं। वहां उन्हें देखने, सुनने और उनसे मिलने के लिए जो थोड़े से लोग इकठ्ठा हैं उनमें कुछ युवा हैं और कुछ वृद्ध। लेकिन जनसमूह के छोटा होने से दीया कुमारी जरा भी विचलित नहीं होतीं।उनके वस्त्र हल्के पीले रंग के हैं, लेकिन राजसी लगते हैं।उन्हें विद्याधर नगर में ‘बाहरी’माना जाता है और वे लोगों को जोर देकर याद दिलाती हैं कि वे ‘जयपुर की बेटी’हैं।

राजसमंद से सांसद दीया कुमारी को राजस्थान विधानसभा चुनाव की घोषणा  के कुछ ही समय बाद जारी की गई भाजपा की पहली सूची में विद्याधर विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया गया था। उसके बाद से वे लगातार रैलियों, जनसभाओं और नुक्कड़ बैठकों के जरिए क्षेत्र के 2.75 लाख मतदाताओं तक पहुंचने के अभियान में लगी हुई हैं। यह सीट भाजपा का गढ़ है, जिसका प्रतिनिधित्व पांच बार के विधायक और वसुंधराराजे सिंधिया के करीबि माने जाने वाले, भैरोसिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी करते आए हैं। लेकिन इस बार उन्हे पहले टिकट नहीं दिया। उन्होने जब तेंवर दिखाए तो पार्टी ने उन्हें चित्तौड़गढ़ से उम्मीवार बनाया।सवाल है उनकी लम्बी विरासत से पार पाना राजकुमारी के लिए क्या आसान है?

21 नवंबर की सुबह मैं दीया कुमारी के पीछे-पीछे उन सभी स्थानों पर गई, जहाँ वे पहुँचीं।विद्याधरनगर के ग्रामीण क्षेत्र से प्रारंभ करके दोपहर तक वे विधानसभा क्षेत्र के संपन्न इलाके में पहुंचीं। उन्होंने दो नुक्कड़सभाओं को संबोधित किया।हर वार्ड के मंदिरों के दर्शन किए और विद्याधरनगर की एक आलीशान बस्ती में रोड शो भी किया। मंगलवार को उनका चुनाव अभियान शाम को निर्धारित प्रधानमंत्री मोदी के रोड शो की वजह से जल्दी समाप्त हुआ।जबकि सामान्यतः उनका चुनाव अभियान शाम 6 बजे ख़त्म होता है।

जैसा कि मैंने शुरू में जिक्र किया उन्हें देखने, मिलने और सुनने वालों की संख्या कम ही रहती है। वे राजकुमारी हैं लेकिन अब राजपरिवार के प्रति लोगों का आकर्षण कम हो गया है। मैंने जिन लोगों से बात की उनका मानना है कि विधायक बनने के बाद वे इस क्षेत्र में बहुत कम नजर आएंगीं।“वो महारानी हैं, वो अभी वार्ड नंबर 3 की बस्ती में सिर्फ हमारे वोट के लिए आ रहीं हैं”,यह कहना था महिलाओं के एक समूह का जो राजकुमारी की राजनीति देखने-सुनने आईं थीं।दीया अपने छोटे-छोटे भाषणों में लोगों से वोट ‘डबल इंजन सरकार‘ बनने की संभावना के आधार पर मांगती हैं। वे प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी का नाम लेती हैं जिसे सुनकर जनता तालियां बजाती है।

लोगों में उस उम्मीदवार को देखने की उत्सुकता है जिसने पांच बार के विधायक राजवी की जगह ली है। यद्यपि यह भाजपा के लिए एक सुरक्षित सीट है किंतु दीया कुमारी का चेहरा लोगों को स्वीकार नहीं है। मजे की बात यह है कि नरपत सिंह राजवी ने विद्याधरनगर के माध्यम से सत्ता का मजा तो लिया लेकिन उन्होंने क्षेत्र के विकास या वहां की समस्याएं हल करने में जरा भी रूचि नहीं ली। और यदि एक शब्द में जयपुर की इस विधानसभा सीट की स्थिति बतानी हो तो वह शब्द होगा ‘बहुत खराब’। यहां भी पानी की समस्या हमेशा बनी रहती है, सड़कें गड्ढ़ों से भरी हैं और सीवेज संबंधी दिक्कतें भी हैं। राजवी लोगों से जीवंत संपर्क नहीं रखते थे। यह आश्चर्यजनक है कि इसके बावजूद उन्हें याद किया जा रहा है। यहां तक कि यह माना जा रहा है कि कांग्रेस के सीताराम अग्रवाल राजकुमारी को कड़ी  टक्कर दे रहे हैं।

दीया कुमारी पिछले एक माह में 200 से अधिक सभाओं को संबोधित कर चुकी हैं लेकिन फिर भी वे जीवंत संपर्क नहीं बना पाई हैं।दीया लोगों से मिलती हैं लेकिन उनमें घुलती नहीं हैं। वे बातचीत भी करती हैं मगर उनसे दूरी कायम रखती है। इसमें संदेह नहीं कि वे अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए बहुत मेहनत कर रही हैं लेकिन यदि दीया जीतती हैं, और वे जीतेंगीं, तो इसका बड़ा कारण विद्याधर नगर का भाजपा की एक सुरक्षित सीट होना होगा और दीया कुमारी को इसका श्रेय कम ही होगा। क्योंकि राजवी की विरासत के पार लोगों के दिलो-दिमाग में जगह बनाने के लिए दीया कुमारी को ‘लोगों का विधायक’ बनना होगा। हालांकि उनके मुख्यमंत्री बनने की बातें भी की जा रही हैं। दीया कुमारी का कहना है कि वे केवल पार्टी हाईकमान के आदेश का पालन कर रही हैं और करती रहेंगी।मगर यह तो कहने की बात है। सभी राजनेता महत्वकांक्षी होते हैं।लेकिन दीया कुमारी उनसे कहीं आगे हैं।

फिर शाम के 4.30 बजते-बजते जयपुर,खासकर चारदिवारी वाला गुलाबी शहर एक किले में तब्दील हो जाता है। यातायात पर प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। और जयपुर के पुराने हिस्से में आने-जाने पर पाबंदी है।मगर दीया कुमारी भाजपा के अन्य दस उम्मीदवारों के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वागत के लिए अपना-अपना स्थान ग्रहण किए हुए हैं। सुरक्षा कड़ी है। मीडिया को बैरिकेड के पीछे के बाड़े में ठूंस दिया गया है। मैंने 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कई रोड शो देखे हैं लेकिन मैंने प्रेस को एक छोटे क्षेत्र में बंद किया जाते हुए नहीं देखा।शुरूआत में  तो सभी रोड शो में मीडिया को प्रधानमंत्री के काफिले के साथ चलने की पूरी आजादी होती थी।इसके अलावा पसंदीदा मीडिया कर्मियों के लिए एक अलग मीडिया ट्रक का इंतजाम होता था। प्रेस के बाकी लोगों को सड़क के आसपास की इमारतों की छतों पर खड़े रहने और मोदी की कार के आगे या साथ-साथ चलने दिया जाता था।

लेकिन पुराने जयपुर में प्रेस को एक कौने में खड़ा कर दिया गया।तभी नतीजा यह कि न तो फोटो पत्रकार फोटो ले सके और न टीवी पत्रकार प्रधानमंत्री के शाट ले पाए। अखबार वाले यह देख, समझ नहीं पाए कि लोगों में कितना उत्साह है? और कहां कितने लोग और कैसा उत्साह? मैं जितनी दूर तक देख पाई (मैं और बाकी मीडिया सांगानेरी दरवाजे के क्षेत्र में सीमित थे) मुझे छतों से या खिड़कियों पर लटक कर प्रधानमंत्री की एक झलक देखने की कोशिश करते चंद लोग भी नजर नहीं आए।बाद में टीवी चैनलों पर जो झलकिया दिखी, वे पीएम के सामने चलते अधिकारिक कैमरे के शूट से थी और उनमें केवल किनारे में खडे लोंगों की भीड़! न बाजारों के गलियारों में हुजूम और न चौड़े चौराहों पर वैसा हुजूम जैसा इसी साल बंगलूरू के रोड़ शो में दिखा था।

मुझे नरेंद्र मोदी के कई रोड शो याद है जहां शहर का हर व्यक्ति उमड पडता था। वह अपने नेता की एक झलक देखने की खातिर धक्का-मुक्की सहता था लेकिन गुलाबी शहर जयपुर के रोड शो में वैसा कुछ भी नहीं था। नरेंद्र मोदी के रोड शो में न पत्रकारों को भीड़ देखने दी गई और न वह दिखी। बाद में मैंने पीएम काफिले की दी गई टीवी फीड से कट हुई लोकल चैनलों पर प्रसारित झलकियों को देखा। पर वह जमावड़ा, वह उत्साह नहीं दिखा जिसकों देखने के लिए मैं समय से घंटे भर पहले रोड शो में पहुंची।

जयपुर पिछले चुनाव तक भाजपा का गढ़ था। इस चुनाव में मैंने सोचा था कि जयपुर राजधानी है। भाजपा का पुराना गढ़ है। उसे अधिकांश सीटे जीतनी चाहिए। फिर जिस इलाके में रोड शो है वहां तो हिंदू बनाम मुस्लिम सर्वाधिक है।इलाक़े की  गलियों से अपने आप हिंदुओं को निकल कर रोड शो को हिट बनाना चाहिए था। पर ऐसा कुछ भी नहीं मिला! नरेंद्र मोदी को देखने, उनसे हाथ मिलाने, उन पर फूल बरसाने, उनकी झलक पाने का न कौतुक था और न शो खत्म होने के बाद लौटती भीड का सैलाब मिला। सो नरेंद्र मोदी  के रोड शो में जोशो-खरोश और उत्साह नदारत था।कुछ ही मिनटों मे इलाका तुरत-फुरत खाली हो गया। सो आश्चर्य नहीं होगा  तीन विधानसभा  क्षेत्रों के इस रोड शो में भाजपा के लिए वह नतीजा आए जिसकी रोड शो से उम्मीद है। इसलिए इंतजार रहेगा इस शो के 25 नवंबर को होने वाले मतदान पर प्रभाव का, उसके नतीजों का।  कांग्रेस के दो मुस्लिम विधायक अपनी सीट को पीएम के रोड शो के बावजूद  बचा पाएगें या नहीं?

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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