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श्रुति व्यास

क्या आप खुश है, क्या खुशी देखी?

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ख़ुशी क्या है? वह कैसी होती है?

पहली बात तो यह कि ख़ुशी मेरा, आपका, किसी का भी स्थाई भाव नहीं होती। वह आती है और चली जाती है, मिलती है और छिन जाती है। क्या ऐसा कोई है जो हमेशा खुश रहता हो? मसखरे तक हमेशा खुश नहीं रहते। यदि हम ध्यान से देखें तो उनके मुखौटे के पीछे हमें हमेशा आनंद से चमकती आँखें नजर नहीं आएंगी।

खुशी का आज यह विषय ताजा वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट से है। यह रिपोर्ट हमें बहुत कुछ बताती है और जो वह बताती है वह डरावना है।

दुनियादारी को महत्व देने वाल सर्वेक्षणों में प्रसन्नता को आर्थिक स्थिति से जोड़ा जाता है। ज्यादा पैसा, मतलब ज्यादा खुशी। गरीब देशों की तुलना में धनी देश ज्यादा प्रसन्न रहते हैं।

लेकिन फिर आप मामूली आमदनी वाले उस गरीब व्यक्ति को भी तो जानते हैं जो रूखा-सूखा खाना अपनी पत्नि, बच्चों और माता-पिता के साथ बांटकर खाता है, और खुश रहता है। वहीं, दूसरी ओर हो सकता है आप किसी ऐसे धनिक को भी जानते हों जो विरासत में मिली संपत्ति को लेकर अपने भाई से उलझ रहा है। ऐसे विवादों में घर बंट जाता है, परिवार बंट जाते हैं, ख़ुशी और पैसा दोनों गायब हो जाते है। शायद पैसा सब कुछ नहीं है। लेकिन शायद प्रसन्नता भी सब कुछ नहीं है।

यदि हम रिपोर्टों पर भरोसा करें, सामान्य नैरेटिव को सच मानें, तो मनुष्य का स्वभाव है कि वह जिन हालातों में भी होता है, उन्हीं में खुशियां ढूंढ लेता है, बशर्ते वे हालात बहुत बुरे न हों। फ्रायड के इस अवसाद भरे निष्कर्ष में सच्चाई नहीं है कि प्रसन्नता के लिए जो चाहिए, वह मानव सभ्यता हमें दे ही नहीं सकती। दूसरे शब्दों में आप मानव सभ्यता और ख़ुशी में से किसी एक तो ही चुन सकते हैं।

ख़ुशी आनी-जानी है। वह कभी भी हमें धोखा दे सकती है। वह सभी मनोभावों में से सबसे अधिक अस्थिर मगर सबसे अधिक मोहक है और इसलिए शोधों, चर्चाओं और सर्वेक्षणों में उसका प्रमुख स्थान रहता है – और अब तो पहले से भी कहीं ज्यादा। सोशल मीडिया हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है और एआई रोजगार छीनने का नया औजार बनने की राह पर है। ऐसे में कई सवाल पैदा होते हैं। ख़ुशी क्या है? किस व्यक्ति को हम खुश कह सकते है? वह क्या है जो हमें ख़ुशी देता है? यह एकदम स्पष्ट है कि इंस्टाग्राम या टिकटाक पर जिंदगी कितनी ही हसीन दिखे, ख़ुशी उसमें से गायब है।

इस हफ्ते की शुरूआत में 2024 की वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट जारी हुई। इससे कई ऐसी बातें बताई गईं हैं जो हमें पहले से पता थीं, मगर कई नई बातें भी हमें पता चलीं हैं। पहली बात तो यह कि फिनलैंड दुनिया का सबसे खुश देश बना हुआ है और भारत ख़ुशी के इंडेक्स में 126वें नंबर पर है। मतलब हम खुश तो हैं मगर गम के साथ।

एक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दुनिया का सबसे विकसित और सबसे शक्तिशाली देश अमरीका और उसके संगी-साथी, जिनमें इंग्लैंड और कई यूरोपीय देश शामिल हैं, खुश देशों की लिस्ट में ऊपर के 20 स्थानों में भी नहीं हैं। अमेरिका 23वें नंबर पर है, जर्मनी 25 और इंग्लैंड 20वें नंबर पर। इसका मुख्य कारण यह है  कि वहां के युवा नाखुश हैं। वे नाखुश इसलिए हैं क्योंकि उन्हें सीमित कौशलों के साथ अपनी आजीविका कमाने के लिए छोड़ दिया गया है। उनकी योग्यताएं, जाब मार्केट की अपेक्षाओं से मेल नहीं खातीं।

ऐसा भी बताया जाता है कि सोशल मीडिया लोगों को उनकी ही निगाहों में गिरा रहा है और उन्हें संतुष्टि के भाव से वंचित कर रहा है। इसके अलावा वे सारी समस्याएं तो हैं ही जो मोटे तौर पर जेन-जेड आयु समूह के युवाओं को काफी समय से परेशान कर रही हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार इनमें शामिल हैं पर्याप्त शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण का  अभाव और महंगे आवास। रिपोर्ट के अनुसार युवा अपने हैरान-परेशान माता-पिताओं जैसा ही महसूस करने लगे हैं जो हमेशा थके हुए और जिंदगी की समस्याओं के बोझ तले दबे दिखते आएं हैं।

और मज़ा यह कि इसके बाद भी अभिभावक पूछते हैं कि उनके बच्चे डिप्रेशन में क्यों जा रहे हैं? यह छुपी हुई बात नहीं है कि पहले की तुलना में युवाओं का कहीं बड़ा प्रतिशत अवसाद का शिकार है और मानसिक तनाव उनके शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है। इसका कारण यह है कि युवाओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिख रहा है।

जीवनयापन का खर्च बढ़ता जा रहा है, उन पर बच्चे पैदा करने और उन्हें पालने का दबाव है, सिर पर छत की  जुगाड़ करना मुश्किल होता जा रहा है, बेरोजगारी बढ़ रही है, जिन्हें रोजगार हासिल है उनका वेतन नहीं बढ़ रहा, सरकारें युवाओं की दिक्कतों पर ध्यान नहीं दे रहीं हैं और इसके अलावा कोविड महामारी, क्लाइमेट चेंज के खतरे और युद्ध तो हैंही। ऐसे में खुशी के लिए जगह ही कहां बची है? यह टाईप करते हुए भी मैं भी दुःखी महसूस कर रही हूं और इस बारे में सोचते हुए मेरा ब्लड प्रेशर पक्का बढ़ गया होगा।

परंतु निराशा के अंधेरे ने पूरी दुनिया के सभी लोगों को अपने घेरे में ले रखा है, यह सोचना भी गलत है। युवा अपने आपको नाखुश बता रहे हैं और इस मामले में उनमें और अधेड़ों में कोई अंतर नहीं रह गया है। मगर जो लोग सबसे खुश हैं, संतुष्ट हैं वे हैं 55 साल से ऊपर के लोग।  स्टाक मार्केट आसमान छू रहा है और पूरी दुनिया में जमीनों, मकानों और दुकानों की कीमत बढ़ती ही जा रही है।

नतीजे में 55-पार पीढ़ी के पास इतना धन आ गया है जितना इतिहास में उसके पास कभी नहीं था। दे हेव द मनी, हनी। और ऐसा बताया जाता है कि पैसे से  सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं और सुविधाएं हमें खुशी और सुख देती हैं। भारत में बुजुर्ग अपने जीवन से युवाओं की तुलना में कहीं ज्यादा खुश और संतुष्ट हैं।

युवा भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में परेशान हैं।

भारत को युवाओं का देश माना जाता है और ऐसा बताया जा रहा है कि पूरी दुनिया युवा होती जा रही है। ऐसे में अगर युवा ही नाखुश हैं तो हमें यह मानने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि वर्ल्ड हेप्पीनेस रिपोर्ट सचमुच चिंताजनक है। अगर युवाओं को ठीक-ठाक काम नहीं मिलेगा, ठीक-ठाक घर नहीं मिलेगा, उनके पास न पैसा होगा और न समय ताकि वे दोस्तों और परिवार के साथ समय बिता सकें तो इसका नतीजा पूरी दुनिया के लिए बहुत खराब होगा।

जहां तक भारत का सवाल है, हमारी सरकार, हमारे समाज और प्रवचन देने वाले बाबाओं को जागने की जरूरत है। अगर युवा नाखुश बने रहे और भारत हेप्पीनेस रिपोर्ट में नीचे के पायदानों पर बना रहा तो आखिर हम विश्वगुरू कैसे बनेंगे? अगर यंग इंडिया, अनहैप्पी इंडिया भी होगा तो उसका क्या मतलब है? हमारे प्रधानमंत्रीजी बताते हैं कि भारत के युवक रोजगार देने वाले बनेंगे। बहुत अच्छा।

मगर इसमें खुशी कहां है? क्या केवल उद्यमी बन जाने से हम खुश हो जाते हैं? एक युवा भारतीय भले ही किसी तरह अपना कोई व्यवसाय स्थापित कर ले मगर अगर कर्ज और टैक्सों से उसकी कमर टूट जाए, किसी एक्सप्रेसवे के किनारे थ्री बीएचके फ्लैट की कीमत क़र्ज़ लेने की उसकी कुल क्षमता से ज्यादा हो और अगर उसका बच्चा अपनी हर बर्थडे पर एप्पल का सबसे नया फोन मांगे तो क्या वह खाक खुश रह सकेगा।

भविष्य में जो होगा वह तो होगा ही। मगर जैसा कि कहा जाता है, जो आपने देखा नहीं वह आप बन नहीं सकते। अगर आपने खुशी देखी ही नहीं है तो आप खुश रह ही नहीं सकते। और इसलिए ताजा वर्ल्ड हेप्पीनेस रिपोर्ट डरावनी है। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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