नीतीश कुमार क्यों अपने बेटे को राजनीति में लाने से हिचक रहे हैं? सरस्वती पूजा के दिन 23 जनवरी को सबने देखा कि उनकी पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह नीतीश को मना रहे थे कि वे बेटे को राजनीति में आने दें। नीतीश की हिचक का एक कारण तो यह है कि वे अपने को कर्पूरी ठाकुर का शिष्य मानते हैं और उनके मन में यह बात बैठी है कि अपने सक्रिय रहते बेटे को राजनीति में नहीं लाना है। तभी माना जा रहा है कि पार्टी का जो खेमा निशांत की एंट्री के लिए सबसे ज्यादा बेचैन है वह भाजपा के एजेंडे के हिसाब से काम कर रहा है। निशांत की एंट्री का मतलब है कि नीतीश की विदाई होगी। भाजपा का इकोसिस्टम सेहत के आधार पर नीतीश कुमार की विदाई कराने की बुनियाद तैयार कर रहा है। हालांकि यह राजनीति का एक पहलू है।
दूसरा पहलू यह है कि नीतीश के सबसे इनर सर्किल के लोग, जिनमें उनके कुछ रिश्तेदार हैं, कुछ दूसरी कतार के नेता हैं और कुछ मौजूदा व पूर्व अधिकारी हैं वे चाहते हैं कि किसी तरह से नीतीश कुमार एक, अणे मार्ग में बने रहें। इसके लिए वे निशांत को भी अभी तुरंत सक्रिय राजनीति में लाने और कोई बड़ा पद देकर कद बढ़ाने के पक्ष में हैं। इसमें कई लोग ऐसे हैं, जो चाहते हैं कि हरिवंश इस साल रिटायर हो रहे हैं तो उनकी जगह जदयू कोटे से संजय झा को राज्यसभा का उप सभापति बना दिया जाए और संजय झा की जगह निशांत कुमार को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाए। उनको कार्यकारी अध्यक्ष बनाने और राज्यसभा भेजने की मांग तेज हो रही है। हालांकि इसके बाद सवाल है कि अगर निशांत नहीं तो कौन? आरसीपी सिंह वापसी करके राज्यसभा जाना चाहते हैं तो मनीष वर्मा को राज्यसभा भेजने की चर्चा कराई जा रही है। इस तरह जदयू के अंदर कई खेमे सक्रिय हैं और लग रहा है कि मार्च में पार्टी के अंदर शक्ति समीकरण बदलेगा। अगर प्रशांत किशोर आ गए तो अलग कहानी बनेगी।
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