कांग्रेस पार्टी के नेताओं का एक वर्ग ऐसा है, जो मान रहे हैं कि पार्टी को किसी हाल में आम आदमी पार्टी के साथ तालमेल नहीं करना चाहिए। उनका तर्क है कि कांग्रेस ने 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर उसकी सरकार बनवाई थी इसका नतीजा यह हुआ है कि 2015 के चुनाव में कांग्रेस का पूरा वोट आप को ट्रांसफर हो गया और कांग्रेस साफ हो गई। पिछले दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनावों में दिल्ली में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। इस आधार पर कुछ नेताओं का मानना है कि कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश कर रही आप से तालमेल आत्मघाती हो सकता है।
लेकिन दूसरी ओर ज्यादातर नेता तालमेल के पक्ष में हैं। वे पंजाब, गोवा और गुजरात की मिसाल दे रहे हैं, जहां कांग्रेस ने आप को समर्थन नहीं दिया था फिर भी वह काफी सफल रही। पंजाब में तो उसने 117 में से 92 सीटें जीत कर रिकॉर्ड बनाया है। गोवा में भी वह दो सीट जीत गई और गुजरात में उसे भले पांच ही सीटें मिलीं लेकिन उसने कांग्रेस के 13 फीसदी वोट काट लिए। इस आधार पर तालमेल का समर्थन करने वाले नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को सबसे पहले यह चिंता करनी चाहिए कि वह कैसे मजबूत होगी। अगर तालमेल करने से लोकसभा में कांग्रेस की सीटें बढ़ती हैं तो उस पर ध्यान देना चाहिए।
सो, माना जा रहा है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच तालमेल हो जाएगा। दोनों के बीच दो दौर की बातचीत हुई है और दिल्ली व पंजाब दोनों को लेकर सकारात्मक नतीजे की संभावना जताई जा रही है। दूसरे दौर की बातचीत में राघव चड्ढा भी शामिल हुए, जिसका मतलब है कि पंजाब को लेकर बात आगे बढ़ी है। कांग्रेस दोनों राज्यों में बराबर सीटों पर लड़ने को तैयार है। दोनों राज्यों की 20 सीटें हैं और दोनों पार्टियां 10-10 सीटें लड़ सकती हैं। आम आदमी पार्टी गोवा में भी सीट मांग रही है। लेकिन वहां शायद कांग्रेस दोनों सीटों पर लड़ेगी। लेकिन वह गुजरात और हरियाणा में आम आदमी पार्टी को कुछ सीटें दे सकती है। अगली बातचीत में सीटों की संख्या पर सहमति बन सकती है।
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