गिरफ्तारी और 30 दिन की हिरासत पर मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को पद से हटाने का प्रावधान करने के लिए लाए गए संविधान संशोधन विधेयक पर टकराव की संभावना बढ़ती जा रही है। यह भारत की संसदीय राजनीति का एक नया अध्याय बनता दिख रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मानसून सत्र में लोकसभा में तीन विधेयक पेश किए और उनके संयुक्त संसदीय समिति में भेजने का प्रस्ताव रखा, जिसे सदन ने मंजूरी दे दी है। अब समस्या यह है कि विपक्ष की कई पार्टियों ने जेपीसी में शामिल नहीं होने का फैसला किया है। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की कई पार्टियों ने इसके बहिष्कार का ऐलान किया है। सबसे ताजा ऐलान देश की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई है। हालांकि सीपीआई के पास इतने सांसद नहीं हैं कि उसे जेपीसी में जगह मिलेगी फिर भी उसने इसके बहिष्कार का ऐलान करके दूसरी पार्टियों को अपना नैतिक समर्थन दिया है और जिन पार्टियों ने अभी तक बहिष्कार का ऐलान नहीं किया है उन पर दबाव बनाया है।
गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने संयुक्त संसदीय समिति में शामिल होने से इनकार कर दिया है। सीपीआई ने इन पार्टियों का समर्थन किया है। बड़ी प्रादेशिक पार्टियों में डीएमके, राजद और जेएमएम को फैसला करना है। सीपीएम ने भी अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन सबसे ज्यादा दबाव कांग्रेस पार्टी के ऊपर है। डीएमके, राजद और जेएमएम या सीपीएम को कांग्रेस का इंतजार है। पता नहीं क्यों इस मामले में भी विपक्षी गठबंधन की पार्टियां एक साथ बैठ कर फैसला नहीं कर रही हैं। जिस दिन ये तीन बिल लोकसभा में पेश किए गए और इसे जेपीसी में भेजने का फैसला हुआ। उसी दिन विपक्षी पार्टियां अपना स्टैंड स्पष्ट कर सकती थीँ। सदन में बिल पेश किए जाते समय विपक्ष ने अपने तेवर दिखा दिए थे। विपक्षी पार्टियों ने बिल की प्रतियां फाड़ी थीं और उसको गोले बना कर अमित शाह पर उछाले थे। बिल की कॉपी फाड़ने वालों में कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल भी थे। लेकिन उसके बाद कांग्रेस ने इस पर अपना स्टैंड स्पष्ट नहीं किया।
अब सबसे ज्यादा दबाव कांग्रेस पर है और अगर कांग्रेस ने भी जेपीसी का बहिष्कार करने का फैसला किया तो उसका बड़ा दबाव भाजपा पर पड़ेगा। इस लिहाज से कह सकते हैं कि अब दोनों राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस को अपनी जिम्मेदारी दिखानी है। अगर कांग्रेस पार्टी जेपीसी के बहिष्कार के फैसले में शामिल होती है तो इसका मतलब होगा कि समूचा विपक्ष इससे बाहर रहेगा। लोकसभा के 240 से ज्यादा सांसदों वाली पार्टियां अगर जेपीसी में नहीं शामिल होती हैं तो इसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा। लेकिन इससे टकराव का एक नया अध्याय शुरू होगा। पक्ष और विपक्ष में पहले भी विवाद रहता था लेकिन इतना विभाजन पहले कभी नहीं हुआ। इसलिए कांग्रेस को बहुत सोच समझ कर फैसला करना होगा। अगर कांग्रेस बहिष्कार करती है तो उसके बाद दबाव भाजपा पर आएगा। उसको यह नीतिगत फैसला करना होगा कि वह विपक्ष के बगैर जेपीसी बनाए और उसमें विचार करके उसकी अनुशंसा के आधार पर बिल को संसद में पेश करके पास कराए। यह भी हो सकता है कि विपक्ष के बहिष्कार के बाद सरकार जेपीसी नहीं बनवाए और बिल को ऐसे ही दोनों सदनों से पास कराने का फैसला करे। यह भी देखना होगा कि विपक्ष के बहिष्कार के बाद सरकार क्या बिल वापस ले सकती है? यह भ्रष्टाचार से जुड़ा मुद्दा है और इस पर भाजपा को लग रहा है कि उसे व्यापक समर्थन मिलेगा।


