केंद्र सरकार विदेशी चंदे के कानून यानी एफसीआरए में कुछ बदलाव कर रही है। संसद में इसका बिल पेश किया गया। इस बिल और इसमें होने वाले बदलाव के बारे में आमतौर पर हिंदी पट्टी में कोई प्रतिक्रिया नहीं है। कुछ सामाजिक संगठनों और गैर सरकारी संगठनों ने जरूर चिंता जताई लेकिन यह राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाए। एफसीआरए कानून में बदलाव के लिए लाया गया विधेयक केरल में बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। सारी पार्टियां इसे चुनावी मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं। राहुल गांधी ने अपनी दो दिन की केरल यात्रा में यह कह कर एफसीआरए में बदलाव के लिए लाए गए विधेयक का विरोध किया कि इससे सारी संस्थाओं को विदेशी चंदा मिलना बंद हो जाएगा और सिर्फ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को चंदा मिलेगा। यह निश्चित रूप से राहुल गांधी का अपना राजनीतिक एजेंडा था। परंतु एफसीआरए बिल का विरोध केरल के ईसाई समूहों की ओर से ज्यादा जोर शोर से किया जा रहा है। इससे भाजपा की इसाइयों के बीच पहुंच बनाने की कोशिशें प्रभावित हो रही हैं।
गौरतलब है कि केरल के ईसाइ संगठनों खास कर चर्च को बाहर से काफी चंदा मिलता है और वह एफसीआरए कानून से ही संचालित होता है। अगर यह कानून बदलता है तो चर्च और ईसाई संगठनों को भी दिक्कत आ सकती है। हालांकि भाजपा और सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि गड़बड़ियों को रोकने के लिए कानून में बदलाव किया जा रहा है लेकिन केरल में यह मुद्दा दूसरा टर्न ले चुका है। साइरो मालाबार चर्च हो या कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस हो केरल कैथोलिक बिशप्स कौंसिल हो सबने एक स्वर में इसका विरोध किया है। एक तरफ भाजपा इसाइयों के वोट हासिल करने के प्रयास में थी तो दूसरी ओर एफसीआरए के नए कानून का बिल ले आई। नौ अप्रैल को होने वाले चुनाव में भाजपा को कम से कम केरल में इस बिल का नुकसान हो जाएगा।


