अचानक इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि कांग्रेस पार्टी की कमान प्रियंका गांधी वाड्रा को संभालनी चाहिए। कांग्रेस के अंदर से तो आवाज उठ ही रही है लेकिन सबसे हैरानी वाली बात है कि प्रियंका को अच्छा नेता बताते हुए भारतीय जनता पार्टी के लोग भी कहने लगे हैं कि प्रियंका को आगे आना चाहिए। सवाल है कि जब भजपा के लोग राहुल गांधी को असेट मानते हैं, अपना स्टार प्रचारक मानते हैं और दावा करते हैं कि जहां राहुल गांधी प्रचार के लिए जाते हैं वहां भाजपा की जीत पक्की कर देते हैं तो फिर क्यों उनको राहल की जगह प्रियंका चाहिएं? यह तो उनके लिए अच्छी बात है कि कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर हाथ में है और उससे भाजपा को फायदा हो रहा है! सोचें, कौन अपने लिए मजबूत प्रतिद्वंद्वी खोजता है? तभी इस पूरे विमर्श पर संदेह पैदा होता है। कांग्रेस के लोगों में निश्चित रूप से एक बेचैनी है। लेकिन कोई नहीं चाहता है कि परिवार के अंदर किसी तरह का विवाद हो और कांग्रेस कमजोर हो। फिर भी ओडिशा के पूर्व विधायक मोहम्मद मुकिम या सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद या रॉबर्ट वाड्रा के बयानों के जरिए मामले को उठाया जा रहा है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस के अंदर दो पॉवर सेंटर हैं। राहुल और प्रियंका दोनों के करीबी लोगों की टीम है लेकिन वह टीम कांग्रेस को कमजोर करने के लिए नहीं है। जो नेता प्रियंका गांधी के करीबी हैं वे राहुल के विरोध हैं ऐसी बात नहीं है। कहा जाता है कि भूपेश बघेल, डीके शिवकुमार, रेवंत रेड्डी आदि प्रियंका के करीब हैं लेकिन क्या ये सब राहुल के विरोधी हैं? राहुल गांधी के नेतृत्व को कांग्रेस के सारे नेता स्वीकार करते हें। वे मानते हैं कि राहुल की तरह प्रियंका भाजपा या मोदी और शाह का मुकाबला नहीं कर सकती हैं। लेकिन साथ ही उनको यह समस्या भी रहती है कि राहुल बहुत ज्यादा आदर्शवादी हैं। वे व्यावहारिक राजनीति की जरुरतों को उस तरह से नहीं समझते हैं, जैसे प्रियंका समझती हैं। इसलिए प्रियंका के साथ डील करने में कांग्रेस नेताओं को सुविधा होती है, जबकि राहुल उनको असहज कर देते हैं।
राहुल गांधी के साथ एक दूसरी समस्या निरंतरता की है। वे किसी भी मसले पर लगातार राजनीति नहीं करते हैं। अभी संसद के शीतकालीन सत्र में ही उन्होंने जिस तरह काम किया उससे कांग्रेस के कई नेता निराश हैं। वे बोल नहीं सकते हैं लेकिन अनौपचारिक बातचीत में एक नेता ने कहा कि राहुल गांधी ने प्रदूषण का मुद्दा उठाया था। सदन में बोले भी थे लेकिन फिर सब छोड़ कर जर्मनी की यात्रा पर चले गए। अगर वे सदन में रहते और प्रदूषण पर चर्चा के लिए सरकार को बाध्य करते तो कांग्रेस को बहुत फायदा हो सकता था। इसका कारण यह है कि दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश सब जगह भाजपा की सरकार है और कांग्रेस दशकों ने इन राज्यों की सत्ता से बाहर है। इसलिए वह दिल्ली, एनसीआर के प्रदूषण के मसले पर स्कोर कर सकती थी। इसी तरह महात्मा गांधी नरेगा को सरकार ने खत्म कर दिया और उस बिल पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी सदन में नहीं थे, बल्कि भारत में ही नहीं थे। इसकी लड़ाई ट्विटर पर नहीं लड़ी जा सकती है। वंदे मातरम पर चर्चा के दौरान या प्रियंका गांधी वाड्रा के भाषण के दौरान भी राहुल सदन में नहीं थे, जबकि उस दिन वे दिल्ली में थे। यह भी ध्यान रखने की बात है कि सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं से कहा था कि वंदे मातरम के मामले में डिफेंसिव होने की जरुरत नहीं है। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमले को लेकर प्रियंका ने बयान दिया लेकिन राहुल खामोश हैं। इन बातों से कांग्रेस नेताओं को परेशानी होती है और इसी परेशानी में प्रियंका का नाम उभर कर सामने आता है।


