तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव है तो अचानक राजाजी यानी चक्रर्ती राजगोपालाचारी याद आ गए। राष्ट्रपति भवन में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है। इसमें कोई बुराई नहीं है। राजाजी के नाम से सत्ता के केंद्र में यानी रायसीना की पहाड़ियों पर सड़क बनी हुई है और उनको सम्मान मिलना ही चाहिए। यह अलग बात है कि चुनाव के समय राज्यों के महापुरुष याद आते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के समय चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर याद आए थे तो दोनों को भारत रत्न मिला। पश्चिम बंगाल में चुनाव है तो बंकिम बाबू भी याद आ रहे हैं और रामकृष्ण परमहंस भी। बंगाल के पिछले चुनाव के समय रविंद्रनाथ टैगोर और ईश्वरचंद विद्यासागर बहुत याद आए थे।
बहरहाल, राजाजी को याद करने या उनको सम्मान देने में कोई बुराई नहीं है लेकिन उनकी प्रतिमा स्थापित करने के लिए एडविन लुटियन की प्रतिमा हटाई गई और इस बात का ऐसा प्रचार किया गया, जैसे गुलामी का सबसे बड़ा प्रतीक लुटियन हों और उनकी प्रतिमा हटाने से ही भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्ति मिल सकती है। हकीकत यह है कि भारत की गुलामी से लुटियन का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने रायसीना पहाड़ियों पर एक खूबसूरत शहर की कल्पना की थी और उसे डिजाइन किया था। तभी मूर्ति हटाने लुटियन की विरासत खत्म नहीं होगी। इसके लिए राष्ट्रपति भवन से लेकर उस इलाके में बनी सारी इमारतें नष्ट करनी होगी और पूरा आर्किटेक्चर बदलना होगा। कार्बूजिए ने चंडीगढ़ डिजाइन किया तो क्या चंडीगढ़ को नष्ट करेंगे गुलामी की मानसिकता से मुक्ति के लिए? सोचें, लुटियन की दिल्ली और चंडीगढ़ के डिजाइन पर उसकी तुलना करें गुरुग्राम और नोएडा के डिजाइन से!
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