कायदे से तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को जोसेफ विजय चंद्रशेखर की ओर से पेश किया गया सरकार बनाने का दावा तत्काल स्वीकार कर लेना चाहिए था। आखिर तमिलनाडु की जनता ने इस बार विधानसभा चुनाव में सिर्फ एक पार्टी जिताया है। बाकी सारी पार्टियों को जनता ने बुरी तरह से हराया है। सो, अगर जीती हुई पार्टी का नेता सरकार बनाने का दावा पेश करता है तो राज्यपाल को उसमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वैसे भी एसआर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि बहुमत की परीक्षा राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर होगी। हालांकि यह भी जरूरी है कि राज्यपाल को यकीन हो कि दावा पेश करने वाला बहुमत साबित कर पाएगा। इसमें किसी को संदेह नहीं है कि विजय को मुख्यमंत्री बनाया जाए तो बहुत आसानी से सदन में बहुमत साबित कर देंगे। उन्होंने राज्यपाल को 113 सदस्यों की सूची सौंपी थी, जो बहुमत से पांच कम है। इसके बावजूद राज्यपाल ने उनको सरकार बनाने का न्यौता देने की बजाय उनसे कहा कि वे बहुमत का आंकड़ा दिखाए। यह स्थापित परंपराओं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है।
राज्यपाल का यह कदम तमिलनाडु के लोगों की ओर से दिए गए जनादेश का अपमान है। क्या उनको समझ में नहीं आ रहा है कि दो साल पहले बनी एक पार्टी को जीरो से उठा कर राज्य के लोगों ने 108 सीट तक पहुंचाया है तो राज्य के लोग क्या चाहते हैं? क्या उनको समझ में नहीं आ रहा है कि 159 सीट जीतने वाले डीएमके गठबंधन को जनता ने 74 पर ला दिया या 75 सीट जीतने वाले अन्ना डीएमके गठबंधन को 47 पर ला दिया तो इसका क्या मतलब है? 18 सीट जीतने वाली कांग्रेस इस बार पांच सीट जीती है और चार सीट जीतने वाली भाजपा सिर्फ एक सीट जीत पाई है। इसका अर्थ है कि डीएमके हो या अन्ना डीएमके और कांग्रेस हो या भाजपा सबको तमिलनाडु की जनता ने हराया है और सिर्फ विजय की पार्टी टीवीके की जिताया है। टीवीके सबसे ब़ड़ी पार्टी है और विजय ने 113 का पत्र सौंपा है। अगर वे अपनी जीती दो में से एक सीट से इस्तीफा देते हैं तो बहुमत का आंकड़ा 117 का होगा।
ऐसै लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार थलपति विजय से नाराज हैं। हालांकि पहले भाजपा ने विजय से तालमेल करने की पहल की थी। उन्होंने तालमेल नहीं किया तब भी कोई नाराजगी नहीं हुई। दूसरी ओऱ विजय ने भी भाजपा के खिलाफ प्रचार के दौरान कुछ नहीं कहा। लेकिन जब चुनाव नतीजे आए और कांग्रेस ने आगे बढ़ कर उनको समर्थन दिया और उन्होंने समर्थन स्वीकार किया तब भाजपा में नाराजगी हुई। असल में भाजपा किसी हाल में नहीं चाहती है कि कांग्रेस एक और राज्य की सरकार में शामिल हो। तमिलनाडु में अगर कांग्रेस टीवीके की सरकार में शामिल होती है तो आने वाले दिनों में टीवीके और कांग्रेस के तालमेल का रास्ता साफ होगा। दोनों द्रविड पार्टियां जिस तरह से कमजोर हुई हैं उसमें विजय और कांग्रेस का तालमेल अगले लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल कर सकता है। भाजपा को इस बात की चिंता है कि द्रविड राजनीति कमजोर होने से अगर तमिलनाडु में राष्ट्रीय पार्टियों की स्थिति सुधरती है तो उस राजनीति में कांग्रेस उससे आगे हो जाएगी। साथ ही पूरे दक्षिण में कांग्रेस का दबदबा कायम होगा। वह केरल में जीती है और कर्नाटक व तेलंगाना में पहले से सरकार में है। अगर तमिलनाडु की सरकार में भी शामिल होती है तो उसकी स्थिति और मजबूत होगी। माना जा रहा है कि भाजपा चाहती है कि कांग्रेस के अलावा विजय किसी के भी साथ सरकार बना लें। संभवतः इस वजह से उनको रोकने की कोशिश हुई।


