भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र में सरकार बनाने के बाद पूर्वोत्तर पर राजनीतिक रूप से बहुत ध्यान दिया। पूर्वोत्तर के लिए एनडीए का एक नया समूह बनाया गया, जिसका जिम्मा हिमंत बिस्वा सरमा को दिया गया। लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद नेडा अप्रभावी होता गया। पहले जहां भाजपा ने दो राज्यों को छोड़ कर सब जगह अपनी या सहयोगी पार्टियों की सरकार बना ली थी वहां सरकार भी और राजनीति भी उसके हाथ से निकल रही है। भाजपा की सहयोगी पार्टियां उसको छोड़ कर अपना अलग रास्ता बना रही हैं।
पिछले दिनों नगालैंड में सत्तारूढ़ एनडीपीपी ने एनपीएफ के साथ विलय फैसला किया। नई पार्टी का नाम एनपीएफ होगा और इसके नेता मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो होंगे। 60 सदस्यों की विधानसभा में इस नई पार्टी के पास 34 विधायक हो गए हैं। यानी बहुमत के लिए उसे भाजपा के 12 विधायकों की जरुरत नहीं है। अब नया घटनाक्रम यह है कि मेघालय में सत्तारूढ़ एनपीपी के नेता कोनरेड संगमा ने त्रिपुरा में भाजपा की सहयोगी तपरा मोथा से हाथ मिला लिया है। दिल्ली में एनपीपी के नेता और मेघालय के मुख्यमंत्री कोनरेड संगमा ने तिपरा मोथा के नेता प्रद्योद देबबर्मन के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसका ऐलान किया। दोनों पार्टी पूरे पूर्वोत्तर में साझा राजनीति करेंगी। अपने क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची में बचा कर रखने के साथ साथ अस्मिता की राजनीति के लिहाज से पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा से दूरी बना रही हैं।


