तमिलनाडु में 60 साल के बाद राजनीति में इतना बड़ा बदलाव हुआ है। इससे पहले डीएमके बनाम अन्ना डीएमके की राजनीति चलती थी, जिसे रिवॉल्विंग डोर राजनीति कहते हैं। एक पार्टी जाती थी तो दूसरी सत्ता में आती थी। इसी तरह एक पार्टी हमेशा केंद्र में जिसकी सरकार होती थी उसके साथ गठबंधन रखती थी। पहली बार ऐसा हो रहा है कि सब कुछ बिखर गया है। इन दोनों पार्टियों में से किसी को सत्ता नहीं मिली और एक नई पार्टी का उदय हो गया है। पहली बार ऐसा भी हो रहा है कि राष्ट्रीय पार्टियां किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा हाशिए में गई हैं। कांग्रेस के सिर्फ पांच और भाजपा का सिर्फ एक विधायक जीता है। पहली बार ऐसा हुआ है कि दोनों बड़ी प्रादेशिक पार्टियों का राष्ट्रीय दलों के साथ गठबंधन गड़बड़ाया है। डीएमके और कांग्रेस का गठबंधन टूट गया है तो भाजपा को तय करना है कि वह अन्ना डीएमके के किस गुट के साथ रहे। पलानीस्वामी और षणमुगम के अलग अलग गुट बन गए हैं, जिनमें से एक गुट राज्य की विजय सरकार का समर्थन कर रहा है।
ऐसे उलझे हुए समय में सबसे ज्यादा नजर डीएमके पर होगी। मुख्यमंत्री विजय ने डीएमके सुप्रीमो एमके स्टालिन से मुलाकात की। उन्होंने यह संकेत भी दिया है कि वे द्रविडियन राजनीति की बुनियादी बातों से नहीं भटकेंगे। फिर भी यह तय है कि डीएमके इस सरकार का विरोध करेगी ताकि अगला मुकाबला टीवीके बनाम डीएमके का रहे। अब सवाल है कि दिल्ली में डीएमके की क्या राजनीति होगी? क्या डीएमके दिल्ली की राजनीति में पुरानी बीजद और वाईएसआर कांग्रेस के साथ लेगी? क्या डीएमके के सांसद केंद्र सरकार को मुद्दों पर आधारित समर्थन देंगे या केंद्र के विरोधी की भूमिका निभाएंगे? यह ध्यान रहे भाजपा किसी हाल में डीएमके से हाथ नहीं मिलाएगी। यह दोनों के लिए नुकसानदेह होगा। पर मुद्दा आधारित समर्थन लेने में कोई समस्या नहीं है।


