सोनम वांगचुक को अति नाटकीय तरीके से जंतर मंतर से हटाना सरकार को भारी पड़ गया है। अगर सरकार उनको वही बैठे रहने देती तो शायद आंदोलन इतना व्यापक और इतना तीव्र नहीं होता। लेकिन जिस तरह ऑपरेशन सफेद चादर के जरिए वांगचुक को हटाया गया उससे लोगों में गुस्सा भड़का। वांगचुक को दूर से समर्थन दे रहे लोग सारे उपाय करके जंतर मंतर पहुंचे और उसके बाद जो हुआ उसे पूरे देश ने देखा। इस आंदोलन को सामान्य लोगों का जैसा समर्थन मिला है उससे इसका दायरा बहुत बढ़ गया है और यह तमाम किस्म की सीमाओं से बाहर चला गया है। सोनम वांगचुक की गैरहाजिरी में जो लोग इस आंदोलन की कमान संभाल रहे हैं उनको शिक्षा और परीक्षा प्रणाली की ग़ड़बड़ियों का कोई अंदाजा नहीं है। उनको इस बात का भी अंदाजा नहीं है कि व्यवस्थागत और संरचनात्मक सुधार के लिए क्या करना है।
तभी अभिजीत दीपके ने जिन अभिषेक रांका और सौरव दास को जेपी नड्डा के पास बातचीत के लिए भेजा उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और नीट यूजी परीक्षा के पेपर लीक के बाद की घटनाओं में मरे युवाओं के परिजनों के लिए एक एक करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग रख दी। इसके उलट वांगचुक ने सरकार से पेपर लीक और परीक्षा की अन्य गड़बड़ियों की जिम्मेदारी लेने, जवाबदेही तय करने और सुधार करने की मांग रखी थी। उन्होंने संसद में इस विषय पर चर्चा करने और उनके सहित आंदोलन में शामिल दूसरे लोगों से मिल कर उनकी बात सुनने की मांग की थी। दीपके और उनकी टीम ने इन मांगों को कमजोर कर दिया है। उनको पता होना चाहिए कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से शिक्षा व परीक्षा की व्यवस्था नहीं सुधरने वाली है। असली सवाल परीक्षा की मौजूदा व्यवस्था में व्यापक सुधार का है।
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