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भाषा गुंडई, भाषा पर भी गुंडई!

हर युग की अपनी भाषा होती है। और हर सत्ता अपने समय की भाषा से पहचानी जाती है। अपनी यादों में मैकाले के अंग्रेज शासन की जुबान, नेहरू के स्वतंत्र भारत की भाषा, और आज के नरेंद्र मोदी के कथित ‘न्यू इंडिया’ की बोली पर जरा गौर करे तो क्या लगेगा?  क्या वह अंतर नहीं जो देश, सभ्यता की पहचान या गिरावट का प्रमाण है?

मैकाले की अंग्रेज़ी सिर्फ भाषा नहीं थी, वह भारत को मानसिक गुलाम बनाने के प्रोजेक्ट की गंगोत्री थी। उसका मकसद था एक ऐसा भारतीय वर्ग बनाना जो अपने रंग और रक्त में भले देसी हो, पर सोच, स्वाद, नैतिकता और बुद्धि में पूर्णतः अंग्रेज़ हो। मैकाले के मिशन ने फारसी और संस्कृत को सत्ता व स्मृति से, पाठशालाओं से बेदखल किया। हिंदुस्तानी व हिंदी को ऐसा उभारा कि मुसलमान फारसी भूल गया और हिंदू संस्कृत। वही दोनों का अभिजात्य वर्ग अंग्रेजी में ढला। उर्दू और हिंदी लोकभाषा में सीमित हुई, जबकि अंग्रेज़ी को पूरे हिंदुस्तान के अभिजात्य की, प्रशासन की, और बौद्धिक विवेक की भाषा बना दी।

पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना व लियाकत अली वैसे ही थे जैसे 15 अगस्त 1947 में नेहरू-पटेल की जुगल जोड़ी थी। दोनों मैकाले के इस मिशन की कसौटी के परिणाम थे कि “हम सभी को वह पुरजोर कोशिश करनी है, जिससे हम एक ऐसा वर्ग तैयार कर सकें जो हमारे और उन करोड़ों भारतीयों के बीच दुभाषिए का काम करें, जिन पर हम शासन करते हैं। और यह वर्ग ऐसे तैयार हो जो रक्त और रंग से तो भारतीय हो, लेकिन रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि में पूर्णतः अंग्रेज़ हो”। (We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern — a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, in morals, and in intellect.Thomas Babington Macaulay, Minute on Indian Education-1835)

और 1947 में औपनिवेशिक प्रयोगशाला से निकले ‘आंग्ल हिंदू’ और ‘आंग्ल मुसलमान’ भारत तथा पाकिस्तान के नियंता बने। दोनों ही मैकाले की कसौटी पर खरे उतरते हैं। दोनों के हाथों बनी आज़ादी के दो राष्ट्र, भारत और पाकिस्तान दरअसल अंग्रेज़ी की सात्ता के दो अलग अलग प्रयोगशाला संस्करण बनकर उभरे। पाकिस्तान में जिन्ना और लियाकत अली जैसे नेता वही थे, जो भारत में नेहरू और पटेल। दोनों जगह सत्ता की भाषा और शैली, अंग्रेज़ी की परंपरा में गढ़ी गई।

नेहरू और पटेल हिंदी को जब राजभाषा घोषित कर रहे थे, तब उन्हें हिंदी लिखनी नहीं आती थी। संविधान की भाषा अंग्रेज़ी थी, अफसर अंग्रेज़ी वाले थे, न्यायपालिका अंग्रेज़ी में सोचती थी। जाहिर है हिंदी को ‘राजभाषा’ का तमगा मिलना मात्र एक सांकेतिक कर्मकांड था। असलियत में तो अंग्रेजी, अपने मूल साम्राज्य याकि ब्रिटेन से बाहर, दक्षिण एशिया की नई सत्ता की भाषा बन चुकी थी, शालीन, सौम्य, पर असंदिग्ध प्रभुत्वशाली।

पर सत्ता क्योंकि लार्ड माउंटबेटन के हाथों अंग्रेजीदां हिंदुओं को ट्रांसफर थी तो वह समय अंग्रेज भद्रता का था। भाषा में विवेक था, मर्यादा थी। इसलिए प्रधानमंत्री नेहरू को राज्यों के भाषायी आधार पर पुनर्गठन में दिक्कत नहीं हुई। कुल मिलाकर पंडित नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के समय तक की भाषा सौम्य थी, संवेदनशील थी। 1947 से लेकर मनमोहन सिंह के काल तक भारत की शासकीय भाषा, लोकभाषा, हिंदीभाषा संवेदनशील रही। प्रधानमंत्री शब्दों को चुनता था, बोलने से पहले सोचता था। भारत की राजनीति में विचार बचा हुआ था, झूठ को कुछ हद तक लज्जा मानकर छुपाया जाता था।हिंदी, सत्ता की नहीं बल्कि विवेक की जुबान थी।

यह वह दौर था जब संसद में बहसें होती थीं, जब प्रधानमंत्री के वक्तव्यों में तर्क और तथ्यों की जगह होती थी, जब भाषणों में गरिमा होती थी, और विपक्ष की आलोचना भी एक परंपरा मानी जाती थी। हिंदी का स्वभाव सौम्य था, संवादमूलक था। प्रेस, साहित्य, शिक्षा और सार्वजनिक वाद-विवाद में भी हिंदी का एक चरित्र था। उस समय की हिंदी, बिना किसी सांप्रदायिक या दंभपूर्ण एजेंडे के, एक विकासशील लोकतांत्रिक भाषा बन रही थी।

अब जरा सोचें 2014 के बाद के समय की हिंदी पर! अब कैसी उसने जुबान पा ली है? वह मिथ्याचार की भाषा हो गई है। याद करें 2014 से पहले के समय पर! तब हिंदी में विचार थे। समाचार पत्र हो या टीवी चैनल या सिनेमा या सार्वजनिक विमर्श में आंशिक रूप में ही सही लेकिन सत्य झलकता था। भारत के नेता, भारत के प्रधानमंत्री, नौकरशाह, बुद्धिजीवी झूठ नहीं बोलते थे। भयाकुल नहीं दिखते थे। भारत झूठ और प्रोपेगेंडा में रमा हुआ नहीं था।

क्या मैं गलत बोल रहा हूं? सोचे, भारत के समय का भाषायी आधार पर यदि अंग्रेजों के काल, स्वतंत्रोत्तर भारत (नेहरू से डॉ. मनमोहन सिंह तक) के समय में भाषा का व्यवहार, संस्कार और जुबान क्या थी? जबकि 2014 से 2025 के हालिया समय का भाषागत परिवर्तन क्या बोलता और बताता हुआ है?

अब हिंदी विचार, भद्रता, सत्यता की नहीं, बल्कि अहंकार की जुबान है। सत्ता का घमंड है। झूठ का शाब्दिक अखाड़ा है। इस जुबान में संवेदनशीलता को कायरता और सौम्यता को कमजोरी समझा जाता है। प्रधानमंत्री की जुबान अब नापी-तुली नहीं, बल्कि दहाड़ती हुई होती है, जैसे वह विचार नहीं, विजय अभियान का सेनापति हो। विपक्ष को नामों से पुकारा जाता है, आलोचना को गद्दारी कहा जाता है, और संवाद को देशद्रोह करार दिया गया है।

हिंदी अब धमकाती है। विपक्षी विचारकों को, आलोचकों और पत्रकारों को। टीवी चैनलों की भाषा अब चीखती है झूठ का प्रलाप करती है। हिंदी फिल्मों से लेकर सोशल मीडिया तक, सब जगह जुबान गाली में बदल गई है। सार्वजनिक जीवन की हिंदी भाषा अब बहस की नहीं, गुंडई का पर्याय हो गई है।

मैंने कल पढ़ा कि बीस साल बाद उद्धव और राज ठाकरे ने मुंबई में एक मंच पर आ कर कहा, अगर मराठी के लिए लड़ना गुंडागर्दी है तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। ध्यान रहे ठाकरे उस हिंदू आइडिया ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि चेहरे हैं जो स्वंय हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान के पैरोकार रहे हैं। पर वे अब नरेंद्र मोदी, अमित शाह, देवेंद्र फड़नवीस की उस भाषा, बोली से गुडंई पर उतारू हैं जो सचमुच मौजूदा समय की भाषाई गुंडई है! अहंकार है!

और यह बहुत खराब है। हम हिंदुओं की बुद्धि और भाषा का दिवाला है। हिंदू राष्ट्र के उस संघ संगठन के सौ वर्षों की शताब्दी के साल का कलंक है, जिसमें इतनी भी बुद्धि, विवेक, साहस नहीं है जो भारत की भाषा को अहंकारी बनने से रोके। तभी तो मराठी मानुष का जवाब है कि  “अगर अपनी भाषा के लिए लड़ना गुंडई है, तो गुंडई सही”। जाहिर है यह बात मोदी राज की भाषाई हिंसा का प्रमाण है। यह एक गहरे असंतोष और हताशा की आवाज़ है, जो उस सत्ता के विरुद्ध है जो हिंदी को ज्ञान, मर्यादा, संस्कार, शिक्षा के माध्यम की बजाय उसका राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है।

तुलना करें मोदी-शाह-संघ के मौजूदा समय से अंग्रेजों के वक्त की। मैकाले ने यह नहीं कहा था कि हमारे जीवनकाल में ही भारत में संस्कृत, हिंदी बोलने वाले शर्मिंदा होंगे। और सब अंग्रेजी बोलेंगे। अंग्रेजों ने अंग्रेजी को गुडंई से नहीं फैलाया। अंग्रेजी को गुंडई, झूठी, प्रोपेगेंडा की भाषा नहीं बनाया। उससे केवल दुभाषिए ही पैदा नहीं किए, बल्कि उन्होंने वेद-उपनिषद, भारतीय शास्त्रों की विवेचना के वैश्विक आंग्ल विद्धवान पैदा किए। इन कामों के लिए सोसायटी, एनजीओ बनवाई। साथ ही अपने संसर्ग, अपनी बुद्धिमत्ता के बीजों से ज्ञानवान, बुद्धिमान, शास्त्रीय पांडित्य वाले हिंदुस्तानी राजा राममोहन राय से ले कर विवेकानंद, महर्षि अरविंद, रविंद्र नाथ टैगोर का वह स्वर्णिम काल बनाया, जिससे भारतीय सभ्यता-संस्कृति का वैश्विक मान भी बना। भाषा की पताका बनाई न कि हल्ला बनाया।

विषयांतर हो रहा है। लेकिन सोचें, 2014 से पहले हिंदी का जैसा विन्यास नैसर्गिक तौर पर हो रहा था, बॉलीवुड के जरिए शाहरूख-सलमान-आमिर खान की टोली के अभिनय की फिल्मों से हो रहा था उस सबका बाजा बजवा कर अब हिंदी को बेबात ऐसा अहंकारी बना दिया है, जिससे मराठी मानुष भी चिढ़ा हुआ है। मुंबई में हिंदीभाषी पिट रहा है और ऊपर से उलटे यह धमकी कि गुंडई करोगे तो गुंडई ठीक कर देंगे! और तब तड़ाक से भरी सभा से यह जवाब कि हम भी अपनी जुबान के लिए करेंगे गुंडई!

तमिलनाडु हो, महाराष्ट्र हो ,पश्चिम बंगाल हो याकि पूरे भारत में और पड़ोस, बांग्लादेश, पाकिस्तान सभी तरफ एक ही भारत भाषा। और यह असल में हिंदी नहीं है, हिंदी सेवा नहीं है बल्कि “हिंदी में सत्ता की गुंडई” है। क्या नहीं?

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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