सत्ता किसी की भी, खमीर लेफ्ट का ही!
ढेरों प्रमाण हैं। तारीखों और घटनाओं का वह अंतहीन सिलसिला है जिससे मेरा निष्कर्ष है कि भारत के कम्युनिस्टों ने न केवल देश का समय बिगाड़ा। खुद के अवसर भी गंवाए। लेफ्ट के खाते में राजनीतिक बरबादियां लगातार दर्ज कराईं। बावजूद इसके मेरे मन में कम्युनिस्ट नेताओं के चाल, चेहरे और चरित्र की कसौटी में सम्मान है। खासकर आज सत्ता में संघ-भाजपाइयों के चाल, चेहरे और चरित्र को देखते हुए तो और भी अधिक। उस नाते ई. एम. एस. नंबूदरीपाद, ज्योति बसु, इंद्रजीत गुप्त से माणिक सरकार, पिनराई विजयन और वाम संगठनों के प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, दीपांकर भट्टाचार्य तक—इन...