शीत युद्ध की समाप्ति के बाद उभरी एक-ध्रुवीय दुनिया में ऐसी मिसाल ढूंढे नहीं मिलेगी। ईरान का यह एलान चौंकाने वाला है कि वह अपनी शर्तों और अपने चुने हुए समय पर लड़ाई रोकेगा। ईरान ऐसा करने की स्थिति में आखिर कैसे पहुंचा?
कोई देश अमेरिकी फॉर्मूले को ठुकरा कर युद्ध खत्म करने के लिए अपनी शर्तें पेश करे, दुनिया के लिए यह नया तजुर्बा है। खासकर शीत युद्ध की समाप्ति के बाद उभरी एक-ध्रुवीय दुनिया में ऐसी मिसाल ढूंढे नहीं मिलेगी। इसीलिए ईरान का यह एलान चौंकाने वाला साबित हुआ कि वह अपनी शर्तों और अपने चुने हुए समय पर लड़ाई रोकेगा। ईरान ऐसा करने की स्थिति में पहुंचा, तो उसकी संभवतः तीन वजहें हैं। एक तो वहां का नेतृत्व मरने-मारने की मनोदशा में है, दूसरे डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने जारी वार्ता के बीच दो बार हमले कर अपनी साख गंवा दी है, और तीसरे लगभग चार हफ्तों में ईरान ने युद्ध की कथा बदल डाली है।
ईरान की जबरदस्त बर्बादी एक तथ्य है। अमेरिका के मुताबिक उसने लगभग दस हजार ईरानी ठिकानों पर बमबारी की है। मगर लड़ाई का एक दूसरा पक्ष भी है। अमेरिका के एक प्रमुख अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिका के 13 सैनिक अड्डों को इस तरह तबाह किया है कि वहां किसी का रहना संभव नहीं रह गया है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान लगभग 20 अमेरिकी लड़ाकू विमान या तो नष्ट कर दिए गए या वे क्षतिग्रस्त हुए हैं। इनमें अमेरिका का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान एफ-35 भी है। इसी तरह अमेरिका के बहुचर्चित बेड़े अब्राहम लिंकन और जेराल्ड फोर्ड पर ईरान ने मिसाइलें दागीं, जिनसे उन्हें नुकसान होने की चर्चा रही है।
इस बीच इजराइल के अंदर ईरानी मिसाइलों ने अंदर तक घुस कर मार की है। ऐसे में नए ईरानी नेतृत्व का आकलन संभवतः यह है कि जमीनी हमले की तैयारी के साथ-साथ अमेरिका युद्धविराम का फॉर्मूला भी भेज रहा है, तो उस पर यकीन नहीं किया जा सकता। फिर, जब युद्ध में ईरान को अपने सर्वोच्च नेतृत्व को गंवाने से लेकर जान-माल की व्यापक क्षति झेलनी पड़ी है, तो पुराने मुद्दों और उन्हीं अमेरिकी शर्तों पर फिर बात करने का कोई तुक नहीं रह जाता। तो ईरान ने अमेरिकी फॉर्मूला ठुकरा दिया है। अमेरिकी शासक वर्ग के लिए इस तजुर्बे को झेलना आसान नहीं होगा।
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