अमेरिका जिस प्रस्ताव पर बातचीत के लिए तैयार हुआ, उसमें सर्व-प्रमुख बात होरमुज जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को स्वीकार करना है। अमेरिकी मीडिया ने भी कहा है कि ईरान होरमुज से गुजरने वाले जहाजों पर ‘टॉल टैक्स’ लगाता रहेगा।
ईरान की दस शर्तों को वार्ता का आधार स्वीकार कर अमेरिका युद्धविराम के लिए राजी हुआ, यह 39 दिन चली लड़ाई का वह नतीजा है, जिसके अर्थ को गले उतारने में अभी दुनिया को वक्त लगेगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के युद्धविराम का एलान करने के बाद सोशल मीडिया पर अपने पहले पोस्ट में डॉनल्ड ट्रंप ने कहा- ‘हमें ईरान का दस सूत्री प्रस्ताव मिला, और हम मानते हैं कि यह वार्ता के लिए सक्षम आधार है।’ गौरतलब है, पहले अमेरिका ने लड़ाई रोकने के लिए अपनी योजना दी थी, जिसे ईरान ने ठुकरा दिया।
अब ट्रंप प्रशासन जिस प्रस्ताव पर बातचीत के लिए तैयार हुआ है, उसमें सर्व-प्रमुख बात होरमुज जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को परोक्ष रूप से स्वीकार करना है। अमेरिकी मीडिया ने ईरान के इस दावे की पुष्टि की है कि दो हफ्तों के युद्धविराम की अवधि में ईरान होरमुज से गुजरने वाले जहाजों पर ‘टॉल टैक्स’ लगाता रहेगा। अगर अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता के दौरान व्यापक शांति समझौता होता है, और उसमें होरमुज की यही स्थिति बरकरार रहती है, तो उसका अर्थ मुक्त नौवहन के सिद्धांत का अंत होगा, जो उपनिवेशवाद के दौर से पश्चिमी ताकत का प्रमाण रहा है।
पश्चिमी ताकतें सुनिश्चित करती रही हैं कि दुनिया भर के समुद्री मार्ग मुफ्त व्यापार के लिए खुले रहें। ईरान होरमुज से गुजरने वाले जहाजों से युवान में भुगतान करवा रहा है। इस चलन के जारी रहने का मतलब पेट्रो-डॉलर के समानांतर पेट्रो-युवान की व्यवस्था का स्थायी रूप लेना होगा। ये दोनों रुझान अमेरिकी वर्चस्व की जड़ पर प्रहार होंगे। इनका अर्थ पश्चिम एशिया में ईरान का बड़ी ताकत के रूप में स्थापित होना भी होगा। इन्हीं संभावनाओं के मद्देनजर वार्ता की शर्तों को ईरान की रणनीतिक जीत माना जा रहा है। बहरहाल, युद्धविराम सचमुच स्थायी शांति समझौते में तब्दील होगा या नहीं, इसके बीच अभी बहुत अगर- मगर हैं। उनसे पार पाना संभव ना हुआ तो दो हफ्तों के बाद- या उसके पहले भी- विनाशकारी युद्ध पश्चिम एशिया, एवं परोक्ष रूप से दुनिया को फिर अपनी चपेट में ले सकता है।


