समस्या यह धारणा है कि परीक्षा तंत्र अकुशलता और भ्रष्टाचार के ग्रस्त है। इससे छात्रों का भविष्य अंधकारमय हुआ है। परीक्षा केंद्रों को ‘बंकर’ में तब्दील करने से यह धारणा दूर नहीं होगी।
पेपर लीक के बाद दोबारा हुए नेशनल एलिजिबिलिटी- कम- एंट्रेस टेस्ट (स्नातक पूर्व) के लिए देश में बने 5,440 परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा का ऐसा घेरा खड़ा किया गया (अथवा ऐसा करने का प्रचार किया गया), मानों उन केंद्रों को किसी बड़े आतंकवादी हमले से बचाने की चुनौती सामने हो! परीक्षा आयोजन में वायु सेना, केंद्रीय सशस्त्र बलों, डाक विभाग, केंद्र सरकार के वित्तीय सेवा विभाग, और नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर की मदद ली गई। अंत में यह खबर भी आ गई कि नीट परीक्षार्थियों को असुविधा से बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली हवाई अड्डे पर 45 मिनट तक इंतजार किया! यह दीगर बात है कि इन बड़ी सुर्खियों से पेपर लीक और परीक्षा संचालन व्यवस्था की पोल को ढका नहीं जा सका है।
छात्रों का टीवी रिपोर्टरों से यह कहना अविश्वास के गहराते माहौल को जाहिर कर देता है कि दोबारा परीक्षा में शामिल होने को लेकर वे उतने नर्वस नहीं हुए, जितनी इस आशंका से हैं कि कहीं फिर पेपर लीक ना हो जाए! वैसे दोबारा परीक्षा की दहशत से भी दर्जन भर से अधिक छात्र नर्वस हुए, जिनकी आत्महत्या की खबरें हाल में चर्चित रही हैं। ऐसी घटनाओं ने नौजवानों के एक बड़े वर्ग में आक्रोश भरा है। उसका नज़ारा फिलहाल दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन में देखने को मिल रहा है।
गुस्सा इसको लेकर है कि वर्तमान सरकार के तहत जवाबदेही की अवधारणा ही दफना दी गई है। कुछ भी हो जाए, उसके लिए कोई उत्तरदायी नहीं होता! गंभीर से गंभीर समस्या में सरकार के पास दो ही जवाब होते हैः ‘सिक्युरिटी स्टेट’ के रूप में अपनी क्षमता का प्रदर्शन और धुआंधार प्रचार से अपने पक्ष में नैरेटिव खड़ा करना। नीट के दोबारा आयोजन में इन दोनों उपायों का खुल कर मुजाहिरा किया गया। लेकिन इन उपायों से समस्याएं दूर नहीं होतीं। समस्या बनी यह धारणा है कि परीक्षा का सरकारी तंत्र अकुशलता और भ्रष्टाचार के ग्रस्त है। इससे करोड़ों छात्र- नौजवानों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। परीक्षा केंद्रों को ‘बंकर’ में तब्दील करने से यह धारणा दूर नहीं होगी।
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