चुनौती गंभीर हो रही हो, तो आरबीआई के लिए डॉलर की आवक बढ़ाने के उपायों पर विचार करना लाजिमी है। मगर ऐसे उपाय मरहम-पट्टी ही साबित होंगे। वजह भारत के प्रति विदेशी निवेशकों का उदासीन हो जाना है।
रुपये के गिरने का सोमवार को नया रिकॉर्ड बना। पहली बार बाजार 95।9 रुपये प्रति डॉलर के भाव पर बंद हुआ। इस वर्ष डॉलर की तुलना में रुपये का भाव 5।5 प्रतिशत गिर चुका है। ऐसा भारतीय रिजर्व बैंक के अपने भंडार से लगातार डॉलर बेचने के बावजूद हुआ है। इस कारण मार्च- अप्रैल में विदेशी मुद्रा भंडार में 19 बिलियन डॉलर की गिरावट आई। अब कच्चे तेल के भाव में फिर उछाल और डॉलर की बढ़ी मांग का दबाव रुपये पर है। तो खबर है कि भारतीय रिजर्व बैंक देश में डॉलर की आवक बढ़ाने के उपायों का अध्ययन कर रहा है।
ऐसा एक उपाय अनिवासी भारतीयों की जमा राशि से डॉलर लेना है, जैसा 2013 में किया गया था। दूसरा उपाय सरकारी बॉन्ड्स में निवेश पर विदेशियों को मिलने वाले ब्याज पर टैक्स खत्म करना है, ताकि विदेशी निवेशक आकर्षित हों। जब चुनौती गंभीर हो रही हो, तो आरबीआई के लिए ऐसे कदमों पर विचार करना लाजिमी ही है। मगर ये उपाय मरहम-पट्टी से ज्यादा साबित नहीं होंगे। समस्या यह है, जैसाकि कुछ विशेषज्ञों ने कहा है, कि विदेशी निवेशक भारत के प्रति उदासीन हो गए हैं। ये स्थिति ईरान युद्ध शुरू होने से काफी पहले से सामने आ खड़ी हुई थी। इसकी वजह आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ढांचे में निवेश का आया जुनून है।
चूंकि भारत एआई क्षेत्र में कहीं नहीं है, अतः उसे इसका नुकसान उठाना पड़ा है। निवेशकों ने यहां से पैसा निकाल कर अमेरिका स्थित एआई कंपनियों में लगाया है। उधर रुपये का भाव गिरने का एक किस्म का दुश्चक्र बना हुआ है। भाव जितना गिरता है, डॉलर में किए गए निवेश पर मुनाफा उतना घट जाता है। इन स्थितियों को बनाने में डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर और अब ईरान युद्ध की भी बड़ी भूमिका रही है। इन सबका समग्र प्रभाव यह हुआ है कि एक समय भारतीय बाजार की जो चमकदार कहानी बनाई गई थी, उसका आकर्षण भंग हो गया है। नतीजतन, मुश्किलें बढ़ रही हैं। इनका हल अर्थव्यवस्था के पुनर्संगठन से ही निकल सकता है। लेकिन ये बात फिलहाल अपने देश के एजेंडे पर नहीं है।


